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Sunday, August 06, 2017

दैनिक जागरण ने इस ‘हसीना’ को बना दिया आतंकी

बिजनौर : शादी में एक युवती को बंदूक़ के साथ तस्वीर खिंचवाना काफ़ी महंगा पड़ा. दैनिक जागरण ने इस वायरल फोटो के आधार पर एक ख़बर लिख दी और ख़बर का शीर्षक था —‘सिमी आतंकियों से जुड़ी ‘हसीना’ की तलाश’

ख़बर का शीर्षक किसी भी आम आदमी के होश उड़ा देने के लिए काफी है. जागरण ने अपनी ख़बर में बताया कि, ‘चार साल पहले बिजनौर के जाटान मुहल्ले में धमाका हुआ था. धमाके के बाद मची अफरा-तफरी का फायदा उठाते हुए धमाके में घायल छह लोग फरार हो गए थे. इनकी पहचान सिमी आतंकियों के रूप में हुई थी. इनमें से एक आतंकी को मुठभेड़ में तेलंगाना में मार गिराया गया था. दो को पकड़ा भी गया था. चार की गिरफ्तारी कर भोपाल जेल में रखा गया. 2015 में इन चारों ने जेल से भागने का प्रयास किया था. तब भोपाल पुलिस ने इन्हें एनकाउंटर में मार गिराया था. इन्हीं आतंकियों में से एक के साथ काजीपुरा की एक युवती की तस्वीर एजेंसियों को मिली है. तस्वीर में मौजूद सिमी आतंकी पिस्टल लिए है जबकि युवती अत्याधुनिक एके-47 लिए है.’
यही नहीं, ख़बर लिखने वाले रिपोर्टर ने अपने विचार लिखते हुए यह भी लिख दिया कि, ‘सूत्रों की मानें तो युवती स्लीपिंग माड्यूल है और आतंकियों के लिए फंड व वाहन की व्यवस्था करती है. सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो युवती के पकड़े जाने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आतंकियों और स्लीपिंग माड्यूल्स की कमर टूट जाएगी. पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भ्रमणशील हैं. जल्द ही बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश होगा. डीआइजी ओंकार सिंह ने बताया कि एजेंसियां अपने मूवमेंट की जानकारी नहीं देती हैं. इस संबंध में मदद मांगने पर एजेंसियों की मदद की जाएगी.’

इस ख़बर के छपते ही युवती के घर व आस-पास के लोगों में हड़कंप मच गया. युवती के पैरों तले जैसे ज़मीन ही खिसक गई. लेकिन उसने संयम से काम लिया और खुद ही थाने पहुंचकर फोटो की सच्चाई को बताया और इस पूरे मामले में बिजनौर पुलिस अधीक्षक अतुल शर्मा से जांच करने की गुज़ारिश की. यहां बताते चलें कि युवती का नाम हसीना नहीं, बल्कि नसरीन है. स्योहारा के क़स्बा सहसपुर की रहने वाली है.
इस ‘हसीना’ की गुज़ारिश पर पुलिस कप्तान ने एक जांच टीम का गठन किया. इसी दिन स्योहारा थाना अध्यक्ष धर्मपाल सिंह इसकी जांच करते हैं. एक ही दिन में वो अपनी रिपोर्ट पुलिस कप्तान को देते हैं और पुलिस कप्तान इसे तमाम मीडिया संस्थानों को भेज देते हैं.
रिपोर्ट में जांच अधिकारी लिखते हैं, नसरीन स्योहारा में अक्लीमा की शादी में आई थी. यहां कश्मीर का एक युवक जो समाजसेवी शादुल्लाह का सुरक्षा गार्ड है, की लाइसेंसशुदा एसबीबीएल बंदूक के साथ कुछ लोग फोटो खिंचा रहे थे. नसरीन ने भी अपना फोटो खिंचवा लिया. ये कश्मीरी युवक एक वैध सेक्युरिटी एजेंसी के साथ काम करता है. अख़बार इसी बन्दुक को एके-47 लिखता है. अख़बार ने ग़लत लिखा है. दरअसल, इस महिला का एक युवक के साथ विवाद है, जिसने यह फोटो वायरल किया है. पुलिस की इस जांच से साफ़ होता है कि यह सिर्फ़ एक फ़ोटो का मामला है, जिसे अख़बार ने आतंकी हसीना कहकर प्रचारित किया.

पुलिस के इस प्रेस रिलीज़ के बाद दैनिक जागरण 01 अगस्त को अपने बिजनौर एडिशन में एक ख़बर लगाई. अब इस ख़बर का शीर्षक था —‘पुलिस ने खंगाली ‘हसीना’ व कश्मीरी युवक की कुंडली’
अब अख़बार अपने ख़बर में लिखता है, ‘वायरल हुए फोटो में युवती के साथ नज़र आ रहा कश्मीरी युवक सहसपुर में ही फिलहाल निजी गनर के तौर पर एक राजनेता के पास तैनात है. बताया जाता है कि इससे पूर्व वह फोटो में साथ नज़र आ रही युवती के एक रिश्तेदार के यहां गनर के तौर पर तैनात था. तभी युवती की प्रेमी युवक की बहन के शादी समारोह में उससे मुलाकात हुई और युवती ने गनर के पास मौजूद हथियार को साथ लेकर फोटो खींच लिए. अब इन्हीं फोटो को लेकर संशय बना है. आशंका जताई जा रही है फोटो में नजर आ रही पिस्टल व दूसरा हथियार प्रतिबंधित प्रतीत हो रहा है. हालांकि एसओ धर्मपाल सिंह का कहना है कि कश्मीरी युवक गार्ड है और उसके हाथ में लाइसेंसी बंदूक है. उसका लाइसेंस की जांच कर ली गई है.’
लेकिन यही दैनिक जागरण इसी ख़बर में एक बॉक्स के अंदर यह भी लिखता है कि, ‘कश्मीरी युवक की तलाश में जुटी पुलिस’ आगे ख़बर में बताया गया है कि युवती के साथ फोटो में नज़र आ रहा कश्मीरी युवक अभी फ़रार बताया गया है… 

दैनिक जागरण की कहानी यहीं ख़त्म हुई. बिजनौर एडिशन को छोड़कर बाक़ी सारे एडिशन में एक दूसरी ख़बर आई है और इस ख़बर का शीर्षक है —‘स्लीपिंग माड्यूल्स की फंडिंग करते हैं ‘हसीना’ के गुर्गे’
इस बार ख़बर में यह भी लिखा गया कि, ‘जिले का नाम कभी स्लीपिंग माड्यूल्स तो कभी फेक करेंसी के कारण सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है. रविवार को काजीपुरा निवासी हसीना का नाम सामने आया. इसके बाद पुलिस अधिकारी और सुरक्षा एजेंसियां मंडल में सक्रिय हो गई. हसीना के रिश्तेदारों की धरपकड़ की जाने लगी. स्योहारा पुलिस ने हसीना के रिश्तेदारों से घंटों पूछताछ की. न तो हसीना की जानकारी हो पाई और न ही उससे जुड़े लोगों की. सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो हसीना के गुर्गे स्लीपिंग माड्यूल्स और आतंक से जुड़े लोगों के लिए फंड की व्यवस्था करते हैं.’
इस ख़बर के लिखने वाले आगे यह भी लिखा कि, ‘एजेंसियों के सामने एक तस्वीर आई है, जिसकी पड़ताल की जा रही है. इसमें एक युवती अत्याधुनिक बंदूक लिए बैठी है जबकि उसके पास में युवक शस्त्र लिए बैठा है. पड़ोस में बैठा युवक फौजियों की वर्दी के रंग की जैकेट पहने है. लिहाजा उसे निजी सुरक्षाकर्मी नहीं बताया जा सकता. फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां हसीना की कुंडली खंगालने में जुटी हैं. मुरादाबाद में निर्यातकों की संख्या अधिक होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि हसीना के गुर्गो के संपर्क शहर के निर्यातकों से हैं. हसीना पहले नई उम्र के युवकों को प्रेम जाल में फंसाती है उसके बाद उसे स्लीपिंग माड्यूल्स के रैकेट में शामिल कर देश विरोधी गतिविधियां कराती है. सुरक्षा एजेंसियों को कुछ नाम मिले हैं. जिनके आधार पर टीम छापेमारी कर रही है.’
रिपोर्टर का दिल इतना भर लिखने से भी नहीं भरा. अब उसने इस ‘हसीना’ के तार जोड़ने शुरू किए. ज़रा आप देखिए कि कैसे रिपोर्टर इस ‘हसीना’ के तार कहां-कहां जोड़ता है. अख़बार का रिपोर्टर सुधीर मिश्र आगे लिखता है कि, सूत्रों की मानें तो हसीना के तार लखनऊ से भी जुड़े हैं. कुछ दिन पहले राजधानी में हुए एनकाउंटर के कुछ दिन पहले ही वह उन लोगों से मिली थी, जो आतंक का सामान तैयार कर रहे थे. दिल्ली, मेरठ तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई जिले हैं, जहां हसीना का नेटवर्क फैला हुआ है. कुछ महीने पहले ही उसने काजीपुरा का घर छोड़ा है. उसके नए ठिकाने की भी तलाश एजेंसियां कर रही हैं. कुछ नंबरों को सर्विलांस पर लेकर टीमें हसीना और उसके गुर्गो की तलाश में छापेमारी कर रही हैं.

इस पूरे मामले में TwoCircles.net ने बिजनौर पुलिस कप्तान एसपी अतुल शर्मा से बात की. उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि, युवती का कोई आतंकी केनेक्शन नहीं है. हथियार लाइसेंसी है और प्रतिबंधित भी नहीं है. युवती ने अपने हाथ में लेकर फोटो खिंचा लिया. जांच करा ली गई है. फोटो वायरल कराने में एक युवक की इस षंड्यंत्र में भूमिका सामने आई है.
वहीं बुरी तरह से तनावग्रस्त नसरीन 3 दिन से बेहद परेशान हैं. नसरीन कहती हैं कि, अख़बार ने उसकी और समाज की छवि खराब की है, जिसके लिए वो अख़बार के ख़िलाफ़ अदालत में जा रही हैं. बिना पुष्टि किया ऐसी ख़बर किसी की भी ज़िन्दगी बर्बाद कर देगी.
इस संबंध में दैनिक जागरण से बात करने पर बिजनौर ब्यूरो इस ख़बर को मुरादाबाद से छपना बताता है और मुरादाबाद ब्यूरो डेस्क पर टाल देता है. कोई भी इस पर बोलने को तैयार नहीं है. सब अपना पल्ला झाड़ते हुए नज़र आते हैं.
-आस मुहम्मद कैफ़

Thursday, February 18, 2016

देश में चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है, ऐसा पक्षपात क्यों, और कैसे ??

 महात्मा गांधी ने अक्तूबर, 1931 में डा. बीआर अंबेडकर के बारे में कहा था, “उनके पास नाराज़ होने, कटु होने की तमाम वजहें हैं. वे हमारा सिर नहीं फोड़ रहे हैं तो ये उनका आत्म संयम है.”

इस बयान से ज़ाहिर है कि अंबेडकर और उनके समुदाय के साथ हुए अत्याचारों की पृष्ठभूमि में उनके द्वारा कटु शब्दों के इस्तेमाल को महात्मा गांधी ग़लत नहीं मानते थे.
बहरहाल, मैं अभी सतारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ एक दूसरे विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बारे में सोच रहा हूं.
दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरू की बरसी के मौक़े पर हुई विरोध सभा के मुद्दे पर कुछ छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज कराया गया है.
देशद्रोह “वह अपराध है जिसके तहत कुछ कहने, लिखने और कुछ अन्य काम करने से सरकार की अवज्ञा करने को प्रोत्साहन मिलता है.’’

पूर्वी दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महेश गिरी ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराई है. उन्होंने अपनी लिखित शिकायत में इन छात्रों को संविधान विरोधी और देशद्रोही तत्व कहा है.

गिरी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी ख़त लिखकर, “इस तरह के शर्मनाक और भारत विरोधी गतिविधियों के दोबारा नहीं होने देने के लिए अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी.”

यह हैदराबाद में हुई घटना को दुहराने जैसा लग रहा है, जहां बीजेपी ने याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर सख़्त कार्रवाई की थी. इस मामले का दुखद पहलू ये रहा है कि एक छात्र ने आत्महत्या कर ली.

हालांकि जेएनयू ने कहा कि उसने इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और उसने मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है.

लेकिन इस कमेटी में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. छात्र संघों का कहना है कि जांच कमेटी में उपेक्षित और हाशिए पर रहे समुदायों का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया है.

मेरे ख़्याल से भारतीय जनता पार्टी के सामने इस मामले में विकल्प था, छात्रों पर आरोप लगाने के बदले, उसे इस मुद्दे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जो सीधे जाति से जुड़ा पहलू है.

हैदराबाद में याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ दलित क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे थे? जेएनयू में मुस्लिमों पर इतना ध्यान क्यों है?

जब भी किसी कमेटी से जांच कराने की बात होती है तो छात्र हाशिए पर रहे समुदायों के प्रतिनिधियों की बात क्यों करते हैं? हक़ीक़त यही है कि भारत में दलितों और मुस्लिमों को ही सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी गई है.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, मृत्युदंड पाने वालों में कुल 75 फ़ीसदी और चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है. ऐसे में पक्षपात का मुद्दा उभरता है.

मालेगांव धमाकों का उदाहरण देते हुए कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि अगर चरमपंथी गतिविधियों में सवर्ण हिंदुओं के शामिल होने का मामला हो तो सरकार सख़्ती नहीं दिखाती है.

बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने की जल्दी नहीं है. राजीव गांधी के हत्यारों की सज़ा कम कर उसे उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया है.

इन लोगों को भी चरमपंथ का दोषी पाया गया था. लेकिन सबको समान क़ानून से कहां आंका जा रहा है?

इन सबमें मायाबेन कोडनानी को छोड़ ही दें, जिन्हें 95 गुजरातियों की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था, लेकिन वे जेल में भी नहीं हैं.

दूसरा मुद्दा आर्थिक है.
दलित और मुस्लिम ग़रीब लोग हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान अफ़ज़ल गुरु को लगभग नहीं के बराबर क़ानूनी प्रतिनिधित्व मिल पाया था.

इन वास्तविकताओं को देखते हुए, इसमें बहुत अचरज नहीं होना चाहिए कि दलित, मुस्लिम और उनके समर्थक सरकार का विरोध कर रहे हैं. उन्हें नाराज़ होने का पूरा हक़ है.
सवर्ण इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि हर भारतीय को इस भ्रम में जीना चाहिए कि हम एक पूर्ण समाज हैं और हर किसी को इसके सामने झुकना चाहिए.

हिंदुत्व मध्यम वर्ग और उच्च वर्गों के लिए मसला है. यह आरक्षण से घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि यह उनको मिल रही सुविधाओं में अतिक्रमण है.

यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण को पसंद नहीं करता और इस मुद्दे पर संघ के बयानों के चलते चुनावों में बीजेपी मुश्किल में आई थी.

प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया भी विपक्ष पर झूठ गढ़ने का आरोप रहा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई बिलकुल साफ़ है.

दलित अपनी आवाज़ उठा रहे हैं और अपने हक़ के लिए खड़े हो रहे हैं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. अगर उनकी भाषा में असंयम हो तो भी उन्हें अपराधी की तरह से नहीं देखा जा सकता.

सरकार के लिए अहम ये है कि उनसे जुड़े, उनकी बात सुने, उनके तर्क सुने, केवल उनके नारों पर नहीं जाए.

लेख की शुरुआत में मैंने गांधी जी की बुद्धिमता का उदाहरण दिया है. उसकी तुलना हिंदुत्व के नेताओं की पहले हैदाराबाद और फिर दिल्ली में की गई कार्रवाई से करके देखिए.

हमें इस मामले पर परिपक्व समझ दिखाना चाहिए, जब तक सरकार इस दिशा में कोशिश करती भी नहीं दिखेगी तब तक हमें इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि अब तक दबे और पीड़ित रहे लोग सरकार की अवज्ञा के लिए प्रोत्साहित करने वाले काम करते रहेंगे.

Thursday, January 07, 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के 'अहम' से हुआ 'नाकाम' पठानकोट ऑपरेशन!


आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पास पहले से ही एक जनवरी के सुनियोजित हमले के प्लान की खुफ़िया जानकारी थी.
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि पठानकोट हमले पर भारत की प्रतिक्रिया बिल्कुल नौसिखिया थी- आक्रमण अपर्याप्त था, कई फोर्स एक साथ ऑपरेशन में शामिल थीं, इसके बाद उपयुक्त हथियारों की कमी ने पूरे ऑपरेशन को करीब-करीब नाकाम कर दिया.
जब हमले शुरू हुए तब अजित डोभाल ने 150 एनएसजी कमांडोज़ को माणेसर से एयरलिफ्ट कराकर अनजान इलाके में लड़ने के लिए भेज दिया.
मिशन का नेतृत्व एनएसजी, डिफेंस सर्विस कॉर्प्स और वायु सेना के गरुड़ स्पेशल फोर्सेस को सौंप दिया गया.
डिफेंस सर्विस कॉर्प्स, सेवानिवृत और प्रेरणाविहीन सैनिकों का समूह है तो वहीं गरुड़ भारत की बढ़ते स्पेशल फोर्सेस के भीड़ के बीच अपने लिए औचित्य तलाश रहा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे ऑपरेशन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए डोभाल ने पठानकोट में पहले से तैनात 50 हज़ार सैनिकों को नज़रअंदाज़ कर दिया जो संभवतः पूरे देश में सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है.
रिपोर्टों की मानें तो डोभाल ने सेना प्रमुख से महज़ 50 से 60 फौजियों की टुकड़ी ऑपरेशन के बैक-अप के लिए मांगी थी.
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक सेना के पास कश्मीरी घुसपैठियों से लड़ने का ज्यादा अनुभव है.
एनएसजी इलाके से वाकिफ़ नहीं थी जिससे उसे नुकसान का सामना करना पड़ा जिससे बड़ी आसानी से बचा जा सकता था. इ
समें एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार भी शामिल हैं जिनकी मौत एक फंसे हुए चरमपंथी के शरीर में लगे ग्रेनेड फटने से हुई थी.
इस विस्फोट में चार अन्य एनएसजी कमांडोज़ घायल हो गए.
माना जा रहा है कि अगर सेना उनकी जगह होती तो चरमपंथियों के इस फंदे में कभी न फंसती क्योंकि वो इस तरफ के हमले से वाकिफ़ है.
सैन्य सूत्रों के मुताबिक एनएसजी के पास पठानकोट जैसे ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए नाइट विज़न डिवाइस और दूसरे ज़रूरी साजो-सामान तक नहीं थे.
चार दिन तक चले ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित थी.
हालांकि ऑपरेशन के 48 घंटे बीत जाने के बाद और मोदी, राजनाथ, पर्रिकर के ऑपरेशन के सफलतापूर्वक समाप्त होने की घोषणा के बाद करीब 200 सैनिकों को तैनात किया गया.
चार चरमपंथियों को मार गिराने के बाद प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षा मंत्री के बधाई संदेश आए. लेकिन इसके तुरंत बाद दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई.
इससे इस बात पर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि 1,200 हेक्टेयर में फैले एयरबेस में कितने बंदूकधारी छुपे हुए थे.
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक सोमवार रात तक रुक-रुककर गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके एयरबेस के अंदर से सुनाई पड़ रहे थे. हालांकि कोई भी ज़मीनी हक़ीक़त से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं था.
सोमवार दोपहर को उप एनएसजी कमांडो मेजर जेनरल दुष्यंत सिंह ने कहा कि ऑपरेशन अपने आखिरी चरम पर था.
जबकि मंगलवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने प्रेस वार्ता में कहा कि 6 चरमपंथियों को मार गिराया गया है. लेकिन पूरे एयरबेस को खाली कराने में अभी समय लगेगा.
पर्रिकर ने उस वक्त कहा था कि ऑपरेशन में कुछ खामियां हैं. हालांकि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया है.
समीक्षकों के मुताबिक 2008 मुंबई हमलों में हुए 166 लोगों की मौत के वक्त भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने जो गलतियां की थीं वे पठानकोट में भी दोहराई गईं क्योंकि किसी तय नीति के तहत ऑपरेशन को अंजाम नहीं दिया गया.
मुंबई हमलों के वक्त शुरू में 10 बंदूकधारियों के विरुद्ध स्थानीय पुलिस बल को तैनात किया गया था. बाद में उनकी जगह मार्कोस स्पेशल कमांडोज़ को लड़ने के लिए भेजा गया.
इसके बाद सैन्य कमांडोज़ ने मुंबई के तीनों हमले वाले इलाकों, दो होटल और एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र में मार्कोस की जगह ले ली.
बाद में एनएसजी ने सेना की जगह ली जिन्हें मुंबई पहुंचने में 12 घंटे का वक्त लगा.
सैन्य समीक्षक, सेवानिवृत मेजर जेनरल शेरू थपलियाल के मुताबिक पठानकोट ऑपरेशन में सुरक्षा एजेंसियों के क्रम और किसी एक के हाथों में कंट्रोल न होने से लड़ाई के नतीजे पर बुरा असर पड़ा.
उनके मुताबिक चार दिनों का वक्त पांच से छह चरमपंथियों को मार गिराने, वो भी एक सीमित जगह पर समझ के परे और अस्वीकार्य है.
लेकिन इस ऑपरेशन की एक सबसे महत्वपूर्ण बात रही कि चरमपंथी वायु सेना की संपत्ति, जैसे मिग-21 हेलीकॉप्टर का नुकसान नहीं कर पाए.
पठानकोट एयरफोर्स बेस पर चरमपंथी हमले पर काबू पाने में भारतीय अधिकारियों को चार दिन लग गए.
पाकिस्तानी सीमा के नज़दीक स्थित इस बेस पर हुए हमले में सात भारतीय सैनिक मारे गए जबकि 22 अन्य घायल हो गए.
मेरे हिसाब से सुरक्षा ऑपरेशन का संचालन पूरी तरह विफल रहा.

Wednesday, January 06, 2016

पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि बातचीत की प्रक्रिया चलती रहे अपने आप में सवाल है


तो पठानकोट हमला अपने आप में दो सवाल है। पहला, टैरर अटैक है या फिर पाकिस्तानी सेना की मदद से किया गया आतंकियों का सैनिक ऑपरेशन। और दूसरा भारतीय सुरक्षा एजेंसियों में आपसी तालमेल नहीं है या फिर सैनिक ट्रैनिंग के साथ आये आंतकवादियों के हमले को रोकने की कोई तैयारी नहीं है। दोनों हालात 67 घंटों के दौर में ही उभरे। और इन दोनों हालातों से आगे सबसे खतरनाक हालात यह भी रहे कि पहली बार एनएसजी के जवान आपरेशन शुरु होने से पहले ग्राउंड जीरो पर पहुंच चुके थे। यानी ऑपरेशन रात दो से तीन के बीच शुरु हुआ। जबकि एनएसजी के जवान एक जनवरी को रात ग्यारह बजे तक पठानकोट एयरबेस के भीतर पहुंच चुके थे। बावजूद इसके 7 सुरक्षाकर्मियों की शहादत हुई। 21 गंभीर रुप घायल हुये। और जिस तरह तीन दिन तक पठानकोट के भीतर बाहर आतंक के दायरे में देश बंधक सरीखा लग रहा था वह पहली बार इसके संकेत देता है कि हमलावर आंतकी जरुर थे लेकिन उनकी ट्रेनिग सेना के ऑपरेशन की तरह थी। क्योंकि एयरबेस के भीतर एनएसजी ने भी अपना आपरेशन क्लीन तरीके से किया। लेकिन डिफेन्स सिक्यूरटी कोर की ट्रेनिग की कमी, पुलिस, खुफिया एजेंसी और सेना के बीच तालमेल की कमी, जल्दबाजी में आरपेशन खत्म करने की सोच ने ही सात जवानो को शहीद कर दिया। 
क्योंकि आतंकवादियो ने एयरबेस में घुसते ही निशाने पर सबसे पहले यूनिफार्म में मौजूद चौकीदार जो कि डिफेन्स सिक्यूरटी कोर कहलाते है उसे लिया। जिन्हें कोई ट्रेनिग नहीं होती है कि ट्रेन्ड आतंकवादियो से कैसे लड़ना है। चार सुरक्षाकर्मी तुरंत मारे गये। एक सुरक्षा कर्मी एक आतंकी को मारने के बाद मारा गया। एयरफोर्स का एक जवान मुठभेड़ के दौरान मारा गया। और एमएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन की शहादत तब हुई जब जल्दबाजी में ऑपरेशन खत्म कर आतंकियों के बॉडी हटाने की प्रक्रिया शुरु हुई। और आखरी सवाल आईबी का काम भी क्या सिर्फ अलर्ट के साथ खत्म हो गया और जब पठानकोट जैसी महत्वपूर्ण जगह पर सेना की टुकड़ी तक मौजूद रहती है तो उसे तत्काल सक्रिय क्यों नहीं किया गया। और समूचा आपरेशन दिल्ली से ही एनएसजी के आपरेशन को क्यों जा टिका। यानी शुक्रवार को पहले अलर्ट के बाद 36 घंटे तक जो पठानकोट पूरी तरह सेना के जरीये सीज किया जा सकता था वह क्यों नहीं हुआ।

तो क्या देश के सबसे सुरक्षित और सबसे महत्वपूर्ण एयरबेस की सुरक्षा को लेकर हमारे सामने सवाल ही ज्यादा है । खासकर तब जब 18 किलोमीटर में फैले पठानकोट एयरबेस के भीतर सैनिको के परिवारो का एक शहर भी है। जिसके भीतर अस्पताल से लेकर स्कूल और बाजार से लेकर पार्क तक है। यानी छह किलोमीटर में शहर तो बाकि एयरबेस। और आतंकी यहा तक पहुंचे और तीन दिन बाद भी आपरेशन जारी है तो पांच बड़े सवाल हैं। पहला, हार्ड इनपुट होते हुये भी सिक्यूर्टी ग्रिड अलर्ट क्यों नहीं हुआ। दूसरा. आतंकवादी जब कश्मीर छोड़ मैदानी इलाको को चुन रही है तो हम कितने तैयार है। तीसरा, क्या सभी राज्यों के पास आंतकवाद से निपटने का इन्फ्रास्ट्रक्चर है। चौथा, आतंक को लेकर एनसीटीसी पर बहस फिर होगी या सहमति का कोई रास्ता बनेगा। और पांचवां अगर आंतकवादी मल्टी सिटी-मल्टी टारगेट को लेकर चले तब हमारा क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप क्या करेगा। यानी इन सवालों का जबाब देने की तैयारी से पहले यह जरुर सोचना होगा कि पठानकोट एयरबेस वह जगह है जहां से दुशमनों के दांत खट्टे करने की लिए सेना मौजूद रहती है और वही जगह पहली बार आ तंकवादियो के निशाने पर आ गई। इससे पहले गुरुदासपुर में भी निशाने पर सुरक्षाकर्मी ही थे। और सीमापार से घुसपैठ की जगह भी कमोवेश वही थी जो गुरुदासपुर के वक्त थी। यानी सवाल सिर्फ देश के भीतर आतंकवाद से लड़ने की तैयारी भर का नहीं है बल्कि पठानकोट का संदेश साफ है कि सीमा पार की नीति ही भारत को लेकर आतंकवाद के जरीये सौदेबाजी की है तो फिर पाकिस्तान को लेकर क्यो करना होगा इसकी रणनीति भी नयी बनानी होगी।

क्योंकि भारत- पाकिसातन के प्रधानमंत्रियों की आपसी मुलाकात हो या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारो की आपसी मुलाकात। पदो के लिहाज दोनों मुलाकात दो बराबर पदों के व्यक्तियों की मुलाकात कही जा सकती है। लेकिन सवाल जब पाकिस्तान का होगा तो समझना होगा कि आखिर जनरल राहिल शरीफ को भरोसे में लिये बगैर कोई मुलाकात किसी अंजाम तक पहुंच नहीं सकती और पठानकोट हमले के बाद तो यह सवाल कहीं ज्यादा गहरा गया है कि आखिर अब दोनों देशों का रुख होगा क्या। क्योंकि आतंकवादियों के पीछे पाकिस्तानी सेना थी इसे भारत में माना जा रहा है। और आतंकवादियो के खिलाफ पूरा आपरेशन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल की निगरानी में चल रहा है। इसे हर कोई मान रहा है। और भारत में यह माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना के नुमाइन्दे के तौर पर नवाज शरीफ के साथ बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नासीर खान जांजुआ की नियुक्ति के पीछे राहिल शरीफ ही है। यानी प्रधानमंत्री मोदी चाहे मुलाकातों का सिलसिला बढाये और बातचीत के अलावे पाकिस्तान के साथ संबंधों की डोर मजबूत करने की दिशा में अपने कदम दिखाये। लेकिन पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि इसके बाद बातचीत किस जमीन पर खड़े होकर किया जाये यह अपने आप में सवाल है । यानी विदेश सचिवो की मुलाकात में बात क्या होगी । डोभाल और जांजुआ की मुलाकात से निकलेगा क्या । यानी सवाल अब मुलाकात से आगे पाकिस्तान में इसी बरस होने वाले सार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के जाने या ना जाने का भी होगा। क्योकि अर्से बाद भारत के साथ रिश्तो की डोर पाकिस्तान में दो अलग अलग छोरों पर खिंची जाती दिखायी दे रही है। क्योंकि भारत के रुख को लेकर एक तरफ नवाज शरीफ हो तो दूसरी तरफ राहिल शरीफ। और इन दोनो के बीच प्रधानमंत्री मोदी संबंधों को पटरी पर लाने के लिये इतिहास रचने को बेताब हैं। जबकि पाकिस्तान पहली बार भारत को लेकर उस मोड़ पर जा खड़ा है जहां सेना और चुनी हुई सत्ता में ही खुली तकरार है। इसीलिये पहली बार आतंकवादी संगठनों को कैसे कब उपयोग में लाना है यह भी पठानकोट हमलो के बाद नजर आने लगा है।

पाकिस्तान के पन्नों को ही पलटे तो जनरल मशर्रफ से लेकर जनरल राहिल शरीफ। और हाफिज सईद से लेकर अजहर मसूद। बीच में सैय्यद सलाउद्दीन। पाकिस्तान में भारत के खिलाफ कश्मीर का सवाल हो या आतंक की चौसर पर डिप्लोमैसी का सवाल। बीते 19 बरस के दौर में इन्ही किरदारो के आसरे आंतक को स्टेट पालेसी बनाकर जो चाल चली गई भारत उसी में उलझ कर संबंधो की डोर कभी पड़ोसी के नाते तो कभी अंतराष्ट्रीय दबाव में उलझता रहा । सत्ता पलट के बाद जनरल मुशर्रफ ने वक्त के लिहाज से सैयद सलाउद्दीन को सबसे पहले कश्मीर का स्वतंत्रता सैनानी बताकर सियासत साधनी शुरु की । तो जनरल राहिल शरीफ ने अब सैय्यद सलाउ्द्दीन को उस मोड़ पर सामने ला खड़े किया जब आंतक पर नकेल कसने के लिये मोदी नवाज शरीफ एक रास्ते को पकड़ने निकल रहे है । क्योकि पठानकोट हमले की पहली जिम्मेदारी उस यूनाइटेड जेहाद काउंसिल ने ली जिसका चेयरमैन सैयद सलाउद्दीन है । काउसिंल में तमाम वही संगठन है जो कश्मीर की लड़ाई पाकिस्तान में बैठकर लड़ रहे है । यानी हाफिजद सईद भी सक्रिय है और अजहर मसूद भी । लेकिन जेहादी काउंसिल को कटघरे में खडा किया जाये तो पाकिस्तान के आंतक की जमीन पहली बार अलग दिखायी देने लगे । क्योंकि सैय्यद सलाउद्दीन कश्मीर से पाकिस्तान की जमीन पर पनाह लिये हुये आंतकवादी है । तो हाफिज सईद और अजहर मसूद पाकिस्तान के ही नागरिक है । यानी पठानकोट का रास्ता कश्मीर के जेहाद से कैसे जोड़ा जाये और आंतक के इल्जाम से कैसे बचा जाये इसकी बिसात पर पहला पांसा यूनाइटेड जेहाद काउसिंल का नाम लेकर फेंका गया है । यानी यह चाल जैश-ए-मोहम्मद को कटघरे से बाहर देखने के है । क्योकि जैश पर आरोप लगते है तो सवाल पाकिस्तान की सत्ता और सेना पर उठेगें । फिर हाफिज सईद के बाद अजहर मसूद ही पाकिस्तान में सत्ता के लिये सबसे अनुकुल शख्स है जिसकी तकरीर पर गरीब-मुफलिस तबका फिदायिन बनने को तैयार हो जाता है ।

याद किजिये रिहाई के तुरंत बाद कराची में हथियारो के साये में जैश के अजहर मसूद की जो तस्वीर सामने आयी थी वह आंतक की तस्वीर थी । लेकिन लश्कर के आंतकी चेहरे के सामने धीरे धीरे् जैश कमजोर दिखायी देने लगा । और उसके बाद लगातार यही माना जाता रहा कि अजहर मसूद खुद कभी सामने नहीं आया लेकिन उन संगठनो को मदद देता रहा है जो इस्लाम के नाम पर आंतक का खुला खेल खेल रहे है । लेकिन पठानकोट हमले के बाद जिस तरह सारे तार जैश से जुडे उसमें पाकिस्तान के लिये भी मुसिबत पैदा हुई कि आंतक की डोर अगर कश्मीर से इतर पंजाब जा रही है तो फिर उसकी अपनी जमीन खिसकेगी इसलिये पठानकोट हमला भी कश्मीर के दायरे में ही दिखाने के लिये यूनाइटेड जेहादी काउसिंल ने श्रीनगर के एक समाचार एंजेसी सीएमएस को फोन कर पठानकोट हमले की जिम्मेदारी ले ली ।

ऐसे में आखरी सवाल यही है कि आखिर भारत करे तो क्या करें । क्योंकि पठानकोट एयरबेस पर हुये हमले ने प्रधानमंत्री मोदी के 19 महीने की उस कवायद को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिस आसरे एक दो नहीं बल्कि पांच मुलाकात पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ से की । पांचों मुलाकात कुछ इस तरह की गई जिसने बार बार देश को चौकाया । पीएम बनते ही शपथ के वक्त नवाज शरीफ को बुलाना हो या फिर अचानक काबुल से लाहौर पहुंचकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देना । नेपाल में हाथ मिलाना हो या पेरिस में गुफ्तगु करना । हर मुलाकात में मोदजी ने देश कौ चौकाया । तो क्या देश को चौकाते वक्त प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के साथ भारत के जटिल रिश्तो की डोर को समझ नहीं पाये । जिसपर से वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह गुजर चुके है । याद कीजिये 2001 में संसद पर हुआ हमला हो या 2008 में मुंबई पर हुआ हमला। तब की सरकारों ने पाकिस्तान को क्या संदेश दिया। संसद पर लशकर के हमले के बाद तब के पीएम अटलबिहारी वाजपेयी ने तो आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया था। और मुंबई हमलों के बाद तो मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत के ना सिर्फ हर रास्ते को बंद किया बल्कि पीओके में आंतकी कैपो पर हमले तक का जिक्र कर दिया । यानी यह बोली नरेन्द्र मोदी के उस एलान से भी कई कदम आगे की रही जिसका जिक्र मोदी पीएम बनने से पहले पाकिस्तान को लेकर करते रहे।

तो क्या इतिहास को पढ़ने-समझने के बदले मोदी सरकार इतिहास रचने की बेताबी में जा फंसी। इसीलिये कभी हा कभी ना की सोच इस तरह खुलकर कहती रही जिससे कभी लगा कि मोदी सरकार वाकई पाकिस्तान को पाठ पढ़ाना चाहती है तो कभी लगा मोदी सरकार पाकिस्तान को ना बदलने वाले पड़ोसी की तर्ज पर देख रही है । क्योंकि एक सिर के बदले दस सिर का जिक्र करने वाली सुषमा स्वराज भी मुंबई हमलो के दोषी लखवी के जेल से छूटने पर पाकिस्तान से कोई बातचीत ना करने को कहती है। और इसके बाद इस्लामाबाद जाकर कैंडल लाइट डिनर करने से नहीं चुकती। तो रक्षा मंत्री पारिकर भी साल भर पहले पाकिस्तान को चेताते नजर आते है। लेकिन मोदी लाहौर जाकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देते है तो पर्रिकर भी बदलते है और मोदी सरकार का हर मंत्री ही नहीं बीजेपी से लेकर संघ परिवार भी पाकिस्तान को लेकर संबंधो की आस बनाता नजर आता है। क्योंकि मोदी की नवाज से दोस्ती में ही रिश्तो की नई डोर खोजी जाती है । लेकिन महज हफ्ते भर के भीतर ही रिश्तो की इस डोर में पहली गांठ पठानकोट में अगर लगती है तो सवाल फिर वहीं आ अटकता है कि अब आगे क्या ?
पुण्य प्रसून बाजपेयी

Tuesday, November 24, 2015

चिंगारी हमारी मूँछ तक आ गई है