Showing posts with label माओवाद. Show all posts
Showing posts with label माओवाद. Show all posts

Monday, October 22, 2012

अगर सर्वोच्च न्यायलय क़ानून का पालन नहीं करेगा तो न्याय पाने का क्या रास्ता बचेगा?


कानून के मुताबिक अगर कहीं कोई जुर्म हो तो एक नागरिक को उसकी जानकारी तुरंत पुलिस को देनी चाहिए ! क़ानून आगे कहता है की पुलिस अधिकारी तुरंत उस नागरिक द्वारा दी गयी सूचना को लिखेगा ! यही सूचना ऍफ़आईआर मानी जायेगी ! अगर वहाँ कोई पुलिस अधिकारी नहीं है या वह ऍफ़आईआर लिखने से इनकार  करता है तो वह नागरिक जुर्म की सूचना निकट के मजिस्ट्रेट को देगा ! मजिस्ट्रेट तुरंत पुलिस को इस सूचना से अवगत कराएगा और उसे मामले की जांच कर के अदालत के सामने पेश करने के लिए कहेगा !

अगर कोई मेरा हाथ तोड़ दे ! और मैं इसकी सूचना किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को दूं तो वह एक डाक्टर से मेरे हाथ की जांच करवाएंगे ! जांच में अगर मेरे हाथ की हड्डी टूटी हुई होगी तो जिस पर मैंने इलज़ाम लगाया है उसे गिरफ्तार किया जाएगा और उसे अदालत के सामने पेश किया जायेगा !

सोनी सोरी ने नाम लेकर कहा की अंकित गर्ग जो की दंतेवाडा का एस पी है उसने आठ अक्टूबर की रात को दंतेवाडा थाने के नए भवन में मुझे निवस्त्र किया , मुझे पैर के तलवों में बिजली का करेंट लगाया और मेरे शरीर के भीतर यह सब भर दिया ! सुप्रीम कोर्ट ने कोलकता मेडिकल कालेज से जांच का आदेश दिया ! जांच में सोनी सोरी के आरोप सही पाए गए ! डाक्टरों ने सोनी सोरी के गुप्तांगों से पत्थर के टुकड़े निकाल कर सर्वोच्च न्यायलय को अपनी रिपोर्ट के साथ भेज दिए ! इसके अलावा दंतेवाडा अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट में भी सोनी के तलवों में काले निशान दर्ज़ हैं इसलिए सोनी के आरोपों की पुष्टि दो दो अस्पतालों ने कर दी !

इसके बाद कानूनन जज को एस पी अंकित गर्ग को गिरफ्तार करने और और उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश देना चाहिए था ! 

सोनी सोरी के साथ एक जुर्म हुआ ! उसने देश के सबसे बड़े मजिस्ट्रेट अर्थात सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को इसके बारे में बताया ! जज ने डाक्टर से  की इसकी जांच करने के लिए कहा ! डाक्टर ने सोनी सोरी के इल्जामों को सच पाया ! जज के पास जुर्म के सम्बन्ध में और इस सूचना के बारे में विश्वास करने के काफी पक्के सबूत भी आ गए हैं की उसके सामने की गयी शिकायत में आगे जांच किये जाने की ज़रुरत है ! लेकिन आज तक जज ने इस मामले में आगे जांच करने का आदेश क्यों नहीं दिया ?

हमें कोई यह समझाए की इस देश का सर्वोच्च न्यायलय अगर बुनियादी क़ानून का पालन नहीं करेगा तो लोगों के पास न्याय पाने का क्या रास्ता बचेगा ?
क्या क़ानून में यह देख कर न्याय किया जाता है की सामने कौन खड़ा है ? नहीं ! क़ानून की आँखों पर पट्टी बंधी रहती है ! क़ानून के हाथ में तराजू रहता है जिसमे वह सबूतों को तौलता है और इन्साफ कर देता है !

क्या सोनी की जगह कोई दिल्ली की बड़ी जाति की लडकी के गुप्तांगों में कोई पुलिस आफिसर ऐसे ही पत्थर भर देता तो सुप्रीम कोर्ट का यही रुख रहता जो उसका सोनी सोरी के प्रति है ? क्या मीडिया ऐसे ही खामोशी अख्तियार करता जैसे अभी है ? क्या महिला आयोग तब भी ऐसे ही चुप होकर केस बंद कर के बैठ जाता

अगर हम आदिवासियों के साथ ऐसे ही अन्याय करने के मामले में एकमत हो गए हैं ! अगर हमने तय ही कर लिया है की हमारी अदालत, सरकार , मीडिया आदिवासियों के लिए नहीं है ! उनकी महिलाओं के साथ हमारा यह व्यवहार हमें स्वीकार है तो माफ़ कीजियेगा अपने आज़ाद मुल्क होने और इस देश के सब लोगों को सामान मानने के अपने दावे के झूठ को स्वीकार कीजिये और मानिए की हम अभी भी एक राष्ट्र नहीं बने हैं ! नागरिकों की समानता अभी हमारे मन और व्यवहार में नहीं है और हम जानते ही नहीं हैं की असल में देश किसे कहते हैं और देश भक्ति क्या होती है !
झंडे की जय और सेना की जय ही देश भक्ति नही होती बल्कि यह उससे कहीं ज्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी का नाम है !देश का मतलब पुलिस सेना और झंडे के साथ साथ यहाँ के करोड़ों लोग भी होते हैं ! और ये करोड़ों लोग हैं दलित , आदिवासी ,मजदूर , मेहनतकश औरतें और गाँव वाले  !

मुझे कहने दीजिये की अपने देश के लोगों के बारे में हमारी यह सोच इस देश की एकता के लिए असली खतरा है !

Sunday, October 21, 2012

माफ़ कीजिये कुछ लोग बदलने की बात कर रहे हैं



cartoon_storyजिस समाज में मेहनत करने वाले गरीब और कुर्सियां तोड़ने वाले अमीर हों, जहां सफाई करने वाले छोटी ज़ात और गंदगी करने वाले बड़ी ज़ात के माने जाते हों, जहां सारी कमेरी कौमें छोटी ज़ात कह कर पुकारी जाती हों, जहां शहरों में रहने वाले अमीर शहरी लोग अपने ही देश के गाँव में रहने वालों की ज़मीने छीनने के लिए अपनी फौजें भेज रहे हों, उस समाज को कौन लोकतान्त्रिक मानेगा?
करोड़ों मेहनतकशों को भूख और गरीबी में रख कर उनकी आवाज़ को पुलिस के बूटों तले दबा कर लाई गयी खामोशी को हम कब तक शांति मान सकते हैं.
हमने इस देश की आज़ादी के वक्त वादा किया गया था की गाँव का विकास होगा. गरीब की हालत सुधारी जायेगी. लेकिन अगर उसी गाँव में आज़ादी के बाद विकास तो छोडिये हम अगर गाँव वालों की ज़मीने छीनने के लिए सिर्फ पुलिस को ही भेज रहे हैं तो लोग इस सरकार को किसकी सरकार मानेंगे? लोग इसे किसकी आज़ादी मानेंगे? अगर आजादी से पहले लन्दन के लिए गाँव को उजाड़ा जाता था और अब हमारे अपने शहरों के लिए हमारे ही गाँव पर हमारी अपनी ही पुलिस हमला कर रही हो तो गाँव वाले इसे आज़ादी मानेंगे क्या?
हमने आज़ादी के बाद कौन सा विकास का काम बिना पुलिस के डंडे की मदद से किया है? क्या डंडे के दम पर लाया गया विकास लोगों के द्वारा लाया गया विकास माना जा सकता है?
यह कैसा विकास है? किसके गले को दबा कर? किसकी झोंपड़ी जला कर? किसकी बेटी को नोच कर? किसके बेटे को मार कर? किसकी ज़मीन छीन कर? यह विकास किया जा रहा है? हमें लगता है की इस देश के करोड़ों लोग इस बात को स्वीकार कर लेंगे कि हमारे गाँव के हज़ारों लोगों को उजाड़ कर उनकी ज़मीने कुछ धनपतियों को दे देना ही विकास है. क्या लोगों को यह पूछने का हक नहीं है की हमारी ज़मीन छीन लोगे तो हम कैसे जिंदा रहेंगे?
कल को जब यही लोग गाँव से उजड़ कर मजदूरी करने शहर में आ जाते हैं तब हम यहाँ भी उनकी बस्ती पर बुलडोज़र चलाते हैं. उनकी ज़मीने छीन कर बनाए कारखाने में काम करने जब यह लोग मजदूरी करते हैं और पूरी मजदूरी मांगते हैं तो हमारी लोकतंत्र की पुलिस मजदूरों को पीटती है.
ये कैसी पुलिस है जो कभी गरीब की तरफ होती ही नहीं? ये कैसी सरकार है जो हमेशा अमीर की ही तरफ रहती है. ये कैसा लोकतंत्र है जहां देश के सबसे बड़े तबके को ही सताया जा रहा है. और ये कैसा समाज है जो खुद को सभ्य कहता है पर जिसे यह सब दीखता ही नहीं है. यह कैसे शिक्षित और सभ्य लोग हैं जिनके लिए क्रिकेट और फ़िल्मी हीरो हीरोइनों की शादी ज्यादा महत्वपूर्ण है और देश में चारों ओर फैले अन्याय की तरफ देखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हो रही है.
ऐसे में हमें क्या लगता है? सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा? माफ़ कीजिये कुछ लोग उधर जंगल में कुछ कानाफूसियाँ कर रहे हैं. कुछ लोग लड़ने और कुछ बदलने की बात कर रहे हैं.
अब ये आप के ऊपर है की आप इस सब को प्रेम से बदलने के लिए तैयार हो जायेंगे या फिर इंतज़ार करेंगे की लोग खुद ज़बरदस्ती से इसे बदलें? लेकिन एक बात तो बिलकुल साफ़ है. आप को शायद किसी बदलाव की कोई ज़रुरत ना हो क्योंकि आप मज़े में हैं. पर जो तकलीफ में है वह इस हालत को बदलने के लिए ज़रूर बेचैन है.
और हाँ यह लेख किसी कम्युनिस्ट द्वारा नहीं लिखा गया है. अगर आपका विश्वास किसी गांधी या किसी महापुरुष या किसी धर्म में है तो मैंने जो कुछ भी ऊपर कहा है वह सब आपको आपके धर्म और महापुरुषों की शिक्षाओं में आपको मिल जायेगा.

Wednesday, September 26, 2012

खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिकता का मुहतोड़ जवाब देना होगा



हाल ही में छतीसगढ़ में 14 लोगों को माओवादी बता कर गोलियों से छलनी कर दिया गया. थोड़ा पीछे जाएं तो गुजरात में इशरत जहां का वो फर्जी इनकाउंटर याद कीजिए… सिर्फ यही दो घटनाएं नहीं, बल्कि देश भर में फर्जी इनकाउंटर हो रहे हैं. कहीं आदिवासियों को माओवादी कहकर मारा जा रहा है तो कहीं मुसलमानों को आतंकी कह कर गोलियों से भूना जा रहा है.
 
ठीक चार साल पहले दिल्ली के बटला हाउस में भी ऐसे ही मुस्लिम युवकों को पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा था. वही बटला हाउस ‘इनकाउंटर’ जिसको कांग्रेस के ही महासचिव दिग्विजय सिंह ने फर्जी इनकाउंटर बताया है. लेकिन इस इनकाउंटर के बाद भी पूरे देश से निर्दोष मुसलमान नौजवानों को पुलिस द्वारा पकड़ा जाना बंद नहीं हुआ है.
सिर्फ आजमगढ़ से सात नौजवानों को गायब कर दिया गया तो वहीं बिहार के दरभंगा से लगातार नौजवानों को पकड़ा जा रहा है. यहां तक कि एक नौजवान कतील सिद्दिकी की पूणे जेल में हत्या भी कर दी गयी. वहीं भारतीय खुफिया एजेंसियों ने दरभंगा बिहार के रहने वाले इंजीनियर फसीह महमूद को सउदी अरब के उनके घर से उनकी पत्नी निकहत परवीन के सामने से उठा लिया. जिन पर कोई तार्किक आरोप तक भारत सरकार नहीं लगा पायी है. बावजूद इसके भारत सरकार उनकी पत्नी को फसीह महमूद से मिलने तक नहीं दे रही है. इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई ने आईबी की भूमिका को जांच के दायरे में लाने का काम किया.
सरकार या कहें कि खुफिया एजेंसियों का सबसे दुखद और दमनकारी चेहरा उस समय सामने आता है जब इन फर्जी गिरफ्तारियों का विरोध कर रहे पत्रकार एसएमए काज़मी को आतंकी कहकर पकड़ लिया जाता है.
इसी तरह हाल ही में इन सवालों को लेकर काम कर रहे मानवाधिकार संगठन आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों का रिहाई मंच की ओर से बटला हाउस फर्जी मुठभेड़ की चौथी बरसी पर लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब में आयोजित कांग्रेस-सपा और खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिकता के खिलाफ सम्मेलन को पुलिसिया दबाव बना के विफल करने की कोशिश की गई. हालांकि अपने नापाक मंसूबे में वे कामयाब नहीं हो पाएं. लेकिन फिर भी सवाल उठना लाजिमी है कि जिस कार्यक्रम के बारे में लगभग सभी अखबार, मुख्यमंत्री से लेकर तमाम बड़े अफसर और नेताओं को पहले से जानकारी भेजी जाती हो, जो कार्यक्रम सार्वजनिक जगह यूपी प्रेस क्लब में हो रहा हो वहां इतनी संख्या में पुलिस की तैनाती की क्यों ज़रुरत आन पड़ी.
पुलिस को जवाब देने की ज़रुरत है कि आखिर ऐसी कौन सी आफ़त आन पड़ी कि एक पूरी तरह से अहिसंक और शहर के सम्मानित बुद्धिजिवियों की उपस्थिति वाले इस कार्यक्रम में पुलिसिया पहरा बिठाना पड़ा. पुलिसिया पहरा न सिर्फ प्रेस क्लब के भीतर था बल्कि क्लब के आसपास और सामने वाले पार्क में भी भारी संख्या में पुलिस मौजूद थी. कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए लोगों को ये पुलिस वाले ऐसे देख रहे थे मानों कितने बड़े गुनहगार हैं यह सब…
इसी कार्यक्रम में एक प्रस्ताव भी पास किया गया, जिसमें कहा गया कि खुफिया एजेंसियों के द्वारा सामाजिक और राजनीतिक संगठनों पर दी जा रही रिपोर्ट को आरटीआई के दायरे में लाया जाय. इस स्थिति में ये बहुत हास्यास्पद स्थिति है कि खुफिया विभाग के साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ किये जा रहे सम्मेलन में खुद खुफिया विभाग के लोग मौजूद थे और फिर यही लोग सरकार को इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी सौपेंगे. ऐसे में उस रिपोर्ट की निष्पक्षता पर कितना विश्वास किया जा सकता है.
दरअसल ये पूरा मामला सत्ता के टेकओवर का है. आज स्थिति ये है कि देश की सत्ता को खुफिया विभाग वालों ने टेकओवर कर रखा है. देश के खुफिया विभाग को कोई जनतांत्रिक सरकार नहीं चलाती बल्कि ये सीआईए, मोसाद और इन्टरपोल से सीधे संचालित होने लगीं हैं और सुरक्षा संबंधी आन्तरिक नीतियों को वैसे ही नियंत्रित करने लगीं हैं जैसे देशी-विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियां हमारी आर्थिक नीतियां नियंत्रित करती हैं. जिसका नजारा बार-बार हम कोडनकुलम, छतीसगढ़, झारखण्ड से लेकर नर्मदा घाटी में देख सकते हैं.
तब यह मांग उठना जायज ही है कि इन खुफिया एजेंसियों को मिलने वाले आर्थिक लाभ की भी जांच होनी चाहिए. भारतीय मीडिया भले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को व्यव्सथा बिगाड़ू चरित्र का बताती हो. सच्चाई ये है कि खुद भारतीय खुफिया एजेंसियां भी उसी चरित्र की हैं. इन्हीं के दबाव में देशद्रोह जैसे काले कानून को हटाने का साहस कोई भी सरकार नहीं कर पायी है.
लेकिन कुछ है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, कि चाहे लाख कोशिश कर लो दबाने की हमें… सम्मेलन के आरम्भ में ही रिहाई मंच के राजीव यादव ने पुलिस के सामने ही उन्हें ललकारने के तेवर के साथ जब खुफिया एजेंसियों और पुलिस विभाग को बेनकाब करना शुरु किया तो सम्मेलन कक्ष में मौजूद पुलिस वाले बगले झांकने लगे और थोड़ी देर में ही कक्ष से बाहर खिसक लिये.
फिर भी ये सवाल मौजूं-ए-बहस है कि क्या हम सच में एक फासिस्ट और हिटलरशाही वाले लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं?

Saturday, August 04, 2012

असम हिंसा: खतरे की घंटी




असम के बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों कोकराझार और चिरांग में हुई व्यापक हिंसा (जुलाई 2012) ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। प्रधानमंत्री स्वयं हिंसाग्रस्त क्षेत्र में पहुंचे और वहां के घटनाक्रम को देश के लिए कलंक बताया। उन्होंने हिंसा पर नियंत्रण करने में असफल रहने पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की जमकर खिंचाई भी की। क्षेत्र में सेना की तैनाती में अक्षम्य देरी हुई, जिससे हालात बिगड़ते चले गए। असम में जो कुछ घटा, उसमें बड़ी संख्या में लोगों की जानें तो गईं हीं, इससे भी अधिक त्रासद था लाखों लोगों का अपने घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाना। विशेषकर तब जबकि बुआई का मौसम शुरू ही हुआ था। इन लोगों को जिन राहत शिविरों में रखा गया है वहां सुविधाओं का भीषण अभाव है और इन शिविरों की संख्या भी जरूरत से बहुत कम है। एक अन्य दुःखद पहलू यह है कि इस हिंसा को बोडो और “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों“, जिनमें से अधिकांश मुसलमान हैं, के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है कि असम को जातीय हिंसा ने अपनी चपेट में लिया हो। परंतु हालिया हिंसा का व्यापक और दूरगामी प्रभाव पड़ने का अंदेशा है। इस क्षेत्र में स्थानीय जनजातीय समूहों और मुस्लिम अल्पसंख्यक, जिन्हें “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ कहा जाता है, के बीच कई दशकों से शत्रुतापूर्ण रिश्ते रहे हैं। सभी स्थानीय समस्याओं के लिए तथाकथित बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी बताया जाता रहा है। ऐसा प्रचार किया जाता रहा है कि असम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है। “असम असमियों के लिए है“, यह नारा भी उछाला जाता रहा है। यह नारा ठीक उसी तरह का है जैसा कि शिवसेना महाराष्ट्र में उछालती रही है। शिवसेना का भी कहना है कि महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए है। असम में व्याप्त इस गंभीर सामाजिक टकराव को केन्द्र व राज्य, दोनों ही सरकारें नजरअंदाज करती रही हैं।

इस आंतरिक टकराव का प्रकटीकरण पहली बार तब हुआ जब आल असम स्टूडेन्टस यूनियन ने मतदाता सूचियों में से “बांग्लादेशी घुसपैठियों“ के नाम हटाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन को भाजपा का पूरा समर्थन प्राप्त था। इसी दौरान अल्पसंख्यकों के खिलाफ भयावह हिंसा हुई। नेल्ली जनसंहार में कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार से ज्यादा मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस आंदोलन और जनसंहार के बाद हुए चुनाव आल असम स्टूडेन्टस यूनियन जो अब असम गणपरिषद के नाम से जानी जाती है, असम में सत्ता में आ गई। नेल्ली जनसंहार की जांच के लिए त्रिभुवनदास तिवारी आयोग की नियुक्ति की गई। असम गणपरिषद ने सत्ता में आने के बाद नेल्ली जनसंहार के दोषियों के खिलाफ सारे आरोप वापस ले लिए और तिवारी आयोग की रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

इसके एक दशक बाद, हिंसा का एक और दौर हुआ जिसके शिकार आज भी राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। पिछले दशक के शुरूआती वर्षों में बोडो जनजातीय नेताओं के साथ एक समझौता किया गया जिसके अंतर्गत बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद का गठन हुआ। इस परिषद के अंतर्गत चार जिले-कोकराझार, चिरांग, बक्सा व उदलगिरी रखे गए। समझौते के अंतर्गत, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार डालने थे जो उन्होंने नहीं किया और इन हथियारों का उपयोग अन्य स्थानीय निवासियों को आतंकित करने के लिए किया जाता रहा। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार, इन जिलों में बोडो आबादी का प्रतिशत 22 से 29 के बीच है। उनके अलावा, वहां संथाल, राजबंगी, अन्य आदिवासी और मुसलमान भी रहते हैं। बोडो इन जिलों में अल्पसंख्यक हैं। इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के बावजूद, बोडो समुदाय ने शासन के अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हुए ऐसी नीतियां लागू कीं जिससे गैर-बोडो निवासियों के सामाजिक-आर्थिक हालात बिगड़ते गए। इस क्षेत्र के गैर-बोडो निवासी बदहाली में जी रहे हैं और वे बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद के गठन के खिलाफ थे और हैं। हालिया हिंसा के पहले ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में हथियारबंद लोग इस क्षेत्र में घुस आए हैं। इसके बाद हिंसा शुरू हो गई।

असम के मुख्यमंत्री ने हिंसा के पीछे “विदेशी हाथ“ होने से इंकार किया है। इस क्षेत्र में असली समस्या यह है कि समय के साथ आबादी बढ़ गई है और खेती की जमीन व अन्य आर्थिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। इस दबाव से जनित समस्याओं को सुलझाने की बजाए क्षेत्र की आर्थिक बदहाली और वहां रोजगार की कमी के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी ठहराया जा रहा है। “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ शब्द पूरे देश व विशेषकर असम में बहुत लोकप्रिय हो गया है। मुंबई में जब बेरोजगारी का संकट बढ़ने लगा तो इसका दोष गैर-मराठी प्रवासियों के सिर मढ़ दिया गया। सच यह है कि बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों के कारण सारे देश में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है और इसके लिए किसी समूह विशेष को दोषी ठहराना व्यर्थ है। असम में समस्या और गंभीर इसलिए है क्योंकि जिन लोगों को समस्या के लिए दोशी ठहराया जा रहा है, वे विदेशी बताए जाते हैं। क्या यह सच है?

असम में बांग्लाभाषियों की बड़ी आबादी है। उनमें से अधिकांश मुसलमान हैं। क्या ये लोग हाल में यहां आकर बसे हैं? क्या उनकी घुसपैठ के पीछे कोई राजनैतिक लक्ष्य है? क्या वे केवल पिछले कुछ दशकों से ही यहां आते रहे हैं?

बांग्लादेशी घुसपैठियों के मिथक का इस्तेमाल लम्बे समय से पूरे देश के साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा अपने हित साधन के लिए किया जाता रहा है। यहां तक कि पूरे देश में इस मिथक ने जड़ें पकड़ ली हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के मसले को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। बंगाली प्रवासियों का असम में आने का सिलसिला 1875 के आसपास शुरू हुआ परंतु इसे गति दी अंग्रेजों ने 20वीं सदी के पहले दशक में। उस समय पड़ोसी बंगाल की आबादी बहुत ज्यादा हो गई थी और वहां राजनैतिक चेतना भी फैल रही थी। बंगाल में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक हो जाने के कारण वहां बार-बार अकाल पड़ रहे थे। इसके विपरीत, असम में आबादी बहुत कम थी और वहां से ब्रिटिश सरकार को अपेक्षित राजस्व प्राप्त नहीं हो रहा था। इस समस्या के सुलझाव के लिए ब्रिटिश सरकार ने “मानवरोपण“ कार्यक्रम शुरू किया, जिसके अंतर्गत बंगाल के लोगों को असम में बसने के लिए प्रेरित किया गया और उन्हें इसके बदले बहुत-से लाभ भी दिए गए। ब्रिटिश शासकों ने अपनी “फूट डालो और राज करो“ की नीति के अंतर्गत लाईन सिस्टम लागू किया जिसके अंतर्गत प्रवासियों और स्थानीय निवासियों को अलग-अलग क्षेत्रों में बसाया जाता था। बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम में बसने का यह सिलसिला लंबे समय तक चला और सन 1930 के आसपास, बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम की आबादी में अच्छा-खासा  हिस्सा हो गया था। आजाद भारत में असम में मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर उतनी ही रही है जितनी कि अन्य राज्यों की मुस्लिम आबादी की (स्त्रोतः मुस्लिम्स इन इंडियाः एस. यू. अहमदः जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित)।

आजादी के तुरंत बाद के सालों में असम की कुल आबादी और उसमें मुसलमानों के प्रतिशत संबंधी आंकड़े एकदम स्पष्ट हैं। हां, जिस समय पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के निवासियों का दमन कर रही थी उस समय कुछ बांग्लादेशी अवश्य भाग कर असम आएं होंगे। उसके बाद भी आर्थिक कारणों से असम में गरीब बांग्लादेशीयों के बसने का सिलसिला जारी रहा होगा, जैसा कि दुनिया के सभी हिस्सों में होता है। प्रश्न यह है कि हम इस आप्रवासन को किस दृष्टि से देखें। उदाहरणार्थ, भारत में बहुत बड़ी संख्या में नेपाली रहते हैं परंतु उन्हें न तो नीची निगाहों से देखा जाता है और न ही उनका दानवीकरण किया जाता है। यहां तक कि बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं के साथ प्रवासी के रूप में व्यवहार किया जाता है जबकि वहीं से आने वाले मुसलमानों को घुसपैठिया, भारत की सुरक्षा के लिए खतरा और न जाने क्या क्या बताया जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में व्यापार-व्यवसाय पर मुख्यतः राजस्थान के मारवाड़ियों का कब्जा है। असम में बिहारी भी बड़ी संख्या में रहते हैं।

भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के “घुसपैठियों“ के बारे में दुष्प्रचार के पीछे राजनैतिक निहित स्वार्थ हैं। जहां देश के दूसरे हिस्सों में मध्यकालीन इतिहास का इस्तेमाल मुसलमानों को दानव-रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है वहीं उत्तर-पूर्व में उन्हें घुसपैठिया बताकर राजनैतिक लक्ष्य साधे जाते हैं। यह अत्यंत दुःखद है कि नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चिस इन इंडिया भी इस दुष्प्रचार के झांसे में आ गया और उसके प्रवक्ता ने फरमाया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है! सच यह है कि भारत के विभाजन के समय भी असम में मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी थी। इसके बाद, आर्थिक कारणों से कुछ बांग्लादेशी असम में आ बसे होंगें। असम को विभाजित कर 6 नए राज्य बना देने के बाद मुसलमान मुख्यतः उस इलाके में बच रहे जिसे अब असम कहा जाता है, और शायद इसलिए प्रतिशत के लिहाज से उनकी आबादी कुछ ज्यादा प्रतीत होती है।

साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा बांग्लादेशीयों की कथित घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार और तीखा होता जा रहा है। यहां तक कि कई आमजन इसे सही मानने लगे हैं। असम में इस मसले पर कई आंदोलन होने से भी इस मिथक को बल मिला है। असम में मुख्य समस्या आर्थिक विकास का अभाव है न कि स्थानीय रहवासियों को घुसपैठियों द्वारा उनकी जमीनों से बेदखल किया जाना। असम का मसला मुंबई की शिवसेना-ब्रांड राजनीति और “साम्प्रदायिक विदेशी“ के मिथक का काकटेल है। इसके अलावा, इसमें नस्लीय मसलों को भी शामिल कर दिया गया है। नेल्ली से लेकर हालिया हिंसा तक लगातार एक समुदाय विशेष को उनके घरों और गांवों से खदेड़ने का क्रम चल रहा है। पहले घुसपैठ के नाम पर दुष्प्रचार किया जाता है और फिर प्रायोजित हिंसा होती है।

असम में सबसे पहली ज़रूरत है सभी समूहों का निशस्त्रीकरण। इसके बाद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विस्थापित लोग फिर से अपने गांवों में वापिस जा सकें और बुआई का मौसम खत्म होने के पहले खेती का काम शुरू कर सकें। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत बड़ी संख्या में गरीब लोगों के पास खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं बचेगा। पिछले सौ वर्षों के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों का निष्पक्ष अध्ययन और विश्लेषण कर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को “घुसपैठ“ का सच जनता के सामने लाना चाहिए। “बांग्लादेशी घुसपैठियों“ के नाम पर साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा खेली जा रही राजनीति का पर्दाफाश होना चाहिए। जो लोग हिंसा के शिकार हुए हैं उनके घावों पर मरहम लगाने का काम भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। उनके साथ सार्थक संवाद स्थापित करके और उन्हें न्याय दिलाकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया) 

Wednesday, March 28, 2012

ये शरीर मुझे अपना नहीं लगता, घृणा होती है!


सोनी सोरी का पत्र हिमांशु कुमार के नाम

sonisori
आप लोग कैसे हैं. गुरूजी मैं भी एक इंसान हूँ. इस शरीर को दर्द होता है. कबतक ऐसे अन्यायों को सहूँ, सहने की भी सीमा होती है. मुझे पेशी में पेश नहीं किया जा रहा है. ना ही कोई मिलने आ रहे हैं. ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ.
हमें तो ऐसा लगने लगा यदि मुझे कुछ हो भी जाये तो आपको मेरे पक्ष की खबर नहीं मिलेगी बल्कि विपक्ष की खबर मिलेगी. दिनांक १२.३.२०१२ को मेरी हालत गंम्भीर हो चुकी थी जिससे मुझे अस्पताल में भरती किया गया. भर्ती करने के बाद हमपर अनेक तरह का आरोप लगाया गया, ये महिला झूठ बोलती है, जानबूझकर नाटक करती है. इसलिये मैंने कहा था कि इलाज मैं यहाँ नहीं कराउंगी.
अगर मैं नाटक करती हूँ तो मुझे अंदरूनी में दर्द क्यों होता है? मैं तो छत्तीसगढ़ सरकार के लिये एक मजाक बनकर रह गई हूँ. जब मेरा सोनोग्राफी कराया गया, उससे पहले मुझे रोटी सब्जी खिलायी गयी और फिर सोनोग्राफी करायी गयी.सब तो कागजों पर लीपापोती करना था दूसरी बात न्यायालय का भी आदेश पालन नहीं किया गया. 
यदि मेरा चेकअप दिनांक 12 मार्च  से पहले होता तो शायद जो स्थिति पैदा हुई वो नहीं होती . गुरूजी आपके द्वारा दी गई शिक्षा की ताकत से बहुत सा मानसिक शारीरिक प्रताड़ना को सह रही हूँ. अब आपके शिष्य और नहीं सह सकती. दिनांक 6 मार्च  को मेरी पेशी थी.

जेलर मैडम जेलर अधीक्षक  से मेरी बहस हुई है. मैंने कहा कि इन सलाखों के अंदर रहकर हर नियमों का पालन कर रही हूँ. अबतक ऐसा कोई भी नियम का उल्लंघन नहीं किया जिससे आप कह सकें कि तुम गलती कर रही हो. मैं भी एक शासकीय कर्मचारी रही हूँ, इसलिए इतना तो समझती हूँ कि जो अनुशासन बना है उसे पालन करना हमारा अनिवार्य कर्तव्य है. फिर आप लोग मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो. पेशी ना ले जाना, स्वास्थ्य पर ध्यान ना देना, तब कहने लगा जेलर अधीक्षक कि ये सब मेरी जिम्मेदारी नहीं है.
तब मैंने कहा आप मुझे बंदी आवेदन दो ताकि सरकार को लेटर भेजकर पूछना चाहूंगी कि ये सब किसके जिम्मेदारी है. गैर जिम्मेदार व्यक्तियों और प्रशासन की देखरेख में हमें क्यों रखा गया. यदि आगामी दिनों में मुझे कुछ हो जाता है इसके जिम्मेदार कौन है. तब कहने लगा बिल्कुल लिखो जो करना है करो.
लेकिन बंदी आवेदन मांगती हूँ तो दे नहीं रहे हैं. कहते हैं ऐसी कोरा कागज पर लिखो.गुरूजी मैं क्या करूँ छत्तीसगढ़ में तो कानून व्यवस्था बनाये रखने वाले राहुल शर्मा जैसे ऑफिसर  अपमान, प्रताड़ना को सह नहीं पा रहे हैं और वे आत्महत्या कर ले रहे हैं.

आप सोचियेगा, इस वक्त मैं किन-किन हालातों से जूझ रही हूँ. ये शरीर मुझे अपना नहीं लगता, घृणा होती है. गुरूजी आपने हमें छोटे से बड़े होते देखा है. हम क्या थे और क्या हो गए.मिलने के लिये किसी को भेजियेगा, गलती पर क्षमा. छत्तीसगढ़ सरकार की अन्यायों से जूझती आपकी शिष्या की ओर से सभी को चरण स्पर्श, नमस्ते.

आपकी शिष्या

Monday, June 27, 2011

बीबीसी हिंदी के संवाददाता सलमान रावी को एक माओवादी का खुला खत



प्रिय सलमान रावी,
लाल सलाम।
बीबीसी में 18 और 19 मई को लगातार प्रसारित आपकी दो रिपोर्टें सुनने के बाद मैं खुद को यह खत लिखने से रोक नहीं पा रहा हूं। जाहिर है ये दोनों ही रिपोर्टें सलवा जुडूम और एसपीओ के बारे में थीं। आपने उनकी समस्याओं और उनके दिलों को हुए जख्मों’ का बड़ी संजीदगी के साथ जिक्र किया। उनकी तनख्वाहों और तकलीफों का काफी संवेदना के साथ बयान किया। आमतौर पर मीडिया और पत्राकारिता को लेकर यह बताया जाता है कि पत्रकारों को दोनों पक्षों के बारे में लिखना चाहिए। निष्पक्ष’ और तटस्थ’ होना चाहिए जिसकी आप और आपकी बीबीसी हर दूसरे दिन ढिंढ़ोरा पीटते हैं। लेकिन आपकी इन दो रिपोर्टों ने - बाकी को अगर छोड़ भी दें तो - साफ तौर पर साबित कर दिया कि आपके ये दावे कितने खोखले हैं। पर इसकी चर्चा से पहले कुछ और बातें की जाएं।
सलवा जुडूम के बारे में अब यह स्थापित हो चुका है कि यह कुछ और नहीं था बल्कि सरकार द्वारा खड़ा किया गया एक आतंकी अभियान था। केन्द्र व राज्य सरकारों ने - यानी केन्द्रीय गृह मंत्रालयसेना व पुलिस के आला अधिकारियों ने साझे तौर पर इसकी योजना बनाई थी। इसके लिए लोगों को अलग-अलग तरीके से इकट्ठा करगिरोह बनाए गए थे। इन गिरोहों से पैदा हुए एसपीओ और कोया कमाण्डो को बाकायदा प्रशिक्षित किया गया ताकि विद्रोह- विरोधी कार्रवाहयों (counter-insurgency operations) में इन्हें कारगर ढंग से आजमाया जा सके।इनके साथ सुविधा यह है कि इन्हें एक साथ कई मोर्चों पर लगाया जा सकता है और इन्हें अनेक नामों से बुलाया जा सकता है। पत्रकारों को रुकवाना है या स्वामी अग्निवेश जैसे लोगों पर अंडे फिकवाना है तो इन्हें सलवा जुडूम ‘आंदोलन’ से जुड़े हुए लोगों के रूप में पेश किया जा सकता है। किसी माओवादी कैम्प या दस्ते पर हमला करना है तो इन्हें बहादुर कोया कमाण्डो’ के रूपमें पेश किया जा सकता है। और आदिवासियों की हत्या,बलात्कारगांव-दहन आदि करतूतों को मुख्य रूप से इन्हीं लोगों के जरिए अंजाम दिलवाना कई मायनों में सरकार के लिए सुविधाजनक होगा। मैं नहीं समझता कि इन सभी पहलुओं से आप वाकिफ नहीं होंगे।
जब राजसत्ता ने लोकतंत्र’ का चोला ओढ़ रखा हो, ऐसे मेंजनसंघर्षों का दमन करने में उसके सामने कुछ पेचीदगियां होती हैं। उसे अलग-अलग संगठनों को सामने लाने पर मजबूर होना पड़ता है ताकि अपने दमनकारी व तानाशाहाना चेहरे को ढंक दिया जा सके। कभी-कभी अपने दूसरे अंगोंजैसे कि अदालतों या अन्य आयोगों के द्वारा उसके सामने मुश्किलें खड़ी की जाती हैं क्योंकि सभी अंगों पर लोकतंत्र का दिखावा करने का दबाव रहता है। इसलिए शासक वर्ग सलवा जुडूम को लाते भी हैं और किसी परिस्थिति में उससे मुकर भी जाते हैं। फिर उसे दण्डकारण्य शांति संघर्ष मोर्चा’ का नाम देते हैं या फिर मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच’ या बस्तर स्वाभिमान मंच’ का नाम दे देते हैं। उदाहरण के लिए चिंतलनार काण्ड में कोया कमाण्डो और एसपीओ को आगे किया गया। और उन्होंने इस सच्चाई को सफाई के साथ छुपा दिया है कि दरअसल इसकी योजना केन्द्रीय गृहमंत्रालय के निर्देश पर बनाई गई थी और इसेरमनसिंहविश्वरंजन व लांगकुमेर के मार्गदर्शन में एसएसपी कल्लूरी के हाथों अंजाम दिलवाया गया था। जनता को हमेशा भ्रम की स्थिति में रखना इनका मकसद होता है ताकि व्यवस्था पर लोकतंत्र’ का मुखौटा बने रहे। फिर मामला जब तूल पकड़ने’ लगता है तो राजसत्ता तुरंत ही अपने दूसरे अंगों को मोर्चे पर लगा देती है जैसा कि चिंतलनार की घटना में कलेक्टर और कमिशनर को उतारा गया और बाद में जांच के लिए एक आयोग का गठन किया गया। यह सारी कवायद वह इसलिए करती है ताकि मामले को ठण्डा’ किया जा सके और अपने लोकतंत्र’ का मखौल उड़ने से बचाया जा सके।
सलवा जुडूम कुछ और नहीं थाबल्कि मछलियों कोपकड़ने के लिए तालाब से पानी खाली करवाने’ की दरिंदगी भरी नीति थीजिसका केन्द्र बिंदु आदिवासियों को उनके रिहायशी इलाकों से, जहां वे हजारों सालों से रहते आ रहे हैंबाहर निकालकर रणनीतिक बसावटों (strategic hamleting) की योजना के तहत सड़कों के किनारे सरकारी कैम्पों में बसाना था। लेकिन कोई यूं ही आदिवासियों को अपनी जगहों से खदेडा नहीं जा सकता। उपनिवेशकाल से भी अगर देखेंगे तो पाएंगे कि आदिवासी अपने जंगल और जमीन के लिए जान दे सकता हैलेकिन कभी उससे अलग नहीं हो सकता। और वर्तमान संदर्भ मेंये आदिवासी पिछले 25 वर्षों (1980-2005)तक युद्ध से संगठित हो रहे थे। ऐसे में इन्हें जंगलों से खदेड़ना और राहत’ शिविरों में घसीटना भला कैसेमुमकिन?
मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि कुछ बुनियादी मामलों पर आपको स्पष्टता दिलाई जा सके। दुनिया के काउंटर इंसर्जेन्सी आज काउंटर टेर्ररिज़्म सिद्धांत को आपने पढ़ा ही होगा। मलया में 1940 के दशक में इसी नीति को लागू किया गया था। उसके बाद भारत के महान तेलंगाना किसान संघर्ष में ‘ब्रिग्स’ योजना के नाम से इसी नीति को लागू किया गया था। और पेरू जैसे कई लातिनी अमेरिकी देशों में भी इसे लागू किया गया था। बस्तर में भी सलवा जुडूम के नाम से इसी नीति को आजमाने की कोशिश की गई ताकि आदिवासियों कोजंगलों से खाली करवाया जा सके तथा टाटाएस्सार वगैरह-वगैरह को बिठाया जा सके। और साथ हीइसके एवज में रमनसिंहब्रजमोहन अग्रवालमहेंद्र कर्मा औरविश्वरंजन जैसों को हासिल करनी है मोटी दलाली। दुनिया भर में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और भारत के दलाल कार्पोरेट घराने संसाधनों की लूटखसोट के लिए कितने उतावले हैं और मौजूदा वैश्विक संकट के चलते यह उनके लिए कितना जरूरी हो गयायह बात आप भी जानते हैं।
अब यह सवाल अप्रासंगिक हो चुका है कि सलवा जुडूम एक आंदोलन था या नहीं था। इसके पीछे शोषक शासक वर्गों की रणनीति क्या रहीयह एक बार स्पष्ट कर लेने के बाद अब उसके बाकी पहलुओं को समझना मुश्किल नहीं है। यहां एक तरफ माओवादी और दूसरी तरफ सरकार (मीडिया की भाषा में) या फिर एक तरफ आदिवासी और दूसरी तरफ सरकार जिसके पीछे बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आदि - इन्हीं दो खेमों में बंटा हुआ नहीं है सब कुछ। विभिन्न प्रकार के मानवाधिकार संगठन (दोनों सरकारी और गैर-सरकारी) तथाकथित नागरिक समाजमीडिया आदि-आदि कई दूसरे पहलू हैं इस मसले के। तो क्या दिखलाकर या क्या बताकर इन सभी को चुप किया जा सकता थाया कम से कम इनके विरोध या प्रतिरोध को कम किया जा सकता था?यही सोचकर बड़े सुनियोजित तरीके से यह प्रचार शुरू किया गया था कि बस्तर में माओवादियों की नीतियों से नाराज आदिवासियों ने अपने आपको संगठित कर सलवा जुडूम’ आंदोलन शुरू किया। बार-बार दोहराकर यह बताया गया था कि माओवादी सड़कें बनाने नहीं देते हैंतेंदूपत्ता तोड़ने नहीं देते हैंआदिवासी संस्कृति के साथ छेड़छाड़ करते हैं आदि-आदि। उसके बाद शुरू हुआ बस्तर में एक काला अध्याय जिसकी तुलना में बहुत कम उदाहरण मिलेंगे। क्योंकि इसमें एक साथ घर जलाए गए। लोगों को काट-काटकर मार डाला गया। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। लोगों की लाशें नदियों में फेंक दी गईं। सम्पत्ति लूटी गई और बाहरी दुनिया को इस बारे में कुछ भी पता चलने नहीं दिया गया। हालांकि, सरकारी हिंसा और भी कई जगहों में हुई थी,लेकिन यहां जिस ढंग से हुईइसके उदाहरण इतिहास में बहुत कम मिलेंगे। जैसे कि एक ही गांव को एक बार नहींबल्कि कई बार किश्तों में जलाया गया। कुछ गांवों पर 30-35 बार तक हमले हुए। हर बार कुछ-कुछ लोगों को मार डाला गया। एक-एक गांव में 2-3 से लेकर 15-20तक लोगों की हत्या की गई। सिंगारमगोमपाड़,सिंगनमडुगुपालाचेलमाकोतरापालमनकेलीहरियाल,ताकिलोड़ओंगनार और भी दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां सरकारी बलों के हाथों मारे जाने वालों की संख्या दस-पंद्रह से ऊपर है। सामदामभेद और दण्ड के सभी हथकण्डे अपनाकर हर बार कुछ परिवारों को शिविरों में ले जाया गया।
लेकिनजैसा कि इतिहास में कई बार देखा गयाइतनी भारी हिंसा और बर्बरता के बावजूद भी लोगों ने घुटने नहीं टेके। आंदोलन खत्म नहीं हुआबल्कि मजबूत हुआ। माओवादी लड़ाकों के हौसले पस्त नहीं हुएबल्कि वे इस भीषण संग्राम में तपकर फौलाद बन गए। हालांकि इसके दूसरे पहलू भी हैं - कई जवान लड़के (चाहकर भी और न चाहते हुए भी) एसपीओ बन गए और कई लोग एक विकट परिस्थिति में जनता के ऊपर की गई सरकारी हिंसा और अत्याचारों में भागीदार बन गए और वहां सेपीछे आने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उसी मशीनरी (machinery) का हिस्सा बनकर तथाकथित राहत शिविरों में रह गए। कुछ तो पहले से लम्पट किस्म के थेकुछ ऐसे थे जिन्हें या जिनके परिवार के सदस्यों को क्रांतिकारी संघर्ष के दौरान किसी न किसी रूप से दण्डित किया गया था। कुछ नौजवान ऐसे भी थे जिन्हें दरअसल हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ना चाहिए थाजिनके साथ मारपीट कर या जान से मारने की धमकियां देकर जबरन एसपीओ बनाया गया। और इस तरह न चाहते हुए भी वे क्रांति के विरोधी खेमे में चले गए।
बहरहालइस तर्क को अब रद्दी के टोकरे में पहुंचा दिया जा चुका है कि माओवादियों की ‘गलतियों’ याज्यादतियों’ के चलते सलवा जुडूम आंदोलन’ शुरू हुआ था। आप पूछ सकते हैं कि क्या माओवादियों की कोई गलती नहीं रहीक्यों नहीं रहेगीकिसी भी आंदोलन के दौरान गलतियां होना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन गांवों को जलानाघरों को लूटनालोगों के शरीर के अंगों को काट-काटकर हत्या करनामहिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या - यह सब माओवादियों की किस गलती’ कोसुधरने के लिए किया गया माओवादियों की किनगलतियों’ के कारण जनता को ऐसी ‘सजाएं’ दी गईंइस आरोप में उतना ही दम है जितना कि बुश की उस दलील में था कि चूंकि इराक के पास मानव संहार के हथियार थेइसलिए उन्हें हमला करना पड़ा। और इसमें उतनी ही सच्चाई थी जितनी कि उसके उत्तराधिकारी ओबामा के इस दंभ में है कि लीबिया में उन्हें इसलिए बमबारी शुरू करनी पड़ी क्योंकि वहां पर गद्दाफी लोगों को मार रहा था।
और आदिवासी समाज के अंदर सलवा जुडूम से सांस्कृतिक विनाश जिस हद तक हुआ उसका अंदाजा तक लगाना मुश्किल है। एक ही परिवार का एक भाई क्रांतिकारी संघर्ष में है तो दूसरे को किसी न किसी तरीके से एसपीओ बनाया गया। ऐसे कई परिवार हैं। पढ़िए - बी.डी. दमयंती की किताब हरी-भरी जिंदगी पर कहर बरपाता राज्य। तो इसलिएएसपीओ और कोया कमाण्डो सिर्फ माओवादियों’ के दुश्मन नहीं हैं जैसाकि आपने अपनी रिपोर्ट में कहा है। वो पूरे बस्तर के आदिवासी समाज के दुश्मन बने हैं। बस्तर की संस्कृति के दुश्मन बने हैं। कुल मिलाकर बस्तरिया जन जीवन के दुश्मन बने हैं।
हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है। एसपीओ के साथ निपटने में क्रांतिकारी आंदोलन की नीति हमेशा वर्गीय दृष्टिकोण पर ही आधरित रही। मजबूरी में जनता के खिलाफ अपराधों में शामिल होने वालों को भी वापस गांवों में आने पर माफ किया गया। कई लोग जो एसपीओ बनकर या राहत’ शिविर में शामिल होकर प्रति-क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो चुके थेऐसे लोगों के भी खेतोंफसलोंमवेशियों और घरों को बचाकर रखा गया और जब वे माफी मांगकर वापस आ गए तो उन्हें उनके सुपुर्द कर दिया गया। कई एसपीओ वापस आ गए और गांवों में पहले जैसा रहने लगे हैं। और एकाध लोग अपनी रायफल के साथ भी भागकर चले आए। सिर्फ कट्टर और जालिम किस्म के एसपीओ के साथ सख्ती से निपटा जा रहा है जोकि जनता के हितों की रक्षा के लिए जरूरी भी है।
आखिरकार सलवा जुडूम पराजित किया गया। इसका श्रेय बुनियादी तौर पर बस्तरिया जनता के प्रतिरोधी संघर्ष को जाता है। और साथ ही जाता है उन तमाम जनवाद पसंदों प्रगतिशील ताकतों और जनवादी संगठनों को जिन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर भी अथक प्रयासों और कानूनी लड़ाइयों से सलवा जुडूम के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया। सलवा जुडूम के पराजित होने का मतलब यह है कि वह आज उस रूप में नहीं रहा जैसाकि वह 2005-08 के बीच हुआ करता था। सलवा जुडूम गया,लेकिन उसके द्वारा पैदा किए गए एसपीओ अभी भी हैं,बल्कि उन्हें अब और ज्यादा संगठित और विस्तारित किया गया।
अब फिर मैं आपकी रिपोर्टों की तरफ आता हूं जहां से मैंने इस खत की शुरूआत की। आपने बड़ी संजीदगी के साथ कह दिया है कि एसपीओ की कई समस्याएं हैं। हां जीहत्यारों की भी समस्याएं जरूर होती हैं ! गुण्डों और बलात्कारियों को भी जरूर कोई न कोई समस्या होगी ही। साल के बच्चे सरकारी सशस्त्र बलों ने अक्टूबर2009 को गोमपाड़ गांव के दो साल के नन्हे सुरेश की उंगलियां काट दीं और अक्टूबर 2005 में मूकावेल्ली गांव के एक डेढ़ साल के नन्हे बच्चे के सिर में गोली मारी से लेकर 80 साल की बूढ़ी तक को गोली मारकरगांवों को जलाकरघरों से मुरगेबकरों से लेकर जेवरकपड़े,बरतन तक लूटने वाले डकैतों और दरिंदों की भी समस्याएं होती हैं। समस्याएं सभी की हो सकती हैं। गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम करने वाले बाबू बजरंगी जैसे भाड़े के टट्टुओं को भी समस्याएं होंगी ही। यह आप पर है कि आप उनकी समस्याओं के प्रति कितना इत्तेफाक रखते हैं और कितनी संवेदना दिखाते हैं।
हांयह बात भी अपनी जगह दुरुस्त है सलमान जी!एसपीओ की भी तनख्वाएं बढ़नी चाहिए! उन्हें भी पक्के मकान मिलने चाहिए! बल्कि उन्हें पुलिस में ले लेना चाहिए! मीडिया के लगातार कवरेज से सरकार भी जरूर इस पर ध्यान देगी। देगी भी क्यों नहींआखिर माओवादियों का खात्मा जो करना है। उसके बाद क्या होगासलमान जी! आप खुद से सवाल कर लीजिए किऐसी रिपोर्टों से क्या आप गुण्डोंहत्यारोंडकैतों और बलात्कारियों को ‘सुविधओं’ की बात तो नहीं कर रहे?जाने या अनजाने में कहीं आप इस बात की हिमायत तो नहीं कर रहे कि उनकी करतूतों में और ज्यादा इजाफा होक्या आपको एहसास है कि दोनों पक्षों की रिपोर्टिंगया निष्पक्ष रिपोर्टिंग’ के फेर में आपने खुद को किस जगह पहुंचा दिया?! आप उन लोगों की समस्याओं औरसुविधाओं की चर्चा कर रहे हैं जिन लोगों की नियुक्ति व प्रशिक्षण तथा हथियारबंद कर आदिवासियों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने आपत्ति की और छत्तीसगढ़ सरकार की खिंचाई की?! जरा खुद से पूछ लीजिए कि आप कहां खड़े हैं?
सलमान जी! आपसे हमारा सीधा सवाल है कि क्याआपने अपने करीब एक साल के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान ऐसे किसी सलवा जुडूम से पीड़ित आदिवासी का कभी इंटरव्यू लिया जिसका घर जलाया गया हो या लूटा गया होया फिर जिसका कोई परिवार सदस्य मारा गया हो। चिनारी और ओंगनार गांवों के लोगों की बमुश्किल10 सेकण्ड वाली एक आडियो क्लिप को को छोड़ दें तो आज तक आपने कभी भी किसी आदिवासी की आवाज अपनी रिपोर्ट में नहीं सुनाई जो सरकारी बलों की बर्बरता का शिकार हुआ हो। क्या आपने किसी ऐसी महिला कीआपबीती सुनने की कोशिश की जिसके साथ तथाकथित सुरक्षा बलों ने बलात्कार किया हो। क्या आपने तिम्मापुरममोरपल्लीताड़िमेट्ला और पुलानपाड़ के सरकारी हिंसा से पीड़ित लोगों के दिलों में हुए ताजा जख़्मों को छूने की कोशिश कीक्या आपने यह देखने की कोशिश की कि घर जलाए जाने के बाद वे किन हालात में जी रहे हैंउनकी क्या समस्याएं हैं और क्या परेशानियां हैंउन्हें खाने को कुछ मिल भी रहा है या नहींक्या आपने इसकी रिपोर्ट करने की कोशिश की?जब ताडमेटला और उसके आसपास के ग्रामीणों के शरीर पर हुए गहरे जख्म, दिलों के जख्मों का भरना तो नामुमकिन है भरे तक नहींआपका अपनी रिपोर्ट में यह कहना कि सलवा जुडम के कैम्पों में रहने वाले अपने दिलों में कई जख्मों को लिए जी रहे हैं’, क्या बस्तर के दसियों हजार लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कना नहीं है?
तटस्थ’ या निष्पक्ष’ रिपोर्टिंग से बड़ा भद्दा मजाक कुछ और नहीं हो सकता। यहां लकीरें साफ तौर पर खींची हुई हैं। एक तरफ बस्तरिया जनता है जो अपने जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए और अपने घरों को,खेतों कोफसलों को और बच्चों को बचाने के लिए लड़ रही है जिसका नेतृत्व माओवादी पार्टी और उसकी सेना पीएलजीए कर रही हैं। दूसरी तरफ सोनियामनमोहन,चिदम्बरमप्रणब मुखर्जीमोंटेक सिंहरंगराजनरमनसिंह,महेंद्र कर्माविश्वरंजनलांगकुमेरकल्लूरी जैसे लोग हैं जो दरअसल टाटाएस्सारजिंदलमित्तलअम्बानी आदि बड़े कार्पोरेट आकाओं और साम्राज्यवादियोंखासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के दलाल हैं। पुलिसअर्धसैनिककोबरा,एसटीएफकोयाएसपीओसलवा जुडूमशांति संघर्ष मोर्चा,मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच-चाहे जो भी नाम हो-सभी भाड़े के टट्टू उनकी राज मशीनरी के अलग-अलग पुरजे हैं। इन परस्पर विरोधी खेमों के बीच ऐसी कोई जगह ही नहीं है जिसे तटस्थ’ कहा जा सके और जहां पर खड़े होकर रेफरी का काम किया जा सके।
वैसे ताड़मेटलाचिंतलनार और मोरपल्ली गांवों में उड़ रही राख से भरी धूल और खण्डहरों में तब्दील हुए घरों के बीच खड़े होकर आप क्या निष्पक्ष’ रिपोर्टिंग करेंगेयही न कि यहां का पूरा इलाका बारूदी सुरंगों से पटा पड़ा हैऔर यहां जाने वाली सड़कों में कदम-कदम पर मौत बिछी हुई है। आप मीडिया वालों को माओवादी हिंसाका शब्द मुंह से निकालने में तनिक भी देर नहीं लगती! लेकिन आंखों के सामने मची बर्बरता को देखने के बाद भी एसपीओ से आप बड़े प्यार से पूछते हैं कि अच्छा,तिम्मापुरम में घरों को कौन जलाया था। जब आपको सरकार द्वारा बरती गई हिंसा पर मजबूरी में कुछ कहना भी पड़ता है तब भी आप बड़ी सावधनी से कथित’ शब्द जोड़ना नहीं भूलते हैंजबकि इसके आपके पास पर्याप्त सबूत मौजूद होते हैंजिसके आधर पर आप साफतौर पर कह सकें कि हांघरों को कोया कमाण्डोएसपीओ और कोबरा बलों ने चिदम्बरमरमनसिंहशेखर दत्त और विश्वरंजन द्वारा रची गई साजिश के तहत ही जलाया था।
यह रिपोर्ट लिखते-लिखते 26 मई को छत्तीसगढ़ में बारूदी सुरंगों के बारे में भी आपकी रिपोर्ट आ गई रेडियो बीबीसी हिंदी में। और आपने गरियाबंद में मारे गए पुलिस वालों के जनाजे की ही नहींबल्कि आपने एक प्रकार से उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट’ तक पेश कर दी अपनी रिपोर्ट मेंयह कहकर कि लाशों को देखने से ऐसा लगता है कि मरने के बाद माओवादियों द्वारा धरदार हथियारों से काट दिया गया होगा ;माओवादियों के कट्टर दुश्मन दैनिक भास्कर तक ने ऐसा लिखने का साहस नहीं किया। मेरा आपसे एक और सीध सवाल है कि क्या आपने ऑपरेशन ग्रीनहंट के दौरान अगस्त 2009से दिसम्बर 2010 तक सरकारी बलों द्वारा मारे गए 181बस्तरिया आदिवासियों में से किसी एक की भी लाश के बारे में कभी रिपोर्ट पेश कीछोड़िएकिसी आदिवासी की लाश को अपनी आंखों से देखा?
और जहां तक आपकी बारूदी सुरंग वाली रिपोर्ट का सवाल हैउसमें यह दोहराने के चक्कर में कि यहां कदम-कदम पर बारूदी सुरंगों का खतरा है’ आप इस कठोर सच्चाई को पूरी तरह नजरअंदाज कर गए कि दरअसल शोषक शासक वर्गों ने टाटाएस्सारजिंदल,मित्तल जैसे कार्पोरेट घरानों को यहां आमंत्रित कर बोधघाटरावघाट जैसी विनाशकारी परियोजनाएं शुरूकर तथा इन्हें बिना किसी विरोध के आगे बढ़ाने की मंशा सेपहले सलवा जुडूम’ और बाद में ऑपरेशन ग्रीन हंट’ शुरू कर बस्तरिया जनता की जिंदगी को पहले से एक महा विस्फोट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। किसी चीज के ऐतिहासिकसामाजिकराजनीतिक व आर्थिक पहलुओं की तह तक जाने की कोशिश किए बगैर सतही व सनसनीखेज बातों तक सीमित होनाक्या यही हैतटस्थता’ जिसका दावा बीबीसी बार-बार करती हैजब20-25 झोंपड़ियों वाले किसी गांव को चारों तरफ से अत्याधुनिक मारक हथियारों से लैस 500 से लेकर 1000-1200 तक ‘सुरक्षा’ बल घेर लेते हैं जो भी आदमी मिलता है तो उसे मार डालते हैं जहां महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार एक आम बात हैजहां फर्जी मुठभेड़रोजमर्रे की सच्चाई है घरों में आग लगाना जहां एसपीओकोया कमण्डो और सीआरपीएपफ का रूटीन का काम है - ऐसी जगह पर लोगों के पास बचाव के क्या उपाय बचे हैंजरा हमें बताइए। क्या जनता को आत्मरक्षा करने का अधिकार नहीं हैजरा आप खुद को उस जगह पर खड़े करते हुए एक बार कल्पना कीजिए - क्या ऐसी परिस्थितियों में आप किसी न किसी तरीके से प्रतिरोध करेंगे या नहींइसके लिए कोई न कोई औजार या हथियार ढूंढ़ेंगे या नहींबसबस्तर की जनता भी यही कुछ कर रही है। इसी पृष्ठभूमि में बस्तरिया जनता के पास प्रेशर बम’, ‘टिफिन बम’, ‘बूबी ट्रैप’, ‘बारूदी सुरंग’ आदि अस्त्र-शस्त्र आ गए। किसी इलाके पर कब्जा करने के लिए नहींकिसी का घर उजाड़ने के लिए नहीं,किसी की जमीन छीनने के लिए नहीं... सिर्फ और सिर्फ अपने आपको जिंदा रखने के लिए उन्हें ये सब इकट्ठा करने पड़ रहे हैं। हालात ने ही जनता को हथियार उठाने और बारूद बिछाने पर मजबूर किया। लेकिन एक बात साफ है। अगर जनता का यह प्रतिरोधखासकर 2005 से लेकर अभी तक जारी संगठित व सक्रिय प्रतिरोध नहींरहातो यहां आज कुछ भी नहीं बचता। कॉर्पोरेट दैत्यों के विकास’ बुलडोजर तले पिसकर अब तक आधे बस्तर कब्रिस्तान में तब्दील हो चुका होता। जगदलपुर में टाटा,एस्सारजिंदलमित्तल जैसी बड़ी-बड़ी कार्पोरेट कम्पनियों के अलीशान दफ्तर खुल चुके होते जिसके इर्द-गिर्द कॉर्पोरेट मीडिया के लोग वफादार कुत्तों की तरह पूंछ हिलाते हुए घूमते रहते!
हांबमों या बारूदी सुरंगों के इस्तेमाल में कभी-कभी गलतियां हो रही हैं। कुछ घटनाओं में आम लोग मारे गए हैं। हमें खेद है। जो खून बहा है वह हमारा ही था,हमारे अपने ही लोगों का था। इतना ही नहींबारूद के इस्तेमाल और प्रयोगों के दौरान मारे गए हमारे कार्यकर्ताओं और जन मिलिशिया की संख्या भी कम नहीं है। हम ऐसी हर गलती से सीख ले रहे हैं। लेकिन किसी गलती को दिखाकर पूरे संघर्ष पर और उसके औचित्य पर उंगली उठाना कहां तक जायज हैजरा सोचिए। गलती के लिए हमारी आलोचना कीजिए। हमारी खामियों और कमियों की चर्चा कीजिए। आपका हमेशास्वागत है। बहस को असली समस्याओं पर फोकस करने वाले ईमानदार और निर्भीक लोग ही यह काम कर सकते हैं।
बस्तरकुल मिलाकर दण्डकारण्य का संघर्ष आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच चुका है। इस संघर्ष को कुचलने के लिए शासक वर्ग एड़ी-चोटी एक कर रहे हैं। अब सेना भी उतार दी गई है। भारतीय सेना औरबस्तरिया जनता के बीच एक भीषण संग्राम शुरू होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा है। इस पर सभी की नजरें हैं। खासकर उन कॉर्पोरेट गिरोहों की जो यहां एक बारआदिवासियों या माओवादियों का सफाया होते ही इस पूरी धरती को दबोचने के लिए ताक में बैठे हुए हैं। ये इतने खतरनाक हैं कि इनके पास देशों तक को खरीद सकने वाली दौलत मौजूद है। इनकी पहुंच काफी दूर तक है। मीडिया पर पूरा इन्हीं लोगों का नियंत्रण है जोकि आप भी जानते हैं। देश की निधर्नतम जनता के खिलाफ कॉर्पोरेट वर्गों द्वारा छेड़े गए इस युद्ध में कॉर्पोरेटमीडिया द्वारा संचालित मनोवैज्ञानिक युद्ध एक अहम हिस्सा है। अंत मेंआपकोआप जैसे उन तमाम पत्रकारों कोजो निष्पक्षता’ या तटस्थता’ का झण्डा उठाए हुए हैं मेरी अपील है कि आप इस गलतफहमी से बाहर आइए। क्योंकि न्याय और अन्याय के बीच तटस्थता’ नहीं रहती। क्योंकि शोषकों और मेहनतकशों के बीच निष्पक्ष’ नहीं रहता।
विनम्रता के साथ,
अमन,
दण्डकारण्य से
जून २०११