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Saturday, February 13, 2016

एक बार फिर से पूरे देश ने देख लिया मीडिया आरएसएस की मिलीभगत को

 आरएसएस की मीडिया और जनता का जेएनयू
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में कथित तौर पर अफज़ल गुरु की शहादत दिवस मनाने और कश्मीर की आज़ादी के लिए भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले छात्रों के एक गुट के बहाने देश की मीडिया जनवादी रुख वाले छात्रों को जिस तरह से परेशान कर रही है उससे यह साबित होता है की पत्रकारिता अब सच और ईमानदार का साथी के बजाए सत्ता और कट्टरता के पुजारियों की हो गई है. 
इण्डिया न्यूज़ के दीपक चौरसिया तथा ज़ी न्यूज़ के रोहित सरदाना ने जेएनयू मुद्दे को लेकर जैसा रुख अख्तियार किया है वह साफ़ तौर पर यह दर्शाता है की इन दोनों चैनलों के मालिक और उसके एंकर-रिपोर्टर पूरी तरह से नागपुर के इशारों पर काम कर रहे हैं.

रोहित सरदाना के साथ पैनल डिस्कसन में दिल्ली विवि के छात्र उमर खालिद एवं दीपक चौरसिया के साथ बहस में शामिल जवाहर लाल नेहरु विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष कनैह्या कुमार से इन दोनों एंकर ने जैसा व्यवहार किया बिलकुल वैसा व्यवहार एबीवीपी के गुंडे किया करते हैं. 

हैदराबाद विवि के दलित रिसर्च स्कालर डॉ रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या में शामिल एबीवीपी, केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, स्मृति ईरानी की आज तक गिरफ्तारी नहीं हुई परन्तु जेएनयू में सांस्कृतिक संध्या आयोजित करने के अपराध में दिल्ली पुलिस ने छात्रसंघ अध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया. 

इस गिरफ्तारी के लिए रोहित सरदाना और दीपक चौरसिया लगातार दबाव बनाए हुए थे. पैनल डिस्कसन जिसे घेर कर प्रताड़ित करना कहना ज्यादा ठीक रहेगा में रोहित सरदाना और दीपक चौरसिया ने उमर खालिद और कन्हैया कुमार पर देशद्रोही और आतंकी का समर्थक तक कहा जबकि दोनों छात्र नेताओं ने देशद्रोह से इंकार किया और उस छात्र समूह जिसने जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी की थी की निंदा की. 

निंदा के साथ उनके कुछ बुनियादी सवाल भी थे जिसे सुनने की हिम्मत वर्तमान में मीडिया के पास नहीं. कन्हैया को बिल्कुल जान से मार देने को उतावले दीपक चौरसिया ने जब कन्हैया को कश्मीरी पंडित के मामले में उलझा कर निरुत्तर करना चाहा तो उसने दो गुने तर्क से चौरसिया को चुप करा दिया, कन्हैया को जब चौरसिया ने मकबूल भट्ट की हिंसक वारदातों में लपेटना चाहा और कहा तब आप पैदा भी नहीं हुए थे तो कन्हैया ने चौरसिया को बोला देश जब आज़ाद हुआ था तब आप नहीं पैदा हुए थे इसका अर्थ यह नहीं है की आप देश की आजादी पर बात नहीं कर सकते. 

एबीवीपी के छात्र नेता के उकसाने पर दीपक चौरसिया ने कन्हैया से भारत माता की जय बोलने के लिए डांटते हुए कहा तो कन्हैया ने भारत की तमाम माताओं, पिताओं, बहनों, मजदूरों, दलितों, मुसलमनों की जय कर दी तो दीपक हत्थे से उखड़ गए.
  
जिंदल प्रकरण में जिस चैनल का मालिक जमानत लिया हो, जिसका एंकर तिहाड़ जेल में दिन रात गुजार चुका हो उस जी न्यूज़ के एंकर रोहित सरदाना से उमर खालिद की मुठभेड़ होती है. सरदाना कहते हैं, पांच सौ करोड़ रुपये की सब्सिडी सरकार देती है जेएनयू को, आप मुफ्त की रोटी तोड़ने जाते हैं, आतंकियों का समर्थन करते हैं तो उमर खालिद ने कहा वह टैक्स सिर्फ आपका नहीं है. वह टैक्स हमारा भी है. क्या कभी आपने सवाल किया कि आर एस एस जिस तरह से संसाधनों पर कब्ज़ा कर रही है, हमारे टैक्स का इस्तेमाल गुंडागर्दी और कट्टरता फैलाने के लिए कर रही है उससे सवाल किया जाएगा तो हम भी जवाब देने को तैयार हैं. 

अफज़ल गुरु की न्यायिक हत्या पर उमर खालिद से लेकर कन्हैया कुमार तक ने जजमेंट को कोट किया कि सबूत तो कुछ नहीं है पर देश की सामूहिक भावना इनकी फांसी पर आ कर रूकती है इसलिए फांसी ज़रूरी हो जाती है. बगैर सबूत किसी को फांसी पर लटका देंगे और सवाल उठेगा तो देशद्रोही कह देंगे. 

आज देश की मीडिया में दीपक चौरसिया और रोहित सरदाना जैसे तमाम पत्रकार और एंकर आरएसएस की ब्राह्मणवादी विचारधारा जिसमें दलितों/पिछड़ों/मुसलमानों/औरतों के लिए कोई जगह नहीं है के लिए जनवाद के पेड़ जेएनयू को काट देना चाहते हैं. इतनी हताशा और पागलपन टीवी पर करोड़ो दर्शक देख रहे हैं. जेएनयू और दिल्ली विवि के जनवादी छात्र नेताओं से टीवी स्टूडियो भरा पड़ा है ,पहली बार ऐसी बहसें सुनने और देखने को मिल रही हैं जिसमे भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा पूरी तरह से सामने आया है. 

ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष चन्द्र हिसार से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी रहे और चुनाव हार गए. दीपक चौरसिया और रोहित सरदाना का देशप्रेम एक विचारधारा विशेष की सीमाओं तक जा कर दम तोड़ देता है. आर एस एस की शाबाशी पा कर हिन्दू महासभा ने गणतंत्र दिवस को काला दिवस मनाया, न तो रोहित सरदाना और न ही दीपक चौरसिया ने सवाल उठाये. 

बीजेपी और एबीवीपी की विचारधारा से मेल खाते हुए लोग नाथूराम गोडसे की उस पिस्टल की पूजा करते हैं जिससे महात्मा गांधी की हत्या हुई, न तो इण्डिया न्यूज़ को देशद्रोह दिखा और न ही ज़ी न्यूज़ को. 

तो क्या लगता है, दर्शक इतनी मूर्ख है की वह आपकी एजेंडा सेटिंग के झांसे में आ जाएगा, हरगिज़ नहीं. इसका जीता जागता उदहारण है फेसबुक के फ्री बेसिक पर रोक. फेसबुक ने लोगों को कई तरह से बरगलाने की कोशिश की परन्तु जागरूक जनता ने उसके प्रपंच को पहचाना और अंत में जो फेसबुक नरेंद्र मोदी के साथ भारत के शान में कसीदे पढ़ रहा था उसी ने कह दिया की अंग्रेज होते भारत के मालिक तो फेसबुक का फ्री बेसिक प्लान यहाँ लागू हो जाता. इस बयान के बाद आपत्ति जताई गयी तो सम्बंधित अधिकारी को इस्तीफा देना पड़ा.

भारतीय मीडिया में ऊँची जाति के पुरुष बैठे हुए हैं. उनका एकसूत्रीय एजेंडा है देश रोहित वेमुला की शहादत को भूल जाए और पूरा मसला उस पाकिस्तान और कश्मीर के इर्द गिर्द आ सिमटे जिस पाकिस्तान में नरेंद्र मोदी बिरयानी खाने गए और जिस कश्मीर में अलगाववादियों के समर्थन में रहने वाली पीडीपी के साथ आर एस एस ने सरकार बनाई.

जेएनयू का जनवाद एक बार फिर से पूरे देश ने देख लिया और देख लिया इलेक्ट्रानिक मीडिया के उन एंकरों को भी जिनकी सुबह और शाम दिल्ली में आरएसएस दफ्तर झंडेवालान में गुजरती है.
-मोहम्मद अनस

Wednesday, October 10, 2012

दरिन्दे पति ने पत्नी को उल्टा लटका कर पीटा, गंजा किया, गुप्तांगों में डाला मिर्च पावडर



लखनऊ: पति को शराब का अवैध कारोबार बंद करने की बात कहना पत्नी को बहुत महंगा साबित हुआ, दरिन्दे पति ने जो किया उस से मानवता भी शर्मशार हो गई, घटना लखनऊ के पास के ही केडौरा गाँव की है, पति ने पत्नी पर चरित्रहीन होने का आरोप लगा कर उसके साथ जो सलूक किया उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। पति शिवकुमार ने पत्नी के हाथ-पैर बांध कर मुंह में कपड़ा ठूंसा और बल्ली में उल्टा लटकाकर पीटा. उसे गंजा कर दिया । जब इससे भी उसका मन नहीं भरा तो अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए पत्नी के गुप्तांगों में मिर्च का पावडर भर दिया, इस मामले में पुलिस ने कार्यवाही भी सूचना मिलने के बाद दूसरे दिन की.  पीडिता का क्रूर पति घटना के बाद से फरार है।
सूत्रों के अनुसार बुधवार की रात करीब 11 बजे की इस घटना में शिवकुमार की पत्नी ने उसे अवैध शराब बनाने से मना किया। इस बात पर आगबबूला होकर शिवकुमार ने पत्नी पर चरित्रहीनता का आरोप लगाकर मार-पीट शुरू कर दी। उसके बाद पत्नी के हाथ-पैर बांधकर मुह में कपड़ा ठूंस दिया और घर के भीतर लगे टीनशेड की बल्ली से बांधकर उल्टा लटका दिया। पत्नी के शरीर पर बिजली के तार बरसाए। दरिंदगी और अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए उसने पत्नी के गुप्तांगों में मिर्च का पावडर डाल दिया और पत्नी के सिर के बाल मूंड दिए।
इस घटना के  दौरान शराब खरीदने एक व्यक्ति आ गया। क्रूर शिवकुमार शराब देने घर से बाहर निकला तो मौका पाकर उसकी पत्नी घर से भागकर पड़ोसी बुधई के घर में चली गई। शिवकुमार वहां भी मारपीट करने पहुंच गया। शोर सुनकर ग्रामीण एकत्र हो गए तो महिला मौका पाकर गांव में ही रहने वाले अपने मौसा तुला के घर पहुंच गई। वहां से उसने फोन कर मामले की जानकारी सौरा गांव निवासी अपने पिता को दी। वह रात में ही केडौरा पहुंचे और करीब डेढ़ बजे रात को बेटी को लेकर माल थाने गए। थाने से उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि सुबह आना। घर वाले महिला को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र  गए पर वहां  महिला चिकित्सक न होने से उसे लौटा दिया गया। जेहन में निर्दयी पति का खौफ लिए महिला ने परिवारीजन के साथ थाने के सामने सड़क पर ही रात बिताई। जब मामले की जानकारी मीडिया को हुई तो पुलिस हरकत में आई। घटना से आक्रोशित लोग हंगामा करने की तैयारी कर रहे थे। इसकी भनक लगते ही सीओ मलिहाबाद राजेश सक्सेना व एसओ माल जगदीश यादव केडौरा गांव पहुंचे और महिला को सीएचसी लाए। फिर उसे लखनऊ भेज दिया गया है। हालाँकि इस मामले में  पुलिस की लापरवाही सामने आने पर एसओ जगदीश यादव को लाहन हाजिर करने के साथ ही एसआइ सत्यदेव सिंह व कांस्टेबल राम शंकर को निलंबित कर दिया है। परन्तु पुलिस भी ऐसे मामलो में संवेदनशीलता के परिचय नहीं देती. ये उजागर हो गया है।
इस तरह की घटनाएं समाज में इंसानों के बीच मौजूद कुछ दरिंदों की दरिंदगी से इंसानियत को शर्मसार करती हैं। ऐसी घटनाएं हमें आक्रोशित भी करती हैं लेकिन हम सही समय पर प्रतिरोध क्यों नहीं करते? अगर सही समय पर हम इंसानियत का फर्ज निभाएं तो बहुत सी घटनाएं क्रूरता की हदें पार नहीं कर सकतीं। इंदौर की छः साल की शिवानी को बचाया जा सकता था, अगर पड़ोसियों ने सही समय पर थोड़ी सी भी कोशिश की होती। इस महिला के साथ हुए अत्याचार को भी रोका जा सकता था, यदि उसके पड़ोसी हस्तक्षेप करते । अत्याचार करने वालों के हौसलें इसीलिए बुलंद रहते है क्योंकि उन्हें यही लगता है कि कोई पड़ोसी उनके बीच में नहीं बोलेगा, आप बीच में न भी बोले, पर पुलिस को या किसी मददगार संस्था को तो फोन कर सकते है।

Friday, September 14, 2012

हरदा जल सत्याग्रह



अभी अभी मध्य प्रदेश से लौटा हूँ ! वहाँ हरदा जिले के खरदना गाँव वालों के एक सत्याग्रह में शामिल होने गया था ! गाँव वालों के साथ करीब अट्ठारह घंटे पानी में खड़ा रहा !

गाँव वाले तो पिछले चौदह दिन से पानी में ही खड़े थे ! कारण यह था कि पहले तो गाँव वालों से बात किये बिना ही सरकारी अफसरों और नेताओं ने इंदिरा सागर नाम का एक बड़ा बाँध बना दिया ! फिर इस साल लोगों को ज़मीन के बदले ज़मीन दिए बिना ही सरकार ने बाँध में पानी भर दिया ! लोगों के खेत और फसल डूब गयी !ज़मीन डूब गयी तो अब लोग क्या करें ?बच्चों को क्या खिलाएं ? लोगों ने कहा इस से तो अच्छा है कि सरकार हमारी ज़मीन के साथ साथ हमें भी डूबा दे ! सरकार की इस मनमर्जी के खिलाफ लोग पानी में जाकर खड़े हो गये !

देश भर में किसानों के इस विरोध प्रदर्शन के तरीके पर बड़ा आकर्षण पैदा हुआ ! चारों ओर सरकार की आलोचना होने लगी ! सरकार घबरा गयी ! लेकिन सरकार में बैठे लोग खुद को बहुत ताकतवर मानते हैं ! इसलिए सरकार ने पानी में खड़े महिलाओं और पुरुषों को ताकत का इस्तेमाल कर के निकालने का फैसला किया ! सरकार ने पानी में क़ानून की एक सौ चवालीस धारा लागू कर दी ! शायद भारत में पहली बार पानी में यह धारा लागू की गयी थी ! अगले दिन सुबह - सुबह पांच बजे लोगों पर पुलिस ने हमला शुरू किया ! छोटे - छोटे बच्चों के साथ घरों में सोयी हुई महिलाओं और बूढों को पुलिस ने घरों के दरवाज़े तोड़ कर बाहर खींच कर निकालना शुरू किया ! इसके बाद पानी में खड़े लोगों को बाहर निकालने के लिये पुलिस ने पानी में खड़े लोगों पर हमला किया ! पुलिस के हमलों से बचने के लिये लोग ओर ज्यादा गहरे पानी में चले गये ! पुलिस ने मोटर बोटों में बैठ कर लोगों के चारों तरफ घेरा डाल दिया ! इसके बाद पुलिस कमांडो ने पानी में घुस कर सभी सत्याग्रहियों को खींच कर बाहर निकाला !

लोगों ने हांलाकि कोई अपराध नहीं किया था ! लोग तो अपने ही खेतों में खड़े थे ! सरकार ने उनके खेत में बिना बताये पानी भर दिया था ! किसानो की मेहनत से लगाई गयी सोयाबीन की फसल डूब गयी ! एक किसान मुझे रोते हुए बता रहा था कि भाई जी मैंने बीस हज़ार रुपया क़र्ज़ लेकर सोयाबीन की फसल बोई थी ! अब मैं क़र्ज़ कहाँ से चुकाऊंगा ? अपने बच्चों को कहाँ से खिलाऊंगा ?

सरकार ने लोगों के विरोध को कुचलने के लिये पूरे गाँव को उजाड़ने की तैयारी कर ली ! गाँव की बिजली काट दी गयी ! पीने के पानी के हैण्ड पम्प उखाड़ने की कोशिश की जाने लगी ! सत्याग्रह करने वाले गाँव वालों के घरों को तोड़ने के लिये सरकारी बुलडोज़र गाँव में आ गये !
मुझे यह सब देख कर दो साल पहले बस्तर में अपने आश्रम को उजाड़े जाने के दृश्य याद आने लगे ! तब भी सरकार ने पहले बिजली काटी थी फिर पीने के पानी के हैंडपंप उखाड़े थे और फिर सरकारी बुलडोजरों ने आश्रम में बने घरों को कुचल दिया था !

गाँव वालों के साथ- साथ जब पुलिस वाले मुझे घसीट रहे थे ! बच्चे रो रहे थे ! किसान औरतें और पुरुष नारे लगा रहे थे ! मैं उत्साह और आशा के भावों से भरा हुआ था ! क्योंकि इन गावों के कमज़ोर से दिखने वाले लोगों ने शक्तिशाली राज्य को इतना झकझोर दिया था ! कि किसी की परवाह ना करने वाला राज्य इन पर हमला करने पर आमादा हो गया था !

शायद कुछ ही वर्षों में इसी तरह से हम इस देश में करोड़ों गरीबों से उनकी ज़मीने ऐसे ही पीट पीट कर छीन लेगे ! गरीब इसी तरह से विरोध करेंगे ! और हम ऐसे ही पुलिस से गरीबों को पिटवा कर उनकी ज़मीने छीन लेंगे ! गरीबों से ज़मीने छीन कर हम अपने लिये हाइवे , शापिंग माल , हवाई अड्डे , बाँध , बिजलीघर , फैक्ट्री बनायेंगे और अपना विकास करेंगे !

हम ताकतवर हैं इसलिए हम अपनी मर्जी चलाएंगे ? ये गाँव वाले कमज़ोर हैं इसलिए इनकी बात सुनी भी नहीं जायेगी ? सही वो माना जाएगा जो ताकतवर है ? तर्क की कोई ज़रुरत नहीं है ? बातचीत की कोई गुंजाइश ही नहीं है ?

और इस पर तुर्रा यह कि हम दावा भी कर रहे हैं कि अब हम अधिक सभ्य हो रहे हैं ! अब हम अधिक लोकतान्त्रिक हो रहे हैं ! और अब हमारा समाज अधिक अहिंसक बन रहा है !
हम किसे धोखा दे रहे हैं ? खुद को ही ना ?

करोड़ों लोगों की ज़मीने ताकत के दम पर छीनना, लोगों पर बर्बर हमले करना , फिर उनसे बात भी ना करना, उनकी तरफ देखने की ज़हमत भी ना करना ! कब तक इसे ही हम राज करने का तरीका बनाये रख पायेंगे ? क्या हमारी यह छीन झपट और क्रूरता करोड़ों गरीबों के दिलों में कभी कोई क्रोध पैदा नहीं कर पायेगा ? क्या हमें लगता है कि ये गरीब ऐसे ही अपनी ज़मीने सौंप कर चुपचाप मर जायेगे या रिक्शे वाले या मजदूर बन जायेंगे ? या ये लोग भीख मांग कर जी लेंगे और इनकी बीबी और बेटियाँ वेश्या बन कर परिवार का पेट पाल ही लेंगी ? और इन लोगों की गरीबी के कारण हमें सस्ते मजदूर मिलते रहेंगे ?

दुनिया में हर इंसान जब पैदा होता है तो ज़मीन , पानी , हवा , धुप , खाना , कपडा और मकान पर उसका हक जन्मजात और बराबर का होता है ! और किसी भी इंसान को उसके इस कुदरती हक से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि इनके बिना वह मर जाएगा !

इसलिए अगर कोई व्यक्ति या सरकार किसी भी मनुष्य से उसके यह अधिकार छीनती है तो छीनने का यह काम प्रकृति के विरुद्ध है , समाज के विरुद्ध है , संविधान के विरुद्ध है और सभ्यता के विरुद्ध है !

हम रोज़ लाखों लोगों से उनकी ज़मीने, आवास , भोजन और पानी का हक छीन रहे हैं ! और इसे ही हम विकास कह रहे हैं ! सभ्यता कह रहे हैं ! लोकतंत्र कह रहे हैं !

यदि किसी व्यक्ति के पास अनाज , कपड़ा ,मकान , कपडा , दूध दही , एकत्रित करने की शक्ति आ जाती है तो हम उसे विकसित व्यक्ति कहते है ! भले ही वह व्यक्ति अनाज का एक दाना भी ना उगाता हो , मकान ना बना सकता हो , खदान से सोना ना खोद सकता हो ! गाय ना चराता हो ! अर्थात वह संपत्ति का निर्माण तो ना करता हो परन्तु उसके पास संपत्ति को एकत्र करने की क्षमता होने से ही हम उसे विकसित व्यक्ति कहते हैं !

बिना उत्पादन किये ही उत्पाद को एकत्र कर सकने की क्षमता प्राप्त कर लेना किसी विशेष आर्थिक प्रणाली के द्वारा ही संभव है ! और ऐसी अन्यायपूर्ण आर्थिक प्रणाली समाज में लागू होना किसी राजनैतिक प्रणाली के संरक्षण के बिना संभव नहीं है !

इस प्रकार के अनुत्पादक व्यक्तियों या या व्यक्तियों के वर्ग को उत्पाद पर कब्ज़ा कर लेने को जायज़ मानने वाली राजनैतिक प्रणाली उत्पादकों की अपनी प्रणाली तो नहीं ही हो सकती !

इस प्रकार की अव्यवहारिक ,अवैज्ञानिक और अतार्किक और शोषणकारी आर्थिक और राजनैतिक प्रणाली मात्र हथियारों के दम पर ही टिकी रह सकती है और चल सकती है !
इसलिए अधिक विकसित वर्गों को अधिक हथियारों , अधिक सैनिकों और अधिक जेलों की आवश्यकता पड़ती है ! ताकि इस कृत्रिम राजनैतिक प्रणाली पर प्रश्न खड़े करने वालों को और इस प्रणाली को बदलने की कोशिश करने वालों को कुचला जा सके !

बिन मेहनत के हर चीज़ का मालिक बन बैठे हुए वर्ग के लोग अपनी इस लूट की पोल खुल जाने से डरते हैं ! और इसलिए यह लोग इस प्रणाली को विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली सिद्ध करने की कोशिश करते हैं ! इस प्रणाली को यह लुटेरा वर्ग लोकतंत्र कहता है ! इसे पवित्र सिद्ध करने की कोशिश करता है ! इसके लिये धर्म , महापुरुष , फ़िल्मी सितारों , मशहूर खिलाड़ियों और सारे पवित्र प्रतीकों को अपने पक्ष में दिखाता है !

सारी दुनिया में अब यह लुटेरी प्रणाली सवालों के घेरे में आ रही है ! इस प्रणाली के कारण समाज में हिंसा बढ़ रही है ! हम इसका कारण नहीं समझ रहे और इस हिंसा को पुलिस के दम पर कुचलने की असफल कोशिश कर रहे हैं ! देखना यह है कि यह लूट अब और कितने दिन तक अपने को हथियारों के दम पर टिका कर रख पायेगी ?

Friday, May 04, 2012

मुस्लिम वैवाहिक कानून में सुधार की पहल


तथाकथित फतवों के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर जो ज्यादतियां होती हैं उनसे निज़ात दिलाने के लिए और उन्हें इस्लाम और कुरान के नियमों के अनुसार समाज में बराबरी का स्थान दिलाने के लिए वैवाहिक परिवार कानून का प्रारूप तैयार किया गया है। कानून का प्रारूप अनेक न्यायविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है। इस प्रारूप पर राष्ट्रीय विमर्श जारी है। विमर्श की इसी श्रृंखला में एक आयोजन भोपाल में किया गया था। प्रारूप में निकाह, मैहर के साथ तलाक पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर भारी जुल्म किया जाता है। अनेक मामलों में मोबाईल पर एस.एम.एस. द्वारा किये गये तलाक को जायज ठहराया जाता है।

प्रारूप में बताया गया है कि तलाक का वह तरीका सर्वोत्तम तरीका है जो तीन महीने के पीरियड में दिया जाता है। इस बीच यदि पति पत्नी के संबंध सुधर जाते हैं और समझौता हो जाता है तो दोनों फिर साधारण जीवन बिता सकते हैं। प्रारूप में तलाक की अनेक प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है। ये प्रक्रियाये हैं तलाक-हसन, तलाके-तफवीह, तलाके मुबारता। प्रारूप में बताया गया है कि तलाक देना सिर्फ पुरूष का अधिकार नहीं है जैसा आमतौर पर समझा जाता है। पत्नी भी तलाक मांग सकती है। पत्नी द्वारा तलाक मांगने को “खुल“ कहा जाता है।

प्रारूप के अनुसार निकाह मुस्लिम विवाह की वह प्रक्रिया है जिसका लिखित सुबूत होना चाहिए। लिखित सुबूत में विवाह संबंधी सभी शर्तों को शामिल किया जाएगा। विवाह के इस समझौते की तीन प्रतियां तैयार की जाएंगी। जिनमें से एक दुल्हन को दी जाएगी, एक दूल्हे को दी जाएगी और एक उस मस्जिद में रखी जाएगी जिसमें वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न होगा। विवाह का लिखित सुबूत होने से भविष्य में किसी प्रकार की अनिश्चितता पैदा नहीं होगी। यह आम अनुभव है कि लिखित सुबूत के अभाव से सबसे ज्यादा मुसीबत का सामना महिला को ही करना पड़ता है।

प्रारूप में निकाह की विस्तृत व्याख्या की गई है। निकाह एक पुरूष और महिला के बीच हुआ एक ऐसा समझौता है जिसमें महिला से उतने ही कर्तव्यों की अपेक्षा होती है जितने उसे अधिकार दिये जाते हैं। एक बात जिस पर बार-बार जोर दिया गया है वह यह है कि पति अकेला परिवार का मुखिया नहीं है वरन् दोनों पति-पत्नी मिलजुलकर पारिवारिक उत्तरदायित्व का वहन करते हैं। परिवार संबंधी निर्णय लेने में भी दोनों की बराबर की भागीदारी होती है। पति-पत्नी दोनों का निवास कहां हो इसका निर्णय करने का बराबर का अधिकार दोनों प्राप्त है। विवाह के बाद उपलब्ध संपत्ति पर दोनों का बराबर अधिकार है। घर की जिम्मेदारी निभाना भी दोनों का कर्तव्य है। दोनों को परिवार का प्रतिनिधित्व करने का बराबर अधिकार प्राप्त है।

प्रारूप में इस बात पर जोर दिया गया है कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से होना चाहिए। राज्य सरकार को काजी या अन्य अधिकारी की नियुक्ति करना चाहिए जो विवाह का पंजीकरण करेगा। राज्य सरकार को ऐसे व्यक्ति को पंजीकरण के लिए नियुक्त करना चाहिए जो भारत का नागरिक हो, जिसमें आवश्यक योग्यता हो और जिसका धर्म इस्लाम हो। राज्य सरकार निकाह का पंजीकरण करने के लिए लाइसेंस जारी करेगी और ऐसा अधिकारी निकाह रजिस्ट्रार कहलाएगा। निकाह रजिस्ट्रार  के पास निकाहनामा का फार्म होगा, निकाह दर्ज करने के लिए उसके पास रजिस्टर होगा। राज्य सरकार के पास निकाहों का रिकार्ड रहेगा। निकाहनामा में दंपत्ति से संबंधित सभी जानकारी दर्ज रहेगी। इन जानकारियों में मियां-बीबी का स्टेटस, तलाक, विधवा- विधुर या दूसरी शादी जो भी स्थिति हो दर्ज रहेगी। निकाह में वधू की सहमति आवश्यक है। यदि सहमति प्राप्त नहीं की गई हो तो निकाह वैध नहीं समझा जाएगा।

प्रारूप में यह व्यवस्था की गई कि काजी स्वयं स्पष्ट रूप से सुने कि दुल्हन ने विवाह के लिए सहमति दी। सहमति किसी और रिश्तेदार माँ, दादी या बहन के माध्यम से प्राप्त नहीं की जानी चाहिए। सहमति दो गवाहों की उपस्थिति में प्राप्त की जानी चाहिए। सहमति देते समय दुल्हन को दूल्हे का नाम भी लेना चाहिए और मैहर की रकम का भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। दुल्हन स्वतः इस बात का फैसला करेगी कि वह मैहर किस रूप में लेगी - नगद, अचल संपत्ति, सोना या चाँदीं। विवाह की आयु वह होगी जो उस देश के कानून में निर्धारित है।

गुजारा भत्ता एक ऐसा मुद्दा है जिस पर भारी मतभेद हैं। प्रारूप में इस बात का प्रावधान किया गया है कि यदि पति सही ढंग से पत्नी का पालन-पोषण नहीं करता है तो उसकी पत्नी और एक से ज्यादा पत्नी हो तो उन्हें अधिकार होगा कानून का सहारा लेने के साथ ही आरबीटेशन काउंसिल से भी हस्तक्षेप की मांग कर सकती है। उसके बाद काउंसिल गुजारा भत्ते की रकम तय करेगी जिसे पति को देना पड़ेगा। यदि पति-पत्नी दोनों में से कोई भी चाहे तो गुजारा भत्ता की रकम में बढौत्री की मांग भी कर सकते हैं। यह मांग जिलाधीश से की जा सकती है जिसका निर्णय अंतिम होगा। यदि तयशुदा रकम का भुगतान नहीं होता है तो उसे पति की संपत्ति से वसूला जा सकता है।

इस्लाम में बहुविवाह जायज है परंतु कुरान में उसके लिए अत्यधिक सख्त शर्तों का प्रावधान है। उन समस्त शर्तों का उल्लेख प्रारूप में किया गया है। जिनके बिना एक से ज्यादा विवाह संभव नहीं है।

प्रारूप में मध्यस्तता के लिए एक काउंसिल के गठन का प्रावधान किया गया है। विवाह संबंधी सभी विवाद काउंसिल द्वारा सुलझाये जायेंगे। यह काउंसिल ही तय करेगी कि एक से ज्यादा विवाह आवश्यक है कि नहीं।

इस वैवाहिक कानून से मुस्लिम महिलाओं को काफी राहत मिलेगी। वहीं इस बात की पूरी संभावना है कि मुस्लिम पुरूषों का एक बड़ा हिस्सा इसे स्वीकार नहीं करेगा। इस बात के संकेत भोपाल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिले। कार्यक्रम के दौरान कुछ मुस्लिम युवक हाल में घुस आये और प्रारूप की आवश्यकता पर ही प्रश्न उठाया। उन्होंने इतना हो-हल्ला किया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

Friday, March 30, 2012

शादी से पहले और शादी के बाद..


अभी शादी का पहला ही साल था,
खुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,
खुशियाँ कुच्छ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभाल रही थी ..
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शरमाते हुए हमें नींद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हमारे बालों में फिराना,
मुस्कुराते हुए कहना की..
डार्लिंग चाय तो पी लो, जल्दी से रेडी हो जाओ, 
आप को ऑफीस भी है जाना.
घरवाली भगवान का रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पर पूरी तरह छायी थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
एक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था..
5 साल बाद........
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना,
टेबल पर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,
आज ऑफीस जाओ तो मुन्ना को
स्कूल छोड़ते हुए जाना...
सुनो एक बार फिर वही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोडी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर खुद ही संभाल लेना....
ना जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पर काली घटा छायी थी,
साँस भी लेते हैं तो उन्ही का ख़याल होता है,
अब हर समय जहाँ में एक ही सवाल होता है..
क्या कभी वो दिन लौट के आएँगे,
हम एक बार फिर कुंवारे हो जाएँगे.... ...!

Wednesday, October 26, 2011

दस साल बाद ली खुली हवा में सांस



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बिहार के भागलपुर जिले में सुल्तानगंज प्रखंड अंतर्गत बाथ थाना क्षेत्र अंतर्गत कटिकरी गांव में बीते 10 वर्ष से घर में बंद सुनैना झा उर्फ सुमन झा (42) को खुली हवा में सांस लेने का मौका मिल गया है।
    
पिता वाल्मिकी झा और अन्य परिजनों ने पीड़िता को मानसिक रूप से विक्षिप्त करार देकर बीते 10 साल से घर में एक कमरे में बंद कर रखा था। बाद में मीडिया के संज्ञान में आने के बाद मामले ने तूल पकड़ा और राज्य महिला आयोग ने सूचना पाकर सुनैना को मुक्त कराया।

महिला आयोग की अध्यक्ष कहकशां परवीन खुद सुनैना के घर गयी और पुलिस अधीक्षक संजय सिंह की मौजूदगी में दरवाजे पर लगे ताले को तोड़कर पीडित को मुक्त कराया गया। इस अवसर पर स्वयंसेवी संगठनों के कई सदस्य भी उपस्थित थे। बाद में सुनैना को मुक्त कराकर नये कपड़े पहनाये गये और उसे जवाहर लाल नेहरु कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

चिकित्सकों ने जांच के बाद बताया है कि पीडिता कुपोषण की शिकार है। वह पागल नहीं है। पुलिस ने कमरे को सील कर दिया है। पिता सहित परिवार के सदस्यों से पूछताछ की जाएगी। विवाह के बाद सुनैना के पति राजू झा ने उसे छोड दिया था, जिससे पीड़िता की मानसिक हालत बिगड़ गयी।

बाद में महिला आयोग की अध्यक्षा कहकशां परवीन ने बताया कि आयोग के प्रमुख की जिम्मेदारी पूरी करते बेहद सुकून मिल रहा है। पिता द्वारा कैदी की तरह व्यहार करना अमानवीय बरताव शर्मनाक है। आयोग मामले की सुनवाई करेगा तथा दोषी को सजा दी जायेगी।

Sunday, January 02, 2011

इस्लाम मे दाम्पत्य व्यवस्था

इस्लामी दाम्पत्य व्यवस्था के मूल में यह विचारधारा काम करती है कि यह परिवार और समाज के सृजन की आधारशिला है। अर्थात् दाम्पत्य-संबंध के अच्छे या बुरे होने पर परिवार और समाज का; यहाँ तक कि सामूहिक व्यवस्था और सभ्यता व संस्कृति का भी; अच्छा या बुरा बनना निर्भर करता है। अतः इस बुनियाद को मज़बूत बनाने और मज़बूत रखने के काफ़ी यत्न इस्लाम ने किए हैं। मिसाल के तौर पर सबसे पहली बात, इस संबंध में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने यह बताई कि आमतौर पर, रिश्ते तय करने में धन-सम्पत्ति, सुन्दरता और बिरादरी व नस्ल को ही सारा महत्व दिया जाता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि धार्मिकता (अर्थात् नेकी, अच्छे चरित्र, शील, सद्व्यवहार, ईश्वर से व्यावहारिक संबंध, सदाचार आदि) को महत्व दिया जाए।

इस तरह इस्लाम आरंभ में ही दाम्पत्य जीवन को एक नैतिक दिशा दे देता है। फिर विवाह (निकाह) के अवसर पर कु़रआन की जो आयतें अनिवार्यतः पढ़ी जाती है उनके द्वारा नव-दम्पत्ति को यह शिक्षा याद दिलाई जाती है कि इस तरह जीवन बिताना कि अल्लाह (और उसके पैग़म्बर) की अवज्ञा (नाफ़रमानी) से बचते रहना। अर्थात् इस्लाम ने दाम्पत्य जीवन से संबंधित ‘कु़रआन’ में, और ‘हदीस’ में जो मार्गदर्शन किया है, जो आदेश दिए हैं उनकी अवहेलना मत करना।

इस्लाम ने बिना निकाह के स्त्री-पुरुष मिलाप को नैतिक, सामाजिक व क़ानूनी अपराध क़रार देकर ऐसे संबंध को अवैध (हराम) ठहराया और इहलोक तथा परलोक में बड़ी भीषण सज़ा तथा प्रताड़ना व प्रकोप की चेतावनी दी है। इसके बाद इस्लाम ने बताया कि जिस ‘अल्लाह’ के नाम पर दोनों एक-दूसरे के लिए (निकाह द्वारा) वैध (हलाल) हुए हैं उसने एक के, दूसरे के प्रति बहुत से कर्तव्य, (Duties) और बहुत से अधिकार (Rights) निर्धारित किए हैं। इनमें कमी करना, इनकी अनदेखी करना, इन्हें अच्छी तरह से न निभाना, मात्र एक-दूसरे के प्रति ही अनुचित व अपराध न होगा बल्कि अल्लाह की नज़र में भी पाप व अपराध होगा। इसका, सिर्फ़ पति-पत्नी संबंध और परिवार की मान-मर्यादा पर ही बुरा प्रभाव पड़ कर रह जाए, ऐसा नहीं है; बल्कि इसकी सज़ा परलोक जीवन में भी मिल कर रहेगी। वहाँ की सज़ा बड़ी सख़्त होगी और उससे बचने का, वहाँ कोई उपाय न होगा, कोई सोर्स-सिफ़ारिश न चलेगी। इस प्रकार इस्लाम दाम्पत्य जीवन को प्रारंभिक चरण में ही एक ऐसा दृढ़ नैतिक व आध्यात्मिक आधार प्रदान कर देता है जो शायद अन्य समाजों में दुर्लभ हो।

स्त्री और पुरुष, मानव-रूप में बिल्कुल बराबर हैं, साथ ही प्रजनन (Reproduction) और नस्ल को आगे बढ़ाने में ‘माँ’ की जो भूमिका स्त्री को निभानी पड़ती है और बच्चों के पालन-पोषण में- विशेषतः बच्चों की दो-ढाई साल की उम्र तक -उसे जिस प्रकार की कठिन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है, और जो पुरुष से सर्वथा भिन्न होती हैं, उनके अनुकूल स्त्री की शारीरिक संरचना एवं मानसिक (Mental and Temperamental) और मनौवैज्ञानिक (Psychological) अवस्था पुरुष से, कुछ पहलुओं से बिल्कुल ही भिन्न और कुछ पहलुओं से काफ़ी भिन्न होती है। इस भिन्नता के ही परिप्रेक्ष्य में इस्लाम जीविकोपार्जन की ज़िम्मेदारी पुरुष पर रखता है। अर्थात् पुष्ट शरीर और अधिक शारीरिक शक्ति व बल के अनुकूल घर के बाहर का काम जिस में काफ़ी परिश्रम करना होता है, पति के ज़िम्मे; और हल्की मेहनत के काम, घर के अन्दर; जहाँ औरत के शरीर व शील की सुरक्षा यक़ीनी होती है, बच्चों और घर की देख-रेख व रख-रखाव तथा परिवार और पति के मान-मर्यादा की सुरक्षा का काम सरलता, सुख व सुधड़ता-संन्दरता से करना आसान होता है, पत्नी के ज़िम्मे। इस प्रकार इस्लामी दाम्पत्य व्यवस्था में ‘नारी’ और ‘पुरुष’ की शारीरिक संरचना और प्राकृतिक अवस्था के ठीक अनुकूल कार्य का निर्धारण व विभाजन तथा उसी के मुताबिक़ कार्य-क्षेत्र का भी निर्धारण कर दिया गया है ताकि दोनों के सहयोग से घर के अन्दर के और बाहर के काम बिना विघ्न-बाधा के सुचारू रूप से चलते रहें।

वर्तमान युग में नारी-पुरुष समानता की विचारधारा पश्चिमी देशों से बहुत तेज़ी के साथ प्रभावित होती जा रही है और पश्चिम में ही उपजे तथाकथित नारी-उद्धार आन्दोलन (या नारी स्वतंत्रता आन्दोलन) के नाम पर चलने वाले ‘फेमिनिस्ट मूवमेंट’ ने पति व पत्नी दोनों को समान कार्य करने के लिए, समान कार्य क्षेत्र में परिश्रम व संघर्ष करने को नारी की स्वतंत्रता तथा नारी-पुरुष समानता का आयाम दे दिया है। इस कारणवश, एक-दूसरे पर आश्रित रहने का नाज़ुक व भावुक संबंध कमज़ोर होता जाता है। ‘तुम भी कमाओ हम भी कमाएँ’, या ‘तुम कमाते हो तो हम भी तो कमाते हैं’ की मानसिकता से आपसी सहयोग-सहानुभूति की अवस्था कमज़ोर होती जा रही है। पत्नी पर कार्य-स्थल पर ऐसा शारीरिक व मानसिक बोझ पड़ता है जिसके लिए उसका व्यक्तित्व, अपनी प्रकृति तथा स्वभाव में, अनुकूल नहीं होता। परिणामस्वरूप प्रायः पति-पत्नी एक-दूसरे को ‘सुकून’ पहुँचाने की अवस्था में नहीं रह पाते। एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों को भली-भाँति पूरा करने, एक-दूसरे के अधिकार अदा करने के लिए जिस सहयोग व सहानुभूति की आवश्यकता होती है वह प्रभावित होते-होते कभी-कभी बिल्कुल ही समाप्त हो जाती है। दाम्पत्य जीवन नकारात्मक प्रभावों से बोझिल और बुरे परिणामों से ग्रस्त होने लगता है।

इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि पति-पत्नी को बुनियादी और प्राथमिक स्तर पर एक-दूसरे से ‘सुकून’ प्राप्त करने के उद्देश्य से निकाह (विवाह) के वाद मिलन होते ही, एक-दूसरे के लिए प्रेम, सहानुभूति, शुभचिन्ता व सहयोग की भावनाएँ अल्लाह की ओर से वरदान-स्वरूप प्रदान कर दी जाती हैं (कु़रआन, 30:21) अतः ऐसा कोई कारक बीच में नहीं आना चाहिए जो अल्लाह की ओर से दिए गए इस प्राकृतिक देन को प्रभावित कर दे। इस्लाम कहता है कि पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे का लिबास हैं (कु़रआन, 2:187)। अर्थात् वे लिबास ही की तरह एक-दूसरे की शोभा बढ़ाने, एक-दूसरे को शारीरिक सुख पहुँचाने और एक दूसरे के शील (Chastity) की रक्षा करने के लिए हैं। लेकिन आधुनिक संस्कृति में, दोनों को एक-दूसरे पर भौतिक व भावनात्मक निर्भरता से स्वतंत्र होते जाने का तेज़ी से बढ़ता रुजहान, दाम्पत्य जीवन में मिठास और सुकून को कमज़ोर और ख़त्म करता जा रहा है। भौतिक संपन्नता की चाह और ललक पति-पत्नी के बीच आध्यात्मिक, नैतिक व भावनात्मक संबंध को ख़ामोशी के साथ आघात पहुँचा-पहुँचा कर कमज़ोर करती जा रही है।

इस्लाम ने शिक्षा दी है कि पति, हलाल कमाई से अर्जित रोज़ी का एक कौर (लुक़मा) जो प्रेम के साथ पत्नी के मुँह में डालता है वह सदक़ा और इबादत का स्थान रखता है। इसमें दोनों के बीच प्रेम-संबंध के साथ-साथ इस बात की शिक्षा भी निहित है कि कमाने-धमाने का काम पति करे, कमाई करने के लिए पत्नी को घर के शांतिपूर्ण, सुखमय व सुरक्षित वातावरण से बाहर मेहनत-मशक़्क़त और मानसिक तनाव के वातावरण में, तथा ऐसे वातावरण में जाने से बचाए जहाँ उसके नारीत्व, गरिमा व शील को ख़तरा हो।