Tuesday, December 20, 2011

‘121 करोड़’ के कितने दावेदार?


 भारतीय संविधान में देश की सत्ता के संचालन के लिए संसदीय व्यवस्था को इसी मक़सद से समाहित किया गया ताकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सत्ता का संचालन आम जनता के हाथों से सुनिश्चित हो सके। इसी उद्देश्य से पूरे देश में चुनाव व्यवस्था राष्ट्रीयराज्यस्तरीयस्थानीय निकाय स्तर व पंचायत स्तर तक लागू की गई है। ज़ाहिर है इसी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत् कोई भी जनप्रतिनिधि स्वयं को अपने क्षेत्र विशेष का नुमाईंदा अथवा जनप्रतिनिधि ही समझता है। यदि मोटे तौर पर हम बात करें तो देश की संसद पूरे भारतवर्ष के मतदाताओं की नुमाईंदगी करती है तथा संवैधानिक रूप से यही सांसद 121 करोड़ जनता के वास्तविक निर्वाचित प्रतिनिधि भी हैं। इसी प्रकार राज्य के विकास तथा शासकीय व प्रशासनिक संचालन हेतु किसी राज्य की निर्वाचित सरकार उस राज्य की जनता का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती है। उपरोक्त व्यवस्थाएं किसी बड़बोले या स्वयंभू राष्ट्र हितैषी नेता अथवा संगठन के दावों या वचनों पर आधारित नहीं हैं बल्कि यह हमारे भारतीय संविधान में दर्ज वह व्यवस्थाएं हैं जिनपर हम और हमारा देश गर्व महसूस करता है तथा दुनिया के तमाम देश इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से प्रभावित भी होते हैं।

परंतु उपरोक्त तथ्यों से अलग हटकर आए दिन जिसे देखो वही नेता यह दावा पेश करने लगता है कि पूरा देश उसके साथ है या वही 121 करोड़ जनता की आवाज़ है। जब देखो तब इस प्रकार के आधारहीन दावे पेश किए जाने लगते हैं कि जनता निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, सत्तारुढ़ पार्टियों अथवा सरकार के विरुद्ध है और हमारे साथ है। परंतु ऐसे लोग अपने पक्ष में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं पेश कर पाते जिससे यह पता चल सके कि यदि वास्तव में जनता अपनी निर्वाचित सरकार, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध है तो आखिर यही जनता किस प्रकार, किन कारणों से और किस आधार पर तथा किस व्यवस्था के अंतर्गत् इनके साथ है? और यदि थोड़ी देर के लिए यह बात मान भी ली जाए कि चलिए जनता ने अपने किसी प्रतिनिधि को गलती से निर्वाचित कर लिया या किसी ऐसी सरकार को गलती से चुन लिया जोकि जनकल्याण के कार्यों के बजाए देश को लूटने-खसोटने, बेचने-खाने व भ्रष्टाचार जैसे दुव्र्यसनों में मशगूल हो गई तो सवाल यह है कि क्या पूरे देश की ही जनता एक साथ ऐसे ग़लत फ़ैसले अक्सर लेती रहती है?

दूसरा सवाल यह कि यदि जनता अपने जनप्रतिनिधि व अपनी निर्वाचित सरकार के विरुद्ध है भी तो आख़िरकार वही जनता है किसके साथ? क्योंकि सत्ता के विरुद्ध बेलगाम होकर मुंह खोलने वाले सत्ता विरोधी,विपक्षी तथा सत्ता के विरुद्ध साजि़श रचने में लगे तमाम तथाकथित स्वयंसेवी व राष्ट्रवादी संगठन लगभग सभी कहीं न कहीं जनता से मुखातिब होकर यह कहते हुए दिखाई देते हैं कि पूरा देश उन्हीं के साथ है। 121 करोड़ जनता उनके साथ है। गोया जनता की हालत एक ‘फुटबॉल’ जैसी दिखाई देने लगती है।

उदाहरण के तौर पर इन दिनों देश में जनलोकपाल बनाम लोकपाल मुद्दा ज़ोरदार बहस का विषय बना हुआ है। इसी के साथ-साथ विदेशों में जमा भारतीय लोगों का काला धन वापस लाने के लिए भी भारी शोर-शराबा मचा हुआ है। सांप्रदायिकता व जातिवाद से जुड़े तमाम मुद्दे भी जनता के बीच हैं। मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी जैसी समस्याएं भी देश के सामने हैं। परंतु इन सब को लेकर जिस प्रकार की बहस राजनैतिक दलों के मध्य चल रही है तथा इसके अतिरिक्त तमाम गैर राजनैतिक संगठनों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता इनमें से कई विषयों पर का$फी सक्रिय दिखाई दे रहे हैं लगभग वे सभी यह दावा ठोक रहे हैं कि जो कुछ भी वह कह रहे हैं वही जनता की आवाज़ है। चाहे वह अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश में जनक्रांति पैदा करने का दावा हो अथवा बाबा रामदेव द्वारा भरी जाने वाली सत्ता विरोधी हुंकार हो। काफी दिनों से देश व मीडिया इसी बहस में उलझा पड़ा है तथा देश की जनता को भी इस उलझन में डाले हुए है कि दरअसल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी आवाज़ बनता कौन दिखाई दे रहा है? वह निर्वाचित जनप्रतिनिधि जिसके गुणों से प्रभावित होकर तथा अपने क्षेत्र व देश के विकास की उम्मीद रखकर स्वयं कष्ट उठाकर व लंबी क़तारों में लगकर जिसके पक्ष में मतदान किया या फिर वह जोकि ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की तरह से देशहित व जनहित का दावा करते हुए स्वयंभू रूप से हमारी आवाज़ बनने की अप्रमाणित रूप से कोशिश कर रहे हैं?

यह सिलसिला किसी एक दल या राज्य को निशाना बनाकर नहीं चल रहा है बल्कि यदि गौर से देखें तो पूरे देश में ही सरकार व सत्ता को अस्थिर करने के प्रयासों की इस प्रकार की एक लहर सी चलती दिखाई दे रही है। हां, चूंकि कांग्रेस पार्टी इस समय देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल है व केंद्र की सत्तारुढ़ यूपीए गठबंधन सरकार का सबसे बड़ा घटक दल भी है तथा इसके अतिरिक्त देश के अधिकांश राज्यों में भी सत्तारुढ़ है इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस पार्टी को निशाना बनाकर ही यह एक सुनियोजित साजि़श रची जा रही हो। परंतु दरअसल इस समय यह राष्ट्रीय स्तर की एक ‘त्रासदी’ कही जा सकती है। क्योंकि अधिकांश प्रदेशों में चाहे वह किसी भी राजनैतिक दल द्वारा संचालित राज्य हों सभी राज्यों में विपक्षी दल अथवा समाजसेवी संगठन अथवा तमाम गैर सरकारी संगठन, सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं। बेशक प्रत्येक राज्य में विरोध के स्वर बुलंद करने के कारण अलग-अलग क्यों न हों परंतु मकसद लगभग सभी जगह एक ही होता है और वह यह कि सत्ता को नीचा दिखाया जाए, उसे बदनाम किया जाए, उसे अस्थिर किया जाए तथा किसी प्रकार इनके हाथों से सत्ता छीनकर उस पर खुद कब्ज़ा किया जाए। और जब यह चक्र पूरा हो जाता है तो पुन: जनता को ही अपना हथियार बनाकर कल के सत्ताधारी आज विपक्ष में आकर फिर अपनी भी भूमिका उसी अंदाज़ में शुरु कर देते हैं यानी उन्हें हटाओ और हमें बनाओ क्योंकि देश हमारे साथ है।

इन हालात में सोचने का विषय यह है कि बात-बात में जनता को या 121 करोड़ लोगों को अपने साथ बताने वाले लोग क्या देश की जनता को बिल्कुल ही मूर्ख समझते हैं या फिर भोली-भाली जनता को वरगला कर वे स्वयं को देश का सबसे बड़ा बुद्धिमान व्यक्ति समझने लगते हैं? आखिर किस आधार पर नेतागण इस तरह की बात कहते सुनाई देते हैं कि पूरा देश उनके साथ है? यहां मैं एक उदाहरण के साथ यह प्रमाणित करने का प्रयास करुंगी कि देश की जनता न तो मूर्ख है न ही इतनी बेवकूफ जितना कि चंद ऐसे लोगों द्वारा समझा जा रहा है जोकि समय-समय पर यह दावा ठोक देते हैं कि पूरा देश उनके पीछे खड़ा है और उनका वचन ही जनता की आवाज़ है।

पिछले दिनों चौधरी भजनलाल की मृत्यु के कारण रिक्त हुई हरियाणा में हिसार लोकसभा संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव संपन्न हुआ। उनके पुत्र कुलदीप बिश्रोई हरियाणा जनहित कांग्रेस से चुनाव लड़े। पूरा देश समझ रहा था कि भारतीय मतदाता चूंकि भावुक भी होते हैं लिहाज़ा चौधरी भजनलाल द्वारा राज्य को दी गई उनकी सेवाओं का एहसान अदा करने की गरज़ से भावनात्मक रूप से कुलदीप बिश्रोई के पक्ष में ही मतदान करेंगे। परंतु चूंकि सत्तारुढ़ कांग्रेस इस उपचुनाव में जनहित कांग्रेस को ‘वाकओवर’ नहीं देना चाहती थी लिहाज़ा उसने अपना प्रत्याशी जयप्रकाश के रूप में खड़ा किया। उधर राज्य की सत्ता के दूसरे सबसे बड़े दावेदार इंडियन नेशनल लोकदल ने अजय चौटाला को यह सोचकर मैदान में उतारा कि यदि किसी तरह हमने बाज़ी मार ली तो राज्य में अगले चुनाव में उनकी सत्ता वापसी के रास्ते काफी हद तक साफ हो जाएंगे। उपरोक्त तीनों ही प्रत्याशियों की चुनावी जंग में शुरु से लेकर अंत तक कुलदीप बिश्रोई का पलड़ा भारी रहा। मीडिया भी पूरी तरह से यह भविष्यवाणी कर रहा था कि कुलदीप बिश्रोई नंबर एक पर चल रहे हैं।

इसी बीच अन्ना हज़ारे ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए इसी हिसार उपचुनाव में जनता से कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध मतदान करने की अपील कर डाली। चुनाव नतीजों में कुलदीप बिश्रोई के जीतने पर टीम अन्ना के हौसले बुलंद हो गए तथा टीम अन्ना कांग्रेस की हार का श्रेय स्वयं लेने लगी। और साथ ही यह दावा भी किया जाने लगा कि राज्य से अब कांग्रेस के सफाए की जो शुरुआत हुई है वह राष्ट्रीय स्तर पर भी परिलक्षित होगी तथा टीम अन्ना अब कांग्रेस को निगल जाएगी। परंतु इस चुनाव के कुछ ही दिनों बाद इसी क्षेत्र में रतिया नामक एक विधानसभा क्षेत्र में भी उपचुनाव हुआ जहां कांग्रेस पार्टी भारी मतों से विजयी हुई। इस क्षेत्र की जनता ने कांग्रेस पार्टी को इसलिए जिताया क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने रतिया वासियों से क्षेत्र के अभूतपूर्व विकास का वादा किया था। उधर कांग्रेस पार्टी द्वारा चुनाव जीतने के मात्र एक सप्ताह के भीतर ही हुड्डा ने उसी क्षेत्र में एक विशाल धन्यवाद रैली आयोजित कर रतिया के विकास के लिए एक ऐसे पैकेज की घोषणा कर डाली जिसकी शायद क्षेत्र की जनता उम्मीद भी नहीं कर रही थी।

अब जनता के इस प्रकार के निर्णय से क्या प्रतीत होता है? जनता किसके साथ है? क्या क्षेत्र के विकास के पक्ष में ऐसे फैसले लेने वाले मतदाताओं को हम बेवकूफ कह सकते हैं? निश्चित रूप से जनता भ्रष्टाचार, घपलों-घोटालों जैसी बातों से बेहद दु:खी ज़रूर है। परंतु इन सब के साथ-साथ यह जनता उनके क्षेत्र का विकास करने वाले नेताओं को भी बखूबी पहचानती है। लिहाज़ा आम जनता को अपने पीछे खड़ा हुआ बताने वाले लोगों को इस प्रकार के बेतुके दावे कर जनता को गुमराह करने से बाज़ आना चाहिए। देश की जनता विशेषकर मतदाता वास्तव में पहले से अब कहीं अधिक समझदार, जागरूक व निर्णय लेने में सक्षम होते जा रहे हैं। बिना किसी के बताए या दावा ठोके वे स्वयं यह जानते हैं कि वह कब किसके साथ हैं और कब किसके साथ नहीं।

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