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Monday, April 27, 2015

मेरे साथ आठ माह तक रोज़ हुआ गैंग रेप


गुजरात के बोटाड ज़िला के देवालिया गांव में कांसे और स्टील के बर्तनों से सजे कमरे में एक चारपाई पर वह चुपचाप लेटी हुई हैं और उसके बच्चे उसके पास बैठे हैं.

गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह उन्हें खेलते हुए देखती रहती हैं और सिर्फ़ रोज़मर्रा के कामकाज निपटाने या अपनी आठ महीने की दर्दनाक कहानी पुलिस या मीडिया वालों को सुनाने के लिए ही उठती हैं.
सामूहिक बलात्कार की शिकार 23 साल की यह युवती बताती हैं, "उन्होंने करीब आठ महीने तक रोज़ मेरा बलात्कार किया. चार लोग तो नियमित थे, बाकी आते-जाते रहते थे. अगर मैं कुछ ऐसा करती जो उन्हें पसंद न आता तो वह मुझे पीटते. मुझे रोने में भी डर लगता था."
कभी एक ख़ुश बेटी, बीवी और मां रही इस युवती के सात माह के गर्भ को गिराने की याचिका को पिछले हफ़्ते गुजरात उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया.

अब वह अपने मायके में ही रह रही है. उसके मां-पिता की नज़रें भी उसी पर टिकी रहती हैं.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह कहती हैं, "यह मेरे बलात्कारियों का बच्चा है. मैं इसकी मां हूं लेकिन अगर यह बच्चा मेरे साथ रहेगा तो कोई भी मुझे और मेरे परिवार को स्वीकार नहीं करेगा. अदालत ने गर्भपात की इजाज़त नहीं दी. मैं सरकार से प्रार्थना करती हूं कि वह इस बच्चे को अपने सरंक्षण में ले ले और किसी अनाथालय में दे दे."
परिवार के अंदर बेचैनी साफ़ नज़र आती है. पीड़िता अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को त्यागने के विचार से शायद पूरी तरह सहमत नहीं है.
बच्चे को अपने पास रखने के सवाल पर वह चुप हो जाती हैं और धीरे से अपनी मां की ओर देखती हैं. उनकी मां जवाब देती हैं, "यह बच्चे को कैसे रख सकती है? अगर यह ऐसा करेगी तो समाज और गांव हमें बहिष्कृत कर देगा. मेरे दो और बच्चे हैं. मेरा 14 साल का लड़का कुंवारा रह जाएगा. कोई भी हमारी इज़्ज़त नहीं करेगा."
वो कहती हैं, "यह मां है लेकिन बच्चा बलात्कारियों का है, हम उसे नहीं रख सकते."

जब मां यह कह रही थी तो पीड़िता एक कुर्सी पर सिर झुकाए और पल्ला ओढ़े बैठी हुई थीं.
वह उस दहशत और सदमे के बारे में बात भी मुश्किल से ही कर पाती हैं. उन दिनों का ज़िक्र उसकी आँखों में आँसू ले आता है.
अपने 18 महीने के बेटे को खेलता देखते हुए वह कहती हैं, "रात को वह जंगल में ख़रगोश और काले हिरने का शिकार करने जाते. दो लोग मेरे साथ रुक जाते और गलत काम (बलात्कार) करते. फिर उन दो की जगह दूसरे दो आ जाते. महीनों तक हर रात यही होता रहा."
पीड़िता के ससुरालवालों ने उसे घर में घुसने से रोका तो उसके पति भी घर छोड़कर साथ ही आ गए.
वह कहती हैं, "एक रात जब मेरे अपहरणकर्ताओं ने एक खरगोश को काटा तो उसके पेट में से दो नन्हें ख़रगोश निकले. मैं खुद को रोक नहीं पाई और तुरंत उनमें से एक को उठा लिया जिसने मेरी उंगलियां कुतरनी शुरू कर दीं. इससे मुझे अपने बच्चों की याद आ गई और मैंने रोना शुरू कर दिया."

गुजरात, बलात्कार पीड़ितपुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने सात लोगों को नामजद किया है और बताया है कि वह उसे लगातार पीटते थे.
बात करते हुए उसके हाथ और ज़बान कांपते हैं.
वो कहती है, "मुझे रोता देखकर एक को ग़ुस्सा आ गया और वो अपनी बंदूक से मुझे पीटने लगा जिसमें बाकी भी शामिल हो गए. उस घटना के बाद उन्होंने कुछ दिन तक मुझे भूखा रखा. मैंने खाना मांगा तो उन्होंने मुझे ख़रगोश का गोश्त दिया, जो मैं खा नहीं पाई."

पीड़िता के पति ने पिछले साल जुलाई में सूरत में अपनी पत्नी के लापता होने की पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. पीड़िता के अपहरण से पहले शहर में उनकी ज़िंदगी आराम से गुज़र रही थी.
पीड़िता के परिवार को उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस और नेताओं के चक्कर काटने पड़े लेकिन कोई मदद नहीं मिली.
अभियुक्त दाफ़र समुदाय से हैं जो गुजरात की ख़ानाबदोश जाति है. पीड़िता गुजरात के देवी पूजक समुदाय की हैं.
पीड़िता की मांसात नामजद अभियुक्तों में से पांच को गिरफ़्तार कर लिया गया है. इस मामले में गुजरात पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे.
पीड़िता की मां कहती हैं, "उसके ग़ायब होने के कुछ दिन बाद मुझे उसके अपहरणकर्ताओं के बारे में पता चला. मैंने पुलिस को बताया तो उन्होंने कहा कि वह अपनी मर्ज़ी से उनके साथ रह रही है और उसने यह लिखकर दिया है कि उसके लिव-इन संबंध हैं. लेकिन कौन क़ैद रहने और बलात्कार किए जाने के लिए अपनी मर्ज़ी से काग़ज़ पर दस्तखत करता है. पुलिस ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया."
लेकिन इस मामले के जांच अधिकारी पुलिस उपाध्यक्ष तेजस पटेल इससे अनभिज्ञता जताते हैं, "पीड़िता या उसके परिवार के साथ इस तरह के व्यवहार के बारे में मुझे नहीं पता. हमने पांच अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है. एक अभियुक्त, गांव के सरपंच ने अपनी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ अदालत से स्टे ऑर्डर ले लिया है और एक फ़रार है."

लेकिन पीड़िता और उनके परिजन पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हैं. पीड़िता के पारिवारिक दोस्त सरदारसिंह मोरी कहते हैं, "अपहर्ताओं के कब्ज़े से बच निकलने में कामयाब होने पर पीड़िता और उनकी मां घंटों तक जंगल में छुपे रहे, उसके बाद हिम्मत जुटाकर वह पुलिस के पास गए. लेकिन जैसी आशंका थी स्थानीय पुलिसकर्मियों ने शिकायत लिखने से इनकार कर दिया और फिर हमने महिला पुलिस हेल्पलाइन को फ़ोन किया जिसके बाद न चाहते हुए भी हमारी शिकायत लिखी गई."
पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए एफ़आईआर के 48 घंटे बाद ले जाया गया. हालांकि मामले के कोर्ट में जाने और राष्ट्रीय अख़बारों की सुर्खियां बनने के बाद गुजरात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले का निरीक्षण शुरू किया.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
इस मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर रोष का सामना कर रही गुजरात सरकार ने गुरुवार को पीड़िता को 20,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी.
उसके लिए अब बलात्कार और गर्भ में पल रहे बच्चे को पैदा करने की मुश्किल से ज्यादा बड़ी चुनौती है 'पवित्र' होने की कवायद को पार करना.
क्या होता है पवित्र करने का ये तरीका….??
बीबीसी हिंदी

Thursday, April 10, 2014

तीन लोगों की हत्या, फिरौती समेत कई और गंभीर जुर्म का आरोपी अमित शाह सियासत में कैसे....??


नरेंद्र मोदी और अमित शाह
कुछ कहते हैं कि अमित शाह चेहरा हैं और नरेंद्र मोदी सोच. कुछ मानते हैं कि मोदी चेहरा हैं और शाह दिमाग हैं. कई कहते हैं कि शाह मोदी का वो मुखौटा हैं जो वह ख़ुद पहनकर नहीं घूम सकते.

खैर, इस पहेली को भी कई दूसरी जटिल राजनीतिक पहेलियों की तरह लोगों ने वक़्त पर छोड़ दिया है. पर आज जब अमित शाह का चेहरा और उनकी सोच — 'बटन से बदला' — दोनों सुर्ख़ियों में हैं, तब नरेंद्र मोदी के इस संटकमोचक पर लगे तमाम आरोप एक बार फिर चर्चा में हैं.

भारतीय राजनीति में यह नई बात नहीं कि गंभीर आरोपों के बावजूद नेता सियासत में बने रहते हैं. पर मोदी के क़रीबी और भाजपा महासचिव शाह जैसे उदाहरण कम ही हैं. शाह पर तीन लोगों की हत्या और फिरौती मांगने के अलावा कई और गंभीर आरोप हैं.

शाह को साल 2010 में सोहराबुद्दीन शेख फ़र्ज़ी एनकाउंटर में गिरफ़्तार किया गया था.

गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह पर साल 2005 में सोहराबुद्दीन शेख के फ़र्ज़ी एनकाउंटर और उनकी पत्नी कौसर बी और सोहराबुद्दीन के सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की हत्या, अपहरण, आपराधिक षड्यंत्र और वसूली समेत अन्य आरोप के चलते हिरासत में लिया गया था.

साजिश के सूत्रधार
गुजरात के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी का हैदराबाद से कथित तौर पर अपहरण कर लिया था और नवंबर 2005 में गांधीनगर के समीप फ़र्ज़ी मुठभेड़ में उन्हें मार डाला था. सीबीआई ने आरोप लगाया कि शाह इस साजिश के सूत्रधार थे.
इस मामले में ज़मानत मिलने के पहले शाह अहमदाबाद की साबरमती जेल में तीन माह से अधिक समय बंद रहे.

अदालत ने शाह को गुजरात छोड़ने की शर्त पर ज़मानत पर छोड़ दिया था. हालांकि क़रीब एक साल बाद कोर्ट ने शाह पर लगाया हुआ यह प्रतिबंध हटा लिया था.
एक छुटभैये नेता से भाजपा के सेनापति बने अमित शाह पर इशरत जहाँ फ़र्ज़ी एनकाउंटर में शामिल होने के भी आरोप लगते रहे हैं.
सीबीआई इस मामले में शाह से पूछताछ कर चुकी है. गुजरात हाई कोर्ट के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता मुकुल सिन्हा ने पिछले हफ़्ते ही इस मामले में कोर्ट में याचिका दायर की है. सिन्हा का दावा है कि सबूत होने के बावजूद सीबीआई शाह को इस मामले में गिरफ़्तार नहीं कर रही.

यह दावा करते हुए कि कुछ चरमपंथी नरेंद्र मोदी की हत्या करने गुजरात में आए हैं, 15 जून 2004 को अहमदाबाद में गुजरात पुलिस ने इशरत जहाँ, जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, दो कथित पाकिस्तानी नागरिकों जीशान जौहर और अमजद अली राणा को मार गिराया था.

एसआईटी का गठन
इस एनकाउंटर के बारे में इशरत जहाँ की मां की शिकायत के बाद गुजरात हाई कोर्ट ने एक विशेष जांच दल-एसआईटी का गठन किया था जिसने कहा था कि यह मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी.

इस मामले में सीबीआई ने अब तक दो आरोप पत्र दाखिल किए हैं और कई वरिष्ठ पुलिस अफ़सरों को हिरासत में लिया है. आरोप पत्र में हालांकि शाह का नाम नहीं है.
सिन्हा का कहना है, "सीबीआई ने शाह के ख़िलाफ़ इस मामले में कई सबूत कोर्ट के सामने नहीं रखे है. शाह न्यायिक प्रक्रिया और जाँच एजेंसियों को अपनी तरफ करने में माहिर है. जहां भाजपा सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इंवेस्टीगेशन कहती है, वही इस केस में कई ऐसी बातें हैं जिससे लगता है कि मानो शाह सीबीआई को चला रहे हैं."

कभी गुजरात सरकार के चहेते रहे और अब जेल में बंद गुजरात के निलंबित पुलिस अधिकारी डीजी वंजारा ने पिछले साल इस्तीफ़ा दे दिया था.
वंजारा ने दस पन्नों के अपने इस्तीफ़े में शाह और मोदी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे. वंजारा को सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में साल 2007 में हिरासत में लिया गया था.

वंजारा ने कहा है कि उन्होंने जो कुछ किया वो सरकार के कहने पर किया. वंजारा ने लिखा है कि जिस आरोप में वह और उनके बाक़ी पुलिस अफ़सर जेल में बंद हैं, उसकी ज़िम्मेदारी पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह की भी बनती है.
उन्होंने लिखा है कि गुजरात सरकार को सलाखों के पीछे होना चाहिए.

'साहेब' के आदेश पर जासूसी
अपनी चिट्ठी में वंजारा लिखते हैं, "मैंने ऐसा कभी नहीं देखा कि किसी राज्य के 32 पुलिस अफ़सर फ़र्ज़ी मुठभेड़ों के आरोप में जेल में बंद हैं, जिनमें छह आईपीएस अफ़सर हैं... जब पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित भाई शाह को गिरफ़्तार किया गया तो सरकार अचानक मुस्तैद हो गई. विद्वान, वरिष्ठ और सबसे महंगे वकील राम जेठमलानी ने सबसे निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में उनका बचाव किया और रिकॉर्ड तीन महीने में उन्हें ज़मानत दिला दी."

भाजपा के चुनाव प्रभारी अमित शाह पर एक महिला की किसी 'साहेब' के आदेश पर जासूसी करवाने का भी आरोप है. कहा जाता है निलंबित आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल ने सीबीआई को इस मामले के कुछ सबूत दिए है.
आरोप है कि गुजरात के गृह राज्य मंत्री रहते हुए शाह ने सन 2009 में पुलिस अधिकारियों से अहमदाबाद में ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से बेंगलुरु की एक महिला आर्किटेक्ट की निगरानी करवाई थी.

महिला न तो किसी केस में आरोपी थी और न ही क़ानून व्यवस्था के लिए किसी प्रकार का ख़तरा थी. उस लड़की का पीछा सिर्फ़ इसलिए करवाया गया क्योंकि अमित शाह के 'साहब' ऐसा चाहते थे.

हालांकि, इस मामले में महिला के पिता का बयान भी आया है. उन्होंने कहा, 'मेरी बेटी मां का इलाज कराने अहमदाबाद गई थी. उसे देर रात आना-जाना होता था. इसलिए मैंने मोदी से उसका ध्यान रखने के लिए कहा था."
हालांकि क्या सरकार इस तरह किसी की जासूसी किसी के भी कहने पर भी कर सकती. इस मामले की सच्चाई तो जांच से ही पता चलेगी. 

-अंकुर जैन

Saturday, November 23, 2013

साहेब और युवती के बीच थे अवैध संबंध



लड़की का पीछा क्यों करवाया गया, इसकी कहानी एक मिस्ड काल से शुरू हुई। यह मिस्ड कॉल साहब के पर्सनल नंबर पर आई थी। इसके बाद से ही इस युवती के फोन को  2009 में दो महीने तक अवैध रूप से सर्विलांस पर रखा गया। कांग्रेस अब इस मामले में मोदी को पूरी तरह से घेरने में जुटी है और इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी जज से कराने की मांग कर रही है। माना जा रहा है कि जासूसी का यह खेल मोदी के लिए भारी पड़ सकता है, क्योंकि तमाम मानवाधिकार संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस तरह की जासूसी को निजता का उल्लंघन माना है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों न्यूज पोर्टल कोबरा पोस्ट और गुलेल ने गुजरात के राज-काज के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए गुजरात के पूर्व गृहराज्यमंत्री अमित शाह और आईपीएस अफसर जीएल सिंघल की टेलीफोन पर हुई बातचीत की रिकार्डिंग पे्रस के सामने पेश की। वेबसाइट ने इस जासूसी कांड को गैरकानूनी मानते हुए कहा कि गुजरात के पूर्व गृहमंत्री और मोदी के खास अमित शाह ने सिंघला को एक लड़की की 24 घंटे निगरानी का आदेश दिया, ताकि किसी साहब को उसके बारे में पल-पल की जानकारी दी जा सके। अमित शाह से बातचीत की यह रिकार्डिंग खुद सिंघला ने सीबीआई को सौंपी है। कांग्रेस ने इस मामले की गहराई से जांच की मांग की है। वहीं भाजपा ने पूरे मसले पर चुप्पी साध ली है।

आइए, इस जासूसी कांड के कुछ रोचक तथ्यों पर नजर डालें। मिली जानकारी के मुताबिक, 62 दिनों तक चले इस सर्विलांस में गुजरात के आठ बड़े पुलिस अधिकारी शामिल थे। इस पूरी कार्रवाई की कमान आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल के हाथों में थी। सिंघल को उस समय अमित शाह के बेहद करीब थे। हालांकि उसके बाद दोनों के रिश्ते बिगड़ गए। अमित शाह और जीएल सिंघल दोनों राज्य में हुए दो अलग-अलग फर्जी एनकाउंटरों के मामले में आरोपी हैं और फिलहाल बेल पर बाहर हैं। अमित शाह जहां सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के आरोपी हैं, वहीं सिंघल पर इशरत जहां एनकाउंटर मामले में आरोप लगाए गए हैं। सिंघल ने शाह से अपनी नजदीकी के बावजूद उनसे हुई बातचीत की कुछ रिकार्डिंग्स भी अपने पास रख ली थी। इस साल जून में सिंघल ने इस बातचीत के 267 रिकार्डिंग्स सीबीआई को सौंप दी।

कोबरा पोस्ट से मिली जानकारी के मुताबिक, 2005 में पहली बार साहब से युवती की मुलाकात हुई। इस युवती ने भूकंप प्रभावित भुज में सरकारी पुनर्निर्माण के प्रयासों के तहत एक हिल गार्डन डिजाइन किया था। दोनों की मुलाकात तत्कालीन जिलाधिकारी प्रदीप शर्मा ने कराई थी। साहेब ने इस युवती को अपना पर्सनल मोबाइल नंबर भी दे रखा था, जिस पर साहेब और युवती की अक्सर बातें होती थीं। एक दिन युवती ने भुज के अपने कलक्टर मित्र प्रदीप शर्मा को साहेब के साथ चल रहे संबंध से संबंधित कॉल्स और मैसेज को दिखला दिया। शर्मा ने उस साहब का नंबर सेव कर लिया। बाद में युवती और साहब के बीच कुछ नजदीकी रिश्तों को लेकर अनबन शुरू हो गई और युवती परेशान रहने लगी। साहब चाहते थे कि भले ही हम दोनों के बीच में संबंध कुछ और हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर यह दिखे कि साहब युवती को बेटी की तरह मानते हैं। युवती की परेशानी जानने के बाद कलक्टर शर्मा ने साहब के सेव नंबर पर काल लगा दी। काल उठाया तो नहीं गया, लेकिन इस मिस्ड कॉल से साहब को संदेह हो गया कि आखिर उनका पर्सनल नंबर किसके पास है। कॉल डीटेल्स में शर्मा का नाम सामने आ गया। इस मिस्ड कॉल के बाद से ही युवती और साहब के संबंधों का समीकरण बदल गया। शर्मा के फोन पर नजर रखी जाने लगी और यह बात सामने आ गई कि शर्मा और यह युवती बराबर संपर्क में रहते थे। सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद ही अमित शाह ने इस युवती पर सर्विलांस लगाने का आदेश दिया।

कोबरापोस्ट और गुलेल के मुताबिक, कुछ ही दिनों बाद प्रदीप शर्मा को उनकी हरकत का दंड मिल गया। उनके खिलाफ गुजरात सरकार ने आपराधिक मामलों में चार शिकायतें दर्ज कराई हैं। शर्मा को सस्पेंड कर दिया गया और फिर वह गिरफ्तार भी कर लिए गए। 62 दिनों तक चला सर्विलांस का सिलसिला तब खत्म हुआ, जब इस युवती ने शादी कर गुजरात छोड़ने का फैसला किया। अब राजनीति गरमाने के बाद भाजपा इस पूरे प्रकरण में लीपापोती करने में जुट गई है। भाजपा के दबाव में युवती के पिता ने कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री से उनके पारिवारिक संबंध हैं और उन्होंने ही मुख्यमंत्री से अपनी बेटी का खयाल रखने का निवेदन किया था। उनकी बेटी बेंगलुरू से अहमदाबाद आई थी और उसे अपनी मां के इलाज के सिलसिले में बाहर निकलना पड़ता था। गुजरात के मुख्यमंत्री और उनकी बेटी का रिश्ता बाप-बेटी की तरह था। भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कोबरापोस्ट और गुलेल के खुलासों को खारिज करते हुए कहा है कि इस पूरे मामले के पीछे कांग्रेस की गंदी राजनीति है, लेकिन कांग्रेस के महिला युवा प्रकोष्ठ ने अमित शाह और इस पूरे मामले की जांच की मांग की है। जयंती नटराजन ने कहा है कि इन खुलासों से वह दुख, आश्चर्य, गुस्सा और शर्म महसूस कर रही हैं।

अब डर है कि इस जासूसी कांड में कहीं उस युवती की जान न चली जाए। अपने फायदे के लिए राजनीति में कुछ भी संभव है। कांग्रेस भी इस मामले को आगे बढ़ाने में रुचि रखेगी और भाजपा किसी तरह से साहब को बचाने में लगेगी। इस पर पर्दा डालने और पर्दा हटाने के खेल में सबसे अहम सवाल है कि कहीं उस युवती की जान खतरे में न पड़ जाए।

Sunday, November 03, 2013

गांधी जी की हत्या के बाद आरएसएस ने बांटी थी मिठाई - सरदार पटेल


29 अक्टूबर को अहमदाबाद में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश का इतिहास कुछ और होता। उसी मंच पर मौजूद मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फौरन याद दिला दिया कि पटेल एक प्रतिबद्ध कांग्रेसी थे। सेक्युलर नेता थे। ये उस राजनीतिक युद्ध की बानगी है जो पटेल के नाम पर छिड़ा है। मोदी, दरअसल, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के उसी प्रचार को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें बार-बार कहा जाता है कि सरदार पटेल, नेहरू से बेहतर नेता थे। यही नहीं पटेल को हिंदुत्व के दर्शन के करीब बताने की कोशिश भी होती है। आम चुनाव 2014 की आहट बढ़ने के साथ ये कोशिश तेज होती जा रही है।
नरेंद्र मोदी ने गुजरात में पटेल की ऐसी प्रतिमा स्थापित करने का एलान किया है जो दुनिया में सबसे ऊंची होगी। अमेरिका की स्टैच्यू आफ लिबर्टी से भी ऊंची ये 182 मीटर की प्रतिमा गुजरात के नर्मदा जिले के सरदार सरोवर बांध के करीब स्थापित की जाएगी। 31 अक्टूबर को पटेल जयंती पर परियोजना का शिलान्यास हो भी चुका है। बीजेपी की ओर से इसका धुआंधार प्रचार जारी है। ऐसे मे ये जनना दिलचस्प है कि पटेल का बीजेपी की मूल प्रेरणा आरएसएस के प्रति क्या नजरिया था।
30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में शाम की प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे महात्मा गांधी की छाती पर तीन गोलियां उतारी गईं। दुनिया भौंचक्की रह गई। खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले गांधी पर गोली किसी और ने नहीं, हिंदुत्व का दर्शन देने वाले विनायक दामोदर सावरकर के शिष्य और महासभा के कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने चलाई थी। गोडसे कभी आरएसएस का सक्रिय सदस्य था। गांधी की हत्या एक ऐसे हिंदू की हत्या थी जिसने सत्य को ही ईश्वर माना। जिसका धर्म मनुष्य और मनुष्य में भेद नहीं करता था। वे ईश्वर के साथ अल्लाह का नाम भी लेते थे। दोनों को एक समझते थे। लेकिन हिंदू गांधी के हत्यारों का आदर्श हिंदुत्व था। जिसके हिसाब से भारत के प्रति उनकी निष्ठा ही सच्ची हो सकती है जिनकी पितृभूमि और पवित्र भूमि, दोनों भारत में हों। इस परिभाषा से अल्पसंख्यक कभी देशभक्त नहीं हो सकते।
गांधी की हत्या ने दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया था जिसकी जिम्मेदारी गृह मंत्री के नाते सरदार पटेल के पास थी। तमाम तथ्यों को देखते हुए उन्होंने माना कि गांधी की हत्या में आरएसएस का भी हाथ है। और 4 फरवरी 1948 को पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया।
आरएसएस ने बेगुनाह बताते हुए इस पर आपत्ति जताई तो 11 सितंबर 1948 को पटेल ने आरएसएस के सरसंघचालक एम.एस.गोलवलकर को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा- हिंदुओं को संगठित करना और उनकी सहायता करना एक बात है, लेकिन अपनी तकलीफों के लिए बेसहारा और मासूम पुरुषों, औरतों और बच्चों से बदला लेना बिल्कुल दूसरी बात.... इनके सारे भाषण सांप्रदायिक विष से भरे थे, हिंदुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए आवश्यक न था कि जहर फैले। इस जहर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी। सरकार व जनता की रत्तीभर सहानुभूति आरएसएस के साथ न रही बल्कि उनके खिलाफ ही गई। गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया और मिठाई बांटी, उससे यह विरोध और भी बढ़ गया। इन हालात में सरकार को आरएसएस के खिलाफ कदम उठाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था।
आरएसएस और बीजेपी के लोगों का दावा है कि पटेल ने प्रतिबंध नेहरू के दबाव में लगाया था। लेकिन पटेल ने इस पत्र में लिखा कि गांधी जी की हत्या के बाद संघ वालों ने मिठाई बांटी। प्रतिबंध के अलावा कोई चारा नहीं था। जाहिर है, सरदार पटेल नेहरू की जुबान नहीं बोल रहे थे, अपना मन खोल रहे थे। बतौर गृह मंत्री उन्हें देशभर से खुफिया जानकारियां मिलती थीं।
यही नहीं सरदार पटेल ने 18 जुलाई 1948 को हिंदू महासभा के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी एक पत्र लिखकर बताया कि प्रतिबंध के बावजूद आरएसएस बाज नहीं आ रहा है। उन्होंने लिखा-हमें मिली रिपोर्टें इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संस्थाओं, खासकर आरएसएस की गतिविधियों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना कि ऐसा बर्बर कांड संभव हो सका। मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिंदू महासभा का अतिवादी भाग षड्यंत्र में शामिल था। आरएसएस की गतिविधियां, सरकार और राज्य-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए स्पष्ट खतरा थीं। हमें मिली रिपोर्टं बताती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद वे गतिविधियां समाप्त नहीं हुई हैं। दरअसल, समय बीतने के साथ आरएसएस की टोली अधिक उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है।
दरअसल, संघ परिवार की ओर से पेश की गई हिंदूराष्ट्र की अवधारणा सरदार पटेल को कभी रास नहीं आई। वे भारत को हिंदू पाकिस्तान बनाने के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने साफ कहा था कि, \'भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। इस देश में मुसलमानों के भी उतने ही अधिकार हैं जितने की एक हिन्दू के हैं। हम अपनी सारी नीतियां और आचरण वैसा नहीं कर सकते जैसा पाकिस्तान कर रहा है। अगर हम मुसलमानों को यह यकीन नहीं दिला पाये की यह देश उनका भी है तो हमें इस देश की सांस्कृतिक विरासत और भारत पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं'
1925 में गठित आरएसएस का गांधी की हत्या तक न कोई संविधान था और न सदस्यता रसीद। पटेल ने मजबूर किया कि वो संविधान बनाये और खुद को सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखे। 11 जुलाई 1949 प्रतिबंध हटाने का एलान करने वाली भारत सरकार की विज्ञप्ति में कहा गया है-आरएसएस के नेता ने आश्वासन दिया है कि आरएसएस के संविधान में, भारत के संविधान और राष्ट्रध्वज के प्रति निष्ठा को और सुस्पष्ट कर दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि हिंसा करने या हिंसा में विश्वास करने वाला या गुप्त तरीकों से काम करनेवाले लोगों को संघ में नहीं रखा जाएगा। आरएसएस के नेता ने यह भी स्पष्ट किया है कि संविधान जनवादी तरीके से तैयार किया जाएगा। विशेष रूप से, सरसंघ चालक को व्यवहारत: चुना जाएगा। संघ का कोई सदस्य बिना प्रतिज्ञा तोड़े किसी भी समय संघ छोड़ सकेगा और नाबालिग अपने मां-बाप की आज्ञा से ही संघ में प्रवेश पा सकेंगे। अभिभावक अपने बच्चों को संघ-अधिकारियों के पास लिखित प्रार्थना करने पर संघ से हटा सकेंगे।..इस स्पष्टीकरण को देखते हुए भारत सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आरएसएस को मौका दिया जाना चाहिए।'
इस विज्ञप्ति से साफ है कि संघ पर किस तरह के आरोप थे और भारत सरकार को उसके बारे में कैसी-कैसी सूचनाएं थीं। लेकिन प्रतिबंध हटाना शायद लोकतंत्र का तकाजा था और इसके सबसे बड़े पैरोकार तो प्रधानमंत्री नेहरू ही थे। पटेल को नेहरू के बरक्स खड़ा करने की कोशिशों के बीच ये पड़ताल भी जरूरी है कि दोनों नेता एक दूसरे के प्रति क्या राय रखते थे। भारत की आजादी का दिन करीब आ रहा था। मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी। 1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा-
कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।'
जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा- आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।
पटेल की ये भावनाएं सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। अपनी मृत्यु के करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने नेहरू को लेकर जो कहा वो किसी वसीयत की तरह है। 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा-अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफादार सिपाही नहीं हूं।
साफ है, पटेल को नेहरू की जगह पहला प्रधानमंत्री न बनने पर नरेंद्र मोदी जैसा अफसोस जता रहे हैं, वैसा अफसोस पटेल को नहीं था। वे आरएसएस नहीं, गांधी के सपनों का भारत बनाना चाहते थे। पटेल को लेकर नरेंद्र मोदी के अफसोस के पीछे एक ऐसी राजनीति है जिसे कम से कम पटेल का समर्थन नहीं था।
बहरहाल, पटेल की विरासत पर बीजेपी के दावे के साथ कुछ ऐसे सवाल भी खड़े हो जाते हैं जिसका जवाब संघ परिवार नहीं देना चाहता। संघ परिवार कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग लगातार करता है। लेकिन सरदार पटेल ने 15 अगस्त 1947 को ऐसे भारत के नक्शे को स्वीकार किया था जिसमें कश्मीर था ही नहीं। जब विवाद बढ़ा तो पटेल ने शुरुआत में 'कश्मीर के झंझट से दूर रहने की ही नसीहत दी थी।' यही नहीं, वे संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को दी गई विशेष रियायतों के न सिर्फ समर्थक थे, बल्कि शर्तें तय करने में उनकी अहम भूमिका थी।
तो फिर संघ के पटेल प्रेम की वजह क्या है। जानकार मानते हैं कि संघ खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताता है, लेकिन हकीकत ये है कि स्वतंत्रता संग्राम में उसने भाग नहीं लिया। ऐसे में उसके पास ऐसे नायक नहीं जो अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टकारते हुए पूरे भारत में सम्मानित हुए हों। जिनके जरिये राष्ट्रीय भावना जगाई जा सके। अब इस कमी को पटेल के जरिये पूरा करने की कोशिश की जा रही है।
कांग्रेस कार्यसमिति ने जून 1934 में प्रस्ताव पारित किया था कि कांग्रेस सदस्य, हिंदू महासभा,मुस्लिम लीग और आरएसएस से कोई संबंध नहीं रखेंगे। पटेल ने ये शपथ जीवन भर निभाई। लेकिन उनकी मौत के 63 साल बाद अगर आरएसएस ही उनसे संबंध जोड़ने मे जुटा है तो पटेल इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं। वैसे भी, किसी महापुरुष को उसके विचारों से दूर करके सिर्फ मूर्ति में तब्दील करना, हिंदुस्तान की पुरानी रवायत है। यही वजह है कि सबसे ज्यादा मूर्तियां गौतम बुद्ध की मिलती हैं जो मूर्तिपूजा के सख्त खिलाफ थे। कुछ ऐसा ही हाल गांधी का भी हुआ है। चौराहे-चौराहे गांधी जी की प्रतिमाएं हैं, लेकिन उनकी राह चलने वाले ढूंढे नहीं मिलते। और अब यही सलूक सरदार पटेल के साथ हो रहा है। जो सरदार की प्रतिमा की ऊंचाई नाप रहे हैं, वे उनके विचारों की गहराई में भी उतरेंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है।

-पंकज श्रीवास्तव 

Sunday, September 09, 2012

मुसलमानों को मारने के बाद मुझे महाराणा प्रताप जैसा महसूस हुआ - बाबू बजरंगी


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भाजपा की नेता और नरोदा की तत्कालीन विधायक
माया कोडनानी भी दोषियों में शामिल है..
नवंबर, 2007 के दौरान गुजरात दंगों पर की गई तहलका की पड़ताल की पुष्टि करते हुए अहमदाबाद की विशेष अदालत ने नरोदा पाटिया में हुए जनसंहार के लिए 32 लोगों को दोषी करार दिया. सजा पाए लोगों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेता और नरोदा की तत्कालीन विधायक माया कोडनानी के साथ-साथ बजरंग दल का बाबू बजरंगी भी शामिल है. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुकी कोडनानी गुजरात दंगों में अपराधी घोषित होने वाली पहली भाजपा नेता हैं. उन्हें और बाबू बजरंगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (बी) (आपराधिक षड्यंत्र) और 302 (हत्या) के तहत दोषी ठहराया गया है. इसी मामले में अदालत ने 29 अन्य अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

पहली बार तहलका के संवाददाता आशीष खेतान ने अपनी पड़ताल के दौरान बाबू बजरंगी और माया कोडनानी का पर्दाफाश किया था. उनके खुफिया कैमरे पर बाबू बजरंगी ने खुद माया कोडनानी के साथ मिलकर नरोदा पाटिया हत्याकांड की योजना बनाना स्वीकार किया था (अगला पन्ना देखें). तहलका के कैमरे पर बजरंगी का कहना था कि गोधरा में ट्रेन को जलता देखकर वह नरोदा वापस आया और उसी रात हत्याकांड की योजना बनाई. 27 फरवरी की रात ही उसने  29 -30 लोगों की एक टीम को संगठित किया और सैकड़ो मुसलिम परिवारों को मौत के हवाले कर दिया.

सुरेश रिचर्ड और प्रकाश राठौड़ नामक बाबू बजरंगी की 'टीम' के दो सदस्यों ने तहलका के सामने कैमरे पर यह स्वीकार किया था कि कोडनानी सारा दिन नरोदा में गाड़ी लेकर घूमती रहीं और लोगों को मुसलमानों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर उनकी हत्या करने के लिए उकसाती रहीं.  मामले की पड़ताल के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने तहलका की पड़ताल से जुड़े सभी वीडियो टेपों को विशेष अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया था. आशीष खेतान भी गवाही और जिरह के लिए 4 दिन तक अदालत में मौजूद रहे.

2002 के गुजरात दंगों के दौरान दंगाइयों ने अहमदाबाद के नरोदा पाटिया नामक इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के 97 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके अलावा गोधरा हत्याकांड के ठीक अगले दिन, 28 फरवरी 2002 को हुए इस नरसंहार में 33 लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए थे. रिहायशी इलाकों में हुई आगजनी की वजह से 800 मुसलिम परिवार बेघर हो गए थे. शुरूआती जांच के बाद गुजरात पुलिस ने 46 लोगों को गिरफ्तार किया, मगर 2008 में मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त की गई 'विशेष जांच टीम' के हवाले कर दिया गया. इसके बाद 24 और लोगों को गिरफ्तार किया गया. चार्जशीट दाखिल होने से पहले ही कुल 70 आरोपितों में से छह की मृत्यु हो गयी थी और दो फरार घोषित कर दिए गए.

अगस्त 2009 में विशेष जांच टीम द्वारा कुल 62 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होते ही विशेष अदालत में मुकदमा शुरू हुआ. मुकदमे के दौरान इन 62 लोगों में से एक आरोपित की मृत्यु हो गई. लगभग 327 गवाहों के बयानों और तमाम सबूतों को संज्ञान में लेने के बाद अदालत ने 29 अगस्त, 2012 को अपना फैसला सुनाया. एक दशक पुराने नरोदा पाटिया जनसंहार को गुजरात दंगो के दौरान हुआ सबसे वीभत्स नरसंहार माना जाता है.

बाबू बजरंगी
बाबू बजरंगी, तहलका के खुफिया कैमरे पर..
 ...मुसलमानों को मारने के बाद मुझे महाराणा प्रताप जैसा महसूस हुआ.  मुझे अगर फांसी भी दे दी जाए तो मुझे परवाह नहीं. बस मुझे फांसी के दो दिन पहले छोड़ दिया जाए. मै सीधे जुहापुरा (अहमदाबाद का एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र) जाऊंगा जहां इनके 7-8 लाख लोग रहते हैं. मैं इन सबको खत्म कर दूंगा. इनके और लोगों को मरना चाहिए. कम से कम 25 -50 हजार लोगों को तो मरना ही चाहिए... जब मैंने साबरमती में हमारी लाशें देखीं, हमने उन्हें उसी वक्त चैलेंज कर दिया था कि इससे चार गुना लाश हम पटिया में गिरा देंगे. उसी रात आकर हमने हमले की तैयारी शुरू कर दी थी. हिंदुओं से 23 बंदूकें ली गईं. जो भी देने से मना करता, हमने उसे कह दिया था कि अगले दिन उसे भी मार दूंगा, भले ही वो हिंदू हो. एक पेट्रोल पंप वाले ने हमें तेल भी मुफ्त में दिया. और हमने उन्हें जलाया...’ -बाबू बजरंगी, तहलका के खुफिया कैमरे पर

सुरेश रिचर्ड
सुरेश रिचर्डतहलका के खुफिया कैमरे पर..
 ‘...जब उन्होंने सुबह 10 बजे हमारे पहले हमले का जवाब दिया तो हमने छर्रों (बंजारा जनजाति) को बुलाया. फिर सुबह 10.30 बजे के हमलों में कई छर्रे हमारे जुलूस में शामिल हुए. उन्होंने नरोदा पाटिया की नूरानी मस्जिद को जला दिया. तेल का एक टैंकर मस्जिद में घुसा दिया था. फिर आग लगा दी. उसी तेल का इस्तेमाल और दूसरे मुसलमानों को जलाने के लिए भी किया. देखो, जब भूखे लोग घुसते हैं तो कोई न कोई तो फल खाएगा न. ऐसे भी फल को कुचल के फेंक देंगे. मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं, माता मेरे सामने हैं. कई मुसलिम लड़कियों को मार कर जला दिया गया. तो कई लोगों ने फल भी खाए ही होंगे. मैंने भी खाया था, एक बार. लेकिन सिर्फ एक बार, क्योंकि उसके बाद हमें फिर से मारने जाना पड़ा...’ - सुरेश रिचर्ड, तहलका के खुफिया कैमरे पर

प्रकाश राठोड़ 
‘...मायाबेन (तत्कालीन स्थानीय एमएलए) दिन भर नरोदा पाटिया की सड़कों पर घूमती रहीं. वो चिल्ला-चिल्ला कर दंगाइयों को उकसा रही थीं और कह रही थीं कि मुसलमानों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारो...’-प्रकाश राठोड़, तहलका के खुफिया कैमरे पर....