वे बंद करवाएंगे, वहां उनकी ठुकाई की जाए और आखिरकार शिवसेना को एक आतंकवादी संगठन के तौर पर प्रतिबंधित कर दिया जाए। शिवसेना सारे वही काम कर रही है जो आम तौर पर दाऊद इब्राहीम की डी कंपनी करती है। वह फिल्मकारों और बिल्डरों से सरेआम वसूली करती है। पूरे मुंबई में जगह जगह शिवसेना के जो बोर्ड लगे हैं उन पर रोज भड़काऊ नारे लिखे जाते है। एक संजय निरुपम नाम के बिहारी को बाल ठाकरे ने मुंबई की अच्छी खासी वोट बैंक बटोरने के लिए पहले सामना के हिंदी संस्करण का संपादक बनाया था और फिर दो बार राज्यसभा में भेजा था।
बाल ठाकरे पढ़े लिखे आदमी हैं। एक अंग्रेजी अखबार में काम कर चुके हैं। अच्छे खासे कार्टूनिस्ट हैं लेकिन उनका रवैया गली के गुंडों वाला है। मेरा उन्हें सादर निमंत्रण है कि हमारी डेटलाइन इंडिया या मेरे टीवी चैनल सीएनईबी के पचास किलोमीटर के दायरे में ठाकरे शक्ल दिखा दें और सलाह है कि एंबुलेंस साथ में लेकर आए। उनकी ठुकाई करने के लिए बहुत लोग इंतजार कर रहे हैं।
आईबीएन-लोकमत में बाल ठाकरे के गुंडे निखिल वागले की तलाश करने गए थे। निखिल वागले हिंदी और मराठी चैनलों के संपादक बनने के पहले 'महानगर' नामक अखबार के संपादक थे और बाल ठाकरे की गुंडागर्दी के खिलाफ सबसे साहसी और सबसे मुखर आवाज उन्हीं की रही है। पहले भी ठाकरे अपने गुंडों के जरिए निखिल पर पांच बार हमले करवा चुके है। स्टार न्यूज से लेकर कई अखबारों तक पर भी उनके लोग धावा बोल चुके हैं।
बाल ठाकरे को एक बात का अंदाजा नहीं है। मुंबई में 20-25 लाख हिंदी भाषी रहते हैं। इनमें से कई को हिंसा करने में एक मिनट नहीं लगता। उनके घर मातृश्री पर हमला बोलने का अगर उन्होंने फैसला कर लिया तो एक एक ईंट उठा ले जाएंगे। मगर कांग्रेस शिवसेना की सरकार ने बाकायदा इस गुंडे को सरकारी पहरा दिया हुआ है। जिस आदमी की जगह जेल में होनी चाहिए, उसकी सुरक्षा सरकार कर रही है।
आईबीएन-लोकमत चैनल के आधे मालिक राज्य सरकार में मंत्री भी हैं इसलिए अशोक चव्हाण ने कहा है कि हमला करने वालो को सजा मिलेगी। पर यह तय है कि हमला करवाने वालों को सजा नहीं मिलेगी। अगर ठाकरे के गिरोह के गुंडों में जरा भी मर्दानगी शेष है तो वे 26/11 को क्या कर रहे थे जब मुंबई के सीने में पाकिस्तानी कातिलों की गोलियों से हमले किए जा रहे थे?
कायर लोग जब साहसी होने का अभिनय करते हैं तो उनसे ज्यादा निर्दयी और कोई नहीं होता। शिवसेना बार बार यह साबित कर रही है और हम बार बार इसे झेलने को मजबूर है।
लेखक आलोक तोमर हिंदी पत्रकारिता के बड़े नाम हैं. खरी-खरी लिखने-बोलने वाली अपनी शैली के कारण वे हर क्षेत्र में दोस्त और दुश्मन लगभग समान मात्रा में पैदा करते रखते हैं.
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