Tuesday, December 28, 2010

विश्व घटनाचक्र 2010


बनते-बिगड़ते सामरिक समीकरण, यूरोप में आर्थिक उथल पुथल, भारत- चीन जैसी उभरती महाशक्तियाँ, कोरिया में युद्ध के मंडारते बादल,अमरीकी दामन से निकलकर नई दिशा में बढ़ते इराक़ के हिचकिचाते क़दम, दुनिया को आँख दिखाता ईरान, चरमपंथ से जूझता अफ़ग़ानिस्तान...कुछ ऐसा रहा 2010 में विश्व का घटनाचक्र. और एक बात जो इस पूरे घटनाचक्र में समान रही वो है विश्व में उलट पुलट होता सत्ता सुंतलन. इसकी झलक आपको इस साल की हर बड़ी घटना में मिलेगी.

विकीलीक्स की दुनिया

  • ग्वांतानामो बे बंदी शिविर के क़ैदियों को दूसरे देशों के यहाँ रखवाने के लिए अमरीका का मोलभाव
  • रूस सरकार और माफ़िया में साँठगाँठ
  • मुशर्रफ़-मनमोहन थे समझौते के करीब
  • हिलेरी ने भारत की खिल्ली उड़ाई, कहा भारत ने सुरक्षा परिषद सदस्या की दौड़ में अपने आप को आगे कऱार दिया
  • सऊदी अरब अमरीका को उकसाता रहा है कि वो ईरान पर हमला करे
विकीलीक्स के घटनाक्रम तो ने साल का अंत-अंत होते पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया...ये वार न किसी हथियार का था, न परमाणु बम का न किसी मिसाइल का. ये घात लगाया इंटरनेट और तकनीक ने और इसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा अमरीका जैसे उस देश को जहाँ इंटरनेट को उसकी ताक़त समझा जाता है.
विकीलीक्स ने लाखों संवेदनशील कूटनयिक संदेश दस्तावेज़ों के रूप में प्रकाशित किए जिसमें अमरीका से लेकर पाकिस्तान और सऊदी अरब समेत कई देशों को लपेटे में लिया है.
विकीलीक्स ने विभिन्न देशों की कूटनीतिक नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए अमरीका की सार्वजनिक वाहवाही और निजी स्तर पर इन देशों को लेकर अमरीका की गंभीर चिंताएँ और आशंकाएँ... विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में ये विरोधाभास झलकता है.
पाकिस्तान और अमरीका ने दस्तावेज़ प्रकाशित करने के लिए विकीलीक्स की कड़ी निंदा की है.इन दस्तावेज़ों को लेकर कई देशों की झुंझलाहट कनाडा के प्रधानमंत्री के सलाहकार के बयान से साफ़ झलकती है. उन्होंने टीवी पर ये तक कह डाला कि विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की हत्या कर देनी चाहिए.
दस्तावेज़ लीक करने का विकीलीक्स का क़दम कितना सही और कितना ग़लत है इस पर बहस जारी है. लेकिन एक बात तो तय है कि इस पूरे किस्से से अमरीका काफ़ी विचलित हुआ है. बलात्कार के आरोप में जूलियन असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार किया गया है जिसे कुछ लोग बदले की कार्रवाई के तौर पर देख रहे हैं. पर क्या ये गिरफ़्तारी अमरीका पर मंडारते इस समस्या को टाल पाएगी?
(अमरीका में अंदरूनी तौर पर भी हलचल रही. मध्यावधि चुनाव मेंसत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को करारी हार मिली तो रिपब्लिकन पार्टी नेप्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया. ओबामा ने माना कि अर्थव्यवस्था पर लोग नाराज़ हैं. ऐसे में अब ओबामा प्रशासन को कई विधेयकों पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिलकर चलना होगा.)

इराक़-अफ़ग़ानिस्तान

अमरीका के लिए सिरदर्द बने विकीलीक्स में इराक़ से जुड़े दस्तावेज़ों का भी ज़िक्र है. इराक़ के संदर्भ में 2010 को बयां करना हो तो नूरी अल मलिकी का बयान याद आता है जहाँ उन्होंने कहा है कि 2010 में इराक़ ‘आज़ाद’ हो गया. वो इसलिए क्योंकि अगस्त 2010 में अमरीका ने इराक़ में अपना सैन्य मिशन अंतत ख़त्म कर दिया.
बड़ा सवाल ये है कि मार्च 2003 को शुरु हुए अमरीकी अभियान के बाद अब अमरीका कैसा इराक़ छोड़ कर जा रहा है? अंदरूनी हिंसा और राजनीतिक अस्थितरता से पार पा पाएगा इराक़?

इराक़

  • जुलाई 2010 तक 97461 से एक लाख से ज़्यादा की संख्या के बीच नागरिकों की मौत (स्रोत इराक़ बॉडी काउंट)
  • 2011 के अंत तक अमरीका इराक़ युद्ध के ख़र्च पर करीब 802 अरब डॉलर ख़र्च कर चुका होगा. (स्रोत कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस) जबकि कुछ विशेषज्ञ ये की़मत तीन ट्रिलियन डॉलर बताते हैं.
विभिन्न संस्थाएँ दावा करती हैं कि साढ़े सात सालों में एक लाख से ज़्यादा लोगों की जान गई. कई बार इराक़ी क़ैदियों के साथ प्रताड़ना तो कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.
राजनीतिक तौर पर भी इराक़ को लोग किसी परिपक्व देश के तौर पर नहीं देख रहे. नौ अप्रैल 2003 को बग़दाद में सद्दाम हुसैन की मूर्ति तोड़ते अमरीकी सैनिकों की तस्वीर आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है लेकिन यही तस्वीर ये सवाल भी पूछती है कि अमरीकी अभियान ने आख़िर क्या हासिल किया...क्या इराक़ में अमन शांति है, बेहतर सुविधाएँ हैं, राजनीतिक स्थिरता है?
अफ़ग़ानिस्तान
इराक़ के बाद अगर अमरीका ने किसी देश में अपना काफ़ी कुछ दाँव पर लगाया है तो वे है अफ़ग़ानिस्तान. 2010 अफ़ग़ानिस्तान के लिए काफ़ी अहम साल रहा. पेंटागन ने साफ़ तौर पर माना है कि अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथियों की ताकत बढ़ रही है और हिंसा नए स्तर पर पहुँच गई है.
वहीं बराक ओबामा ने कहा दिया है कि अमरीका जुलाई 2011 में सैनिक हटाना शुरु कर देगा. जबकि नैटो ने वर्ष 2014 के अंत तक सुरक्षा की कमान अफ़ग़ान सैनिकों के हाथों में सौंपे जाने की योजना को स्वीकृति दे दी है.
पर क्या अफ़ग़ान सुरक्षाबल अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा का ज़िम्मा लेने के लिए सक्षम हैं? तालिबान का ख़तरा, मादक पदार्थों की तस्करी और भ्रष्टाचार को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जा चुकी है. सैन्य अभियान की बात करें तो विकीलीक्स के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान युद्ध पर अमरीका अपनी करीबी सहयोगी ब्रिटेन से काफ़ी नाख़ुश है.
इस सबको देखते हुए अमरीका और नैटो के सामने चुनौती ये है कि वो 2014 के बाद एक बेहतर अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाएँ.
कोरिया और ईरान का हाल
अफ़ग़ानिस्तान का पड़ोसी ईरान पिछले कई सालों की तरह 2010 में भी अमरीका और पूरी दुनिया को आँख दिखाता रहा और अपने परमाणु कार्यक्रम पर डटा हुआ है.

परमाणु मसला

  • संयुक्त राष्ट्र चाहता है कि ईरान 18 साल से चालू यूरेनियम संवर्धन का काम रोके
  • संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर चार चरणों प्रतिबंध लगाए-2006,2007,2008,2010
  • ईरान ने अपने पहले परमाणु संयंत्र में रूसी परमाणु ईंधन से बिजली बनाना शुरु किया
ईरान पर कड़ा रुख अपनाने वाले अमरीका ने तो 2010 में ये तक कहा दिया कि ईरान भविष्य में असैन्य ज़रूरतों के लिए यूरेनियम संवर्धन कर सकता है बशर्ते ईरान ये दर्शाए कि ये काम ज़िम्मेदारी से कर सकता है. इससे पहले ऐसा सॉफ़्ट बयान अमरीका ने नहीं दिया,
परमाणु मसले पर ईरान ने एक साल बाद जाकर दिसंबर में अंततराष्ट्रीय जगत से बात की है पर कोई नतीजा नहीं निकला.
ईरान ने दो टूक शब्दों ने कहा दिया है कि अगर ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाए जाते हैं तो बातचीत का कुछ फ़ायदा हो सकता है. अगली बातचीत जनवरी में होगी. ईरान और अंतरराष्ट्रीय जगत में आँख मिचौली का खेल जारी है.
कोरिया
ईरान की तरह कोरिया ने भी दुनिया को असमंजस में डाला हुआ है.दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने कोरिया को दो खेमों में बाँट दिया था. 1953 के कोरिया युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 2010 में सबसे ज़्यादा तनाव देखा गया जब नवंबर में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर तोपों से गोले दाग दिए जिसमें कुछ सैनिक भी मारे गए. इसके बाद कोरियाई प्रायद्वीप में माहौल तनावपूर्ण हो गया.उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमरीका समेत अन्य देशों में चिंता है जबकि ईरान के मसले की ही तरह चीन अब भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उ.कोरिया के साथ खड़ा हुआ नज़र आता है.
चीन का बढ़ता प्रभुत्व
बात चाहे ईरान मसले की हो, उत्तर कोरिया की या वैश्विक अर्थव्यवस्था की.. 2010 का पूरा घटनाक्रम कहीं न कहीं विश्व में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को दर्शाता है.
कोरियाई प्रायद्वीप में संकट के बादल छाए तो सबकी नज़रें चीन पर थीं. अमरीकी सेना प्रमुख माइक मलेन ने भी माना है कि उत्तर कोरिया पर चीन का ‘अलग’ प्रभाव है जिसका इस्तेमाल चीन को उ. कोरिया पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहिए.
चीन के बढ़ते असर का एक नमूना विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में भी नज़र आता है. जिनमें कहा गया है कि मुंबई में 26/11 हमलों से पहले पाकिस्तान के कहने पर चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध को रोक लिया था. ये तब जब अमरीका प्रतिबंध के पक्ष में था.
विकीलीक्स से निकले दस्तावेज़ों में चीन को अमरीका की आशंका साफ़ झलकती है जहाँ राजनयिकों ने साफ़ तौर पर कहा है कि 'चीन बहुत ही आक्रमक और ख़तरनाक आर्थिक प्रतियोगी' है.
कूटनीतिक और सामरिक मामलों में ही नहीं, आर्थिक मामलों में भी दुनिया में चीन का दबदबा है. एक ओर जहाँ विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रही हैं, वहीं आर्थिक मंदी के बावजूद चीनी अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी हुई है.2010 में तो चीन जर्मनी को पछाड़ विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया.
चीनी कार्यकर्ता लियू शियाबो को नोबेल पुरस्कार दिए जाने को लेकर भी चीन दुनिया पर दवाब बनाता रहा कि कई देश इस कार्यक्रम का बहिष्कार करें और कई देशों ने ऐसा किया भी. वहीं युआन मुद्रा को लेकर भी दुनिया के बड़े देश और चीन आमने सामने हैं.
टीकाकारों की राय में तमाम मुद्दों पर चीन से मतभेदों के बावजूद अमरीका समेत किसी भी देश के लिए चीन से सीधे टकराव लेना अब उतना आसान नहीं रहा.
यूरोज़ोन संकट में
चीन जहाँ आर्थिक प्रगति की राह पर अग्रसर है वहीं आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश में लगे विश्व को 2010 में यूरोप ने झटका दिया. मज़बूत माने जाने वाले कई यूरोपीय देश धराशायी हो गए जिसका राजनीतिक असर भी देखने को मिला.
ग्रीस में मई 2010 की एक घटना यूरोप में छाए आर्थिक संकट की गंभीरता को दर्शाती है. ग्रीस में सरकार की आर्थिक कटौतियों के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों में नाराज़ नागरिकों ने एक बैंक की इमारत को आग लगा थी और अंदर तीन कर्मचारियों की मौत हो गई जिसमें एक गर्भवती महिला भी थीं.
संकट से घिरे सब यूरोपीय देशों की स्क्रिप्ट एक जैसी ही रही- देश पर कर्ज़ का बोझ, आर्थिक कटौतियाँ, लोगों का विरोध प्रदर्शन और फिर संकट से जूझने के लिए बाहरी मदद का सहारा.
  • रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड को यूरोपीय संघ और आईएमएफ़ से लेनी पड़ी मदद
  • कर्ज़ चुकाने के लिए ग्रीस को यूरोपीय यूनियन की मदद
  • ब्रिटेन में बड़े स्तर पर बजट में कटौती, लोगों का विरोध प्रदर्शन
  • यूरोप के कई बड़े देश कर्ज़ के बोझ तले दबे
  • इटली का कुल कर्ज़ उसकी जीडीपी का 115.8 फ़ीसदी, ग्रीस का कुल कर्ज़ 115.1 फ़ीसदी ( आँकड़े 2009 के)
शुरु करते हैं ब्रिटेन से जहाँ 2010 में चुनाव हुआ. नई सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की राह में बड़े पैमाने पर कटौतियाँ घोषित की.
लंदन की सड़कों पर दशकों बाद विरोध के ऐसे दृश्य देखने को मिले जब हज़ारों छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर आए.
वहीं कर्ज़ तले दबे रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड की सरकार को अपना आर्थिक संकट सुलझाने के लिए अंतत यूरोपीय संघ की शरण में जाना पड़ा. अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ आयरलैंड को तीन साल के भीतर करीब 100 अरब डॉलर देंगे.
लेकिन आयरलैंड को इसके बदले में कई कटौतियों की घोषणा करनी पड़ीं. कटौतियों के ख़िलाफ़ ब्रिटेन की तरह यहाँ भी विरोध प्रदर्शन हुए. सरकार को इसका राजनीतिक ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ा और प्रधानमंत्री ब्रायन कावेन को घोषणा करनी पड़ी कि यूरोपीय संघ से मिलने वाली आर्थिक मदद की रूपरेखा तय होने के बाद वे नए साल में चुनाव करवाएँगे.
ग्रीस भी 2010 में आर्थिक संकट से जूझता रहा. अप्रैल में हालात ये थे कि ग्रीस पर लगभग 300 अरब यूरो का कर्ज़ था. नतीजतन बड़े स्तर पर कटौतियाँ. आख़िरकर यूरोपीय यूनियन ने 145 अरब डॉलर के कर्ज़ को मंज़ूरी दे दी थी
ग्रीस के संकट के कारण यूरोप ही नहीं दुनिया भर के बाज़ारों में गिरावट का दौर रहा. यूरोपीय संघ में इसे लेकर अफ़रा-तफ़री का माहौल था कि कहीं ग्रीस का संकट बाकी देशों को अपनी चपेट में न ले ले.
स्पेन समेत यूरोज़ोन के कई देशों के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं है और यूरो के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं. वहीं दुनिया के मज़बूत आर्थिक स्तंभ माने जाने वाले- अमरीका, यूरोप और जापान की भी स्थिति अच्छी नहीं है. जबकि भारत-चीन की विकास दर अच्छी चल रही है.
आशंका यही है कि वैश्विकरण के दौर में जब एक देश की आर्थिक डोर दूसरे से बंधी हुई है, ऐसे में एक देश में मचा आर्थिक कोहराम आसानी से अन्य देशों को अपनी चपेट में ले सकता है.
इसके अलावा 2010 में दुनिया में बर्मा में 20 साल बाद चुनाव देखे, सू ची की रिहाई देखी और फ़लस्तीनी-इसराइल शांति वार्ता फिर विफल होते देखी. गेंद अब वर्ष 2011 के पाले में है

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