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Friday, September 16, 2011

घोटाले करने की शायद दिल्ली को बीमारी है




करता अपने फर्ज़ से अब तो हर कोई गद्दारी है 
आज का शिक्षकसच पूछो तो शिक्षा का व्यापारी है 

सारी सड़केँ लाल पड़ी हैँ ख़ून से देखो जनता के 
और संसद मेँ वो ही पुरानी भाषणबाजी जारी है 

इक झूठा इल्ज़ाम लगाकर कैद मेँ उसको डाल दिया 
दुनियाँ भर की सरकारोँ पर जिसका केबिल भारी है 

इस मिट्टी का ज़र्रा ज़र्रा मैँने तुमको दान किया 
लेकिन इन सब दरियाओँ पर मेरी दावेदारी है 

कुछ दिन से हंगामा करने का तेरा भी मन है और 
दबी हुई मेरे अन्दर भी नफ़रत की चिँगारी है 

इतना सुनना था के मैँने फिर जल्दी से हाँ कर दी 
बाप भी उसका MLA है लड़की भी अधिकारी है 

तेरी यादेँ हर पल मेरे दिल पर दस्तक देती हैँ 
तेरी यादोँ से क्या मेरी कोई रिश्तेदारी है 

पूरा होते होते मेरा हर इक सपना टूट गया 
आरक्षण मेरे सपनोँ पर देखो इतना भारी है 

तुम रुठो या वो रुठे दुनियाँ परवाह नहीँ 
क्योँकि मुझको सच लिखने की बचपन से बीमारी है 

रोटी कपड़ा भूख ग़रीबी इन सब पर भी बात करो 
ज़ुल्फोँ मेँ ही उलझे रहना भी कोई फ़नकारी है
 

सिराज फैसल खान