Thursday, February 14, 2013

अफज़ल गुरु से एक मुलाकात



हिंदी मीडिया में पहली बार प्रकाशित
तिहाड़ जेल से अफ़ज़ल गुरु का लिया गया पहला साक्षात्कार
अफज़ल गुरु से विनोद के जोसे की विशेष बातचीत

आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि मेरा बेटा एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है...अनुवाद- अजय प्रकाश और विश्वदीपक

तिहाड़ जेल में करीब 4.30 बजे मेरी मुलाकात की बारी आई. एक वर्दीधारी ने मेरा ऊपर से नीचे तक परीक्षण किया. जब मेटल डिटेक्टर चीं-चीं की आवाज करने लगा तब मुझे बेल्ट, स्टील की घड़ी और चाबियों को निकालने के लिए कहा गया. उस वक्त ड्यूटी में तैनात तामिलनाडु स्पेशल पुलिस का वह जवान मेरी जाँच के बाद संतुष्ट लग रहा था. अब मुझे अंदर जाने की इजाजत दे दी गई थी. ये चौथी बार था जब तिहाड़ सेंट्र्ल जेल के अति खतरनाक वार्ड के जेल नंबर तीन में जाने के लिए सुरक्षा जांच की गई थी. मैं उस वक्त मोहम्मद अफजल से मिलने जा रहा था, जो उस दौर की चर्चाओं में सर्वाधिक था.
मैं एक ऐसे कमरे में दाखिल हुआ, जहां कई क्यूबिकल बने हुए थे. एक मोटा कांच और लोहे की सलाखें कैदियों को मुलाकातियों से अलग करती थीं. दीवार पर चस्पां एक माइक्रोफोन के जरिए मुलाकाती और कैदी एक दूसरे के संपर्क में आते थे. हालांकि माइक्रोफोन की आवाज घटिया थी. मुलाकाती और कैदी को एक दूसरे की बात समझने के लिए दीवार से कान लगाना पड़ता था. मैंने देखा कि क्यूबिकल से दूसरी ओर मोहम्मद अफजल पहले से ही खड़ा था. उसके चेहरे पर गरिमा और शांति की झलक थी. दुबली पतली काया, नाटे कद और जेब में रेनाल्ड का पेन रखे हुए अफजल की उम्र उस वक्त पैंतीस के आसपास रही होगी.

अफजल ने उस दिन सफेद कुर्ता पायजामा पहन रखा था.बेहद विनम्रता से भरी हुए एक स्पष्ट आवाज ने मेरा स्वागत किया- 'कैसे हैं श्रीमान.'मैंने कहा, “अच्छा हूं”. क्या मुझे बदले में मौत के दरवाजे पर खड़े उस इंसान से भी यही सवाल पूछना चाहिए. कुछ देर के लिए मैं सोच में पड़ गया, लेकिन अगले ही पल मैंने पूछ ही लिया. “शुक्रिया! मैं एकदम ठीक हूं”-- उसने जवाब दिया. अफजल से मेरी ये मुलाकात उस दिन करीब एक घंटा और (पंद्रह दिन के अंतराल के बाद) दूसरी मुलाकात तक चली. हम दोनों को पूछने और जानने की जल्दी थी. मैं लगातार अपनी छोटी डायरी में लिखता रहता था. उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वो दुनिया से बहुत कुछ कहना चाहता था. लेकिन बारंबार वो लोगों से अपनी बात न कह पाने की असहायता जाहिर करता था. पेश है उससे बातचीत के अंश -
afzal-guru
एक अफजल के कई चेहरे हैं. मैं किस अफजल से मिल रहा हूं?
क्या वाकई ऐसा है. जहां तक मेरा सवाल है मैं एक ही अफजल को जानता हूं. और वो मैं ही हूं. दूसरा अफजल कौन है. (थोड़ी चुप्पी के बाद) अफजल एक युवा है, उत्साह से भरा हुआ है, बुद्धिमान और आदर्शवादी युवक है.नब्बे के दशक में जैसा कि कश्मीर घाटी के हजारों युवक उस दौर की राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित हो रहे थे वो (अफजल) भी हुआ. वो जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का सदस्य था और सीमा पर दूसरी ओर चला गया था. लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद वो भ्रम का शिकार हो गया और उसने सीमा पार की और वापस इस तरफ आ गया. और एक सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करने लगा, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. वो मुझे बार-बार उठाते रहे. प्रताड़ित करके मेरा भुर्ता बना दिया, बिजली के झटके दिए गए, ठंडे पानी में जमा दिया गया, मिर्च सुंघाया गया...और एक फर्जी केस में फंसा दिया गया. मुझे न तो वकील मिला, न ही निष्पक्ष तरीके से मेरा ट्रायल किया गया. और आखिर में मुझे मौत की सजा सुना दी गई. पुलिस के झूठे दावों को मीडिया ने खूब प्रचारित किया और सुप्रीम कोर्ट की भाषा में जिसे देश की सामूहिक चेतना कहते हैं वो मीडिया की ही तैयार की हुई है. देश की उसी सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिए मुझे मौत की सजा सुनाई गई. मैं वही मोहम्मद अफजल हूं, जिससे आप मुलाकात कर रहे हैं.
(फिर थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलना जारी) मुझे शक है कि बाहर की दुनिया को इस अफजल के बारे में कुछ भी पता है या नहीं. मैं आपसे ही पूछना चाहता हूं कि क्या मुझे मेरी कहानी कहने का मौका दिया गया? क्या आपको भी लगता है कि न्याय हुआ है? क्या आप एक इंसान को बिना वकील दिए हुए ही फांसी पर टांगना पसंद करेंगे?बिना निष्पक्ष कार्रवाई के, बिना ये जाने हुए कि उसकी जिंदगी में क्या कुछ हुआ? क्या लोकतंत्र का यही मतलब है?

क्या हम आपकी उस जिंदगी के बारे में बात करें जो केस शुरू होने से पहले थी?
वो दौर कश्मीर में भयानक उथल पुथल का था, जब मैं बड़ा हो रहा था. मकबूब भट्ट को सूली पर चढ़ाया जा चुका था. स्थिति काफी विस्फोटक थी. कश्मीर के लोगों ने शांति के रास्ते से चुनाव लड़कर कश्मीर का मसला सुलझाने की कोशिश की थी. कश्मीर मसले के अंतिम समाधान के लिए, कश्मीर के लोगों की भावनाओं को बयान करने के लिए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट बनाया गया था. लेकिन दिल्ली में बैठी सरकार एमयूएफ को मिल रहे समर्थन से भयभीत हो गई थी. और इसका अंजाम ये हुआ कि लोगों ने चुनाव में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन जिन नेताओं ने चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनका अपमान किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया. इसी घटना के बाद उन्हीं नेताओं ने हथियार बंद संघर्ष का आह्वान किया. हजारों युवाओं ने हथियार बंद विद्रोह का रास्ता चुना. झेलम मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर में मैंने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ दी. मैं उन लोगों में से भी था, जिन्होंने जेकेएलएफ के सदस्य के तौर पर सीमा पार की थी, लेकिन जब मैंने देखा कि पाकिस्तान के नेता भी कश्मीर के मसले पर उसी तरह का (दोहरा) रवैया रखते हैं जैसे भारत के तो मैं भ्रम का शिकार हो गया. कुछ सप्ताह बाद मैं वापस आ गया. मैंने सुरक्षा कर्मियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. मुझे बीएसएफ ने आत्मसमर्पण किए हुए आतंकी का सर्टिफिकेट भी दिया. मैंने अपनी सामान्य जिंदगी शुरू कर दी. मैं डॉक्टर तो नहीं बन सका लेकिन मैं दवाओं का डीलर जरूर बन गया. इसके बदले में मुझे कमीशन मिलता था. (हंसी)
अपनी छोटी सी ही कमाई के सहारे मैंने एक स्कूटर खरीद ली और मैंने शादी भी कर ली. इस दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब राष्ट्रीय राइफल्स और एसटीएफ के जवानों ने मुझे प्रताड़ित न किया हो. अगर कश्मीर में कहीं भी आंतकी हमला होता तो वो नागरिकों को पकड़ते और उन्हें प्रताड़ित करते. मुझ जैसे आतंकवादियों ने जिसने समर्पण कर दिया था, उनकी स्थिति तो और भी खराब थी. वो हमें कई हफ्तों के लिए बंद कर देते, झूठे केस में फंसा देने की धमकी देते और हम तभी छूटते जब हम उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम देते. मेरे साथ तो ऐसा कई बार हुआ है. 22 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर राम मोहन रॉय ने तो मेरे गुप्तांगों तक में करंट लगवाया. कई बार मुझसे वो लोग उनके पखाने और कैंपस तक साफ करवाते थे. हुमहामा में मौजूद एसटीएफ के प्रताड़ना शिविर से बचने के लिए तो मैंने बकायदा एक बार सुरक्षा कर्मियों को घूस तक दिया था. डीएसपी विनय गुप्ता और दविंदर सिंह की देख रेख में मुझे प्रताड़ित किया गया. प्रताड़ित करने में माहिर इंस्पेक्टर शांति सिंह ने एक बार मुझे तीन घंटे तक प्रताड़ित किया. और वो तब तक ऐसा करता रहा जब तक मैं एक लाख बतौर घूस देने के लिए तैयार नहीं हो गया. रकम पूरी करने के लिए मेरी पत्नी ने अपने जेवर बेच दिए. मुझे अपनी स्कूटर भी बेचनी पड़ी. जब मैं प्रताड़ना शिविर से बाहर निकला तब तक मैं मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था. छह महीने तक मैं घर के बाहर नहीं निकल सका क्योंकि मैं अंग भंग हो गया था. मैं अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर भी नहीं जा सकता था क्योंकि मेरे गुप्तांगों को बिजली के झटके दिए गए थे. इसके इलाज के लिए मुझे दवाईयां खानी पड़ी...
(जब अफजल ये सब बता रहा था तो उसके चेहरे की शांति भंग हो चुकी थी. ऐसा लगता था जैसे उसके पास मुझे बताने के लिए ज्यादा से ज्यादा बातें हैं, लेकिन मेरे टैक्स के पैसे से चलने वाली सुरक्षा एजेंसियों की प्रताड़ना की इतनी कहानियां सुनने मैं असमर्थ था. मैंने बीच में ही उसे टोक दिया...)

अगर आप केस के बारे में बात कर सकें तो बताएं...वो कौन सी घटनाएं थीं, जिनके बाद संसद पर हमला हुआ ?
आखिरकार एसटीएफ कैंप में (प्रताड़ना के बाद) मैं ये सीख चुका था कि आप चाहे एसटीएफ का सहयोग करें या विरोध आप या आपके परिवार वालों को परेशान होना ही है. मेरे पास शायद ही कोई विकल्प था. डीसीपी दविंदर सिंह ने मुझसे कश्मीर में कहा कि तुम्हें दिल्ली में एक छोटा सा काम करना है. ये उसके लिए "छोटा सा काम" था. दविंदर सिंह ने मुझे कहा कि मुझे एक आदमी को दिल्ली लेकर जाना है और उसके लिए किराए का ठिकाना खोजना था. मैं उस आदमी से पहली बार मिला था. चूंकि वो कश्मीरी नहीं बोल रहा था, इसलिए मुझे लगा कि वो आदमी बाहरी था. उसी ने मुझे बताया कि उसका नाम मोहम्मद था. (पुलिस ने मोहम्मद की पहचान संसद पर हमला करने वाले पांचों आतंकिवादियों के नेता के अगुवा के तौर पर की है. पांचों आतंकवादी हमले में मारे गए थे.) जब हम दिल्ली में थे, तब मुझे और मोहम्मद दोनों को दविंदर सिंह फोन करता था. मैंने नोटिस किया कि मोहम्मद दिल्ली में कई लोगों से मिलता था. जब उसने एक कार खरीद ली तब उसने मुझे उपहार के तौर पर 35 हजार रुपये दिए. इसके बाद मैं ईद का त्यौहार मनाने कश्मीर चला गया. जब मैं श्री नगर बस स्टैंड से सोपोर रवाना होने वाला था, तब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और परिमपोरा थाने ले जाया गया. वहां मुझे प्रताड़ित किया गया. इसके बाद वो लोग मुझे एसटीएफ हेडक्वार्टर ले गए और वहां से मुझे दिल्ली लाए. दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के प्रताड़ना शिविर में मैंने उन लोगों को वो सब कुछ बताया जो मोहम्मद के बारे में मुझे पता था. लेकिन वो लोग मुझे ये मनवाने पर अड़े थे कि मेरा चचेरा भाई शौकत, उसकी पत्नी नवजोत और एसएआर गिलानी के साथ मैं ही संसद हमले का जिम्मेदार था.
वो चाहते थे कि ये बात मैं पूरी दृढ़ता से मीडिया के सामने कहूं. हालांकि मैंने इसका विरोध किया. लेकिन मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं था. मेरा परिवार उन लोगों की गिरफ्त में था. मुझसे सादे कागज में दस्तखत कराए गए और कहा गया कि मुझे मीडिया से बात करनी है. मुझसे जबरन वही बातें कहलवाई गईं जो पुलिस मुझे पहले से ही रटा चुकी थी. इसमें संसद पर हमले की जिम्मेदारी लेना भी शामिल था. जब एक पत्रकार ने मुझसे एसएआर गिलानी के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि वो निर्दोष है. तब एसीपी राजबीर सिंह भरी मीडिया के सामने चिल्ला उठा. वो लोग मुझसे इस बात के लिए नाराज थे कि मैंने उनकी सिखाई हुई बातों से अलग भी कुछ कह दिया था. उस वक्त राजबीर सिंह ने पत्रकारों से गिलानी को निर्दोष ठहराने वाली मेरी बाइट न चलाने के लिए भी कहा था.
अगले दिन राजबीर सिंह ने मुझे मेरी बीबी से बात करने की इजाजत दी. साथ ही उन्होंने धमकी भी दी कि अगर तुम अपनी बीबी का जीवित देखना चाहते हो तो हम जैसा कहते हैं वैसा करो. ऐसे में मेरे सामने एक ही विकल्प था कि मुझपर लगाये गये आरोपों को मैं स्वीकार कर लूं. दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने मुझसे यह भी कहा कि जैसा हम चाहते हैं तुम आरोपों को उसी तरह स्वीकार कर लेते हो तो तुम्हारे मुकदमे को हम कमजोर कर देंगे और मुझे जल्द ही रिहा कर दिया जायेगा. उसके बाद वे मुझे कई उन जगहों और बाजारों में ले गये जहां से मोहम्मद ने सामान खरीदे थे. इन सबको बाद में पुलिस ने सबूत बतौर पर पेश किया.
मैं कह सकता हूं कि जब दिल्ली पुलिस संसद हमले के मुख्य साजिशकर्ता को पकड़ने में नाकाम रही, तो उसने अपना मुंह छुपाने के लिए मेरा इस्तेमाल किया और मैं बलि का बकरा बना. पुलिस ने लोगों को मूर्ख बनाया. लोगों को आज भी नहीं पता कि संसद पर हमले की योजना किसकी थी. मैं पहले एक मामले में कश्मीर एसटीएफ की जाल में फंसाया गया और फिर उसी का दोहराव दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने किया.
मीडिया लगातार उस टेप को प्रसारित कर रहा है, पुलिस अधिकारी पुरस्कृत हो रहे हैं और मैं मौत का सजायाफ्ता.

आपको अबतक कानूनी मदद क्यों नहीं मिल सकी?
मुझे कभी मौका मिलता तब तो. मैंने ट्रायल के छह महीने तक अपने परिवार वालों को नहीं देखा. और जब एक बार सुनवाई के दौरान पटियाला कोर्ट में देखा भी, तो बहुत कम समय के लिए. मुझे कोई नहीं मिला जो मेरे लिए एक अदद वकील का इंतजाम करता. इस देश में किसी को भी कानूनी अधिकार पाने का मौलिक हक है, इस उम्मीद से मैंने चार वकीलों को नाम बताया, जिनसे मुझे उम्मीद थी कि वह मेरा केस लड़ सकते हैं. लेकिन एसएन ढिंगरा ने बताया कि सभी चार वकीलों ने मेरा मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया है. मेरे लिए अदालत ने जो वकील नियुक्त किया, वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान कुछ पेंचीदे दस्तावेज पेश करने लगीं, वह भी मुझसे पूछे बिना कि मामले का सच क्या है? उन्होंने मेरे मुकदमे की ठीक से पैरवी नहीं की और मेरी पैरवी छोड़ इस मामले के दूसरे आरोपी का मुकदमा लड़ने लगीं. फिर अदालत ने एक एमीकस क्यूरी (अदालत का मददगार) की नियुक्ति की, जो मेरा बचाव नहीं करते थे, बल्कि इस मामले में अदालत को मदद देते थे. मेरे लिए नियुक्त एमीकस क्यूरी मुझसे कभी नहीं मिले. उन्होंने मुझसे हमेशा एक दुश्मन की तरह बर्ताव किया, वे बेहद सांप्रदायिक थे. मैं कह सकता हूं कि ट्रायल की स्थिति में मेरा पक्ष सिरे से रखा ही नहीं गया.
इस मामले की सच्चाई यही है कि ऐसे संवदेनशील केस में पैरवी के लिए एक वकील नहीं था. किसी मुकदमे में वकील के न होने का क्या मतलब होता है, यह कोई भी समझ सकता है. अगर सरकार मुझे फांसी पर ही लटकाना चाहती है तो ऐसे लंबी उबाऊ कानूनी प्रक्रिया का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है.

आप दुनिया से क्या अपील करना चाहते हैं?
मेरे पास कुछ खास अपील करने को नहीं है. मुझे जो कहना है वह भारत के राष्ट्रपति को भेजी याचिका में कह दिया है. मैं सिर्फ सीधी सी बात यह कहना चाहता हूं कि अंधराष्ट्रवाद और गलत समझदारी के फेर में पड़कर अपने ही देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को नहीं छीनना चाहिए. इस मामले के दूसरे आरोपी एसएआर गिलानी (अब बरी) की उस बात को मैं याद दिलाना चाहता हूं, जब उन्हें ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा मुकर्रर की. उन्होंने कहा था, शांति, न्याय से बहाल होती है. जहां न्याय नहीं है वहां शांति नहीं होगी.’ कुल मिलाकर मैं भी यही कहना चाहता हूं. अगर वह चाहते हैं तो मुझे फांसी पर लटका दें, लेकिन याद रखें कि यह भारतीय न्यायिक और राजनीतिक तंत्र पर एक काला धब्बा होगा.

जेल में आपकी क्या स्थिति है?
मुझे अत्यधिक निगरानी के बीच अकेले एक कालकोठरी में रखा गया है. मैं अपनी कालकोठरी से दोहपर में बहुत कम समय के लिए बाहर आ पाता हूं. रेडियो, टेलीविजन की मेरे लिए मनाही है. यहां तक कि मुझे अखबार फाड़कर पढ़ने को दिया जाता है. अखबारों में मेरे बारे में जो खबर छपती है, उसे पूरे तौर पर फाड़ दिया जाता है.

भविष्य की अनिश्चितता के बीच समाज को लेकर आपकी मुख्य चिंताएं क्या हैं?
हां, बहुत सारी चीजों से मेरे सरोकार जुड़े हुए हैं. भारत की विभिन्न जेलों में कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले लोग बिना वकीलों के, बगैर ट्रायल के बंद हैं. उन्हें कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है. कश्मीरी नागरिकों की हालत भी इससे अलग नहीं है. घाटी अपने आप में एक खुली जेल है. हर रोज फर्जी मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं, लेकिन यह सिर्फ कुछेक उदाहरण भर हैं. कश्मीर के पास सबकुछ है, मगर आप उसे एक शिष्ट समाज के रूप में देखना ही नहीं चाहते. कश्मीरी नागरिक यंत्रणाओं-प्रताड़नाओं के बीच जीते हैं, उन्हें मुश्किल से न्याय मिल पाता है.
इन सबके अलावा और भी बहुत सारी बातें मेरे दिगाम में आती हैं. विस्थापित हो रहे किसानों की समस्या और दिल्ली में सील कर दिये गये दुकानदारों की हालत भी मुझे परेशानन करती हैं. देश में बहुत तरीके से अन्याय हो रहे हैं, जिन्हें देखा जा सकता है, चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन इसके खिलाफ कुछ किया नहीं जा सकता. कल्पना नहीं कर सकते कि कितने हजारों लोगों की जिन्दगी, उनके परिवार इसकी जद में आ रहे हैं. ये तमाम चीजें मुझे परेशान करती हैं.
थोड़ा सोचते हुए-
दुनिया में हो रहे भूमंडलीय विकास के बारे में भी मैं सोचता हूं. मैंने सद्दाम की फांसी के बारे में सुना तो मुझे बहुत दुख हुआ. ये सोचकर स्तब्ध रह गया कि क्या अन्याय इतना सरेआम और बेशर्मी से किया जा सकता है. दुनिया की महान सभ्यता ‘मेसोपोटामिया’ की भूमि ईराक, जिसने हमें साठ मिनट का घंटा दिया, चौबीस घंटे और 360 डिग्री का ज्ञान दिया उसे अमेरिका ने धूल-धूसरित कर दिया. अमेरिका तमाम सभ्यताओं और मूल्यों को नष्ट कर रहा है. आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का यह तथाकथित युद्ध सिर्फ नफरत फैलाने और तबाही के लिए है.

आजकल आप कौन सी किताबों को पढ़ रहे हैं?
मैंने हाल ही में अरूंधति रॉय की किताब पढ़ी हैं. अब में सात्र का अस्तित्ववाद का सिद्धांत पढ़ रहा हूं. जेल की लाइब्रेरी में बहुत कम और साधारण किताबें हैं. इसलिए मैंने एसपीडीपीआर (सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ डिटेंनिज एंड प्रिजनर्स राइट) के सदस्यों से किताबों के लिए अपील की है.

एसपीडीआर आपके समर्थन में एक अभियान है न?
जी हाँ. उन हजारों लोगों का मैं तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो मुझ पर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़े हैं. इनमें वकील, छात्र, लेखक, बुद्धिजीवी और समाज के अन्य तबकों के तमाम लोग शामिल हैं. मेरी गिरफ्तारी दिसंबर 2001 के कई महीनों बाद तक मुझे लगता रहा कि शायद मेरे मामले में न्यायप्रिय लोग खड़े नहीं होंगे. लेकिन जब एसएआर गिलानी को इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया तो लोगों ने पुलिसिया कहानी पर सवाल उठाने शुरू कर दिये. जैसे-जैसे लोगों को इस कहानी का झूठ पता चला वे न्याय के पक्ष में खड़े हो आवाज उठाने लगे. अब लोग मेरे पक्ष में खुलकर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि अफजल के साथ अन्याय हुआ है. यही सच भी है.

आपके परिजन मुकदमे को लेकर विरोधाभासी बयान दे रहे हैं?
मेरी बीबी लगातार कह रही है कि मुझे गलत ढंग से फंसाया गया है. उसने बहुत नजदीक से देखा है कि एसटीएफ मुझे किस तरह यंत्रणा देती थी. एसटीएफ ने मुझे कभी चैन से जीने नहीं दिया. मेरी बीबी यह भी अच्छी तरह जानती है कि इस मामले में मुझे किस तरह फंसाया गया. वह चाहती है कि मैं अपने बेटे गालिब को अपनी आंखों के सामने बढ़ते हुए देखूं. मेरे एक बड़े भाई भी हैं जो बखूबी जानते हैं कि एसटीएफ ने किस तरह मुझे दबाव में रखा और वे लगातार इसका विरोध करते रहे हैं. लेकिन अब वो मेरे मामले में कोई अलग बयान दें तो मैं क्या कह सकता हूं?
देखिये, कश्मीर में जो काउंटर इनसर्जेंसी के नाम पर ऑपरेशन किये जा रहे हैं उसने बहुत गंदा स्वरूप ले लिया है, जो भाई को भाई और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रहा है. अपने गंदे इरादों से वे एक समाज को तोड़ रहे हैं. जहां तक मेरे समर्थन में किये जा रहे अभियानों का सवाल है तो मैंने सिर्फ एसपीडीपीआर से ही सहयोग की अपील की है और उन्हें ही अधिकृत मानता हूं. यह संस्था एसएआर गिलानी और कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा चलायी जाती है.

अपनी बीबी तबस्सुम और बेटे गालिब के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में क्या ख्याल आते हैं?
हमारी शादी का यह दसवां साल है, जिसमें से आधा मैंने जेल में बिताया है. इससे पहले भी कई बार भारतीय सुरक्षाबलों ने कश्मीर में मुझे उठाया और पीड़ित किया. तबस्सुम मेरी शारीरिक और मानसिक यंत्रणाओं से बखूबी वाकिफ है. यंत्रणा कैंपों से लौटने के बाद कई बार मेरी हालत खड़े होने लायक नहीं रहती थी. शारीरिक प्रताड़ना के दौरन मेरे लिंग पर तक बिजली के झटके दिये जाते थे. तबस्सुम ने हमेशा मुझे जीने का साहस दिया. हम लोग एक दिन भी चैन से नहीं रहते थे. हालांकि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, तमाम कश्मीरी जोड़ों की है. कश्मीरी घरों में भय का बने रहना जीवन का सबसे प्रभावी अहसास है. बच्चा हुआ तो हम बहुत खुश थे. हमने अपने बच्चे का नाम महान गजलकार मिर्जा गालिब के नाम पर रखा. हमारा सपना था कि हम गालिब को बढ़ता हुआ देखें. मैं बहुत कम समय उसके साथ बिता पाया. गालिब के दूसरे जन्मदिन के बाद मुझे पुलिस ने फंसा लिया.

अपने बेटे को आप किस रूप में बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं?
अगर आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि वो एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है.

अगर कश्मीर समस्या के बारे में पूछें तो आप इसका क्या हल देखते हैं?
सबसे पहले सरकार को कश्मीरी आवाम के प्रति संवेदनशील होना होगा और कश्मीर का वास्तविक प्रतिनिधित्व करने वालों के साथ वार्ता करनी चाहिए. भरोसा कीजिये कश्मीर का वाजिब प्रतिनिधित्व करने वाले ही समस्या का हल निकाल सकते हैं. लेकिन अगर सरकार काउंटर इनसर्जेंसी के टैक्टिस के तौर पर शांति वार्ता का नाटक करेगी तो इस समस्या का कोई समाधान नहीं है. अब समय आ गया है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाये.

कौन हैं कश्मीर के वास्तविक प्रतिनिधि?
मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहता. इनका चुनाव कश्मीरी आवाम की भावनाओं के मद्देनजर किया जा सकता है. साथ ही मैं भारतीय मीडिया से अपील करना चाहता हूं कि वो इस मामले में दुष्प्रचार न करे, आवाम को सच से परिचित कराये. गलत तथ्य, आधी-अधूरी खबरें, राजनीतिक प्रभाव वाले समाचार ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो क’मीर में कट्टरपंथी और आतंकी ताकतों को खड़ा कर रहे हैं. इस तरह के पत्रकार खुफिया एजेंसियों के खेल में आसानी से शामिल हो जाते हैं और ऐसी असंवेदनशील पत्रकारिता आखिरकार समस्याओं को बढाती ही है. इसलिए सबसे जरूरी है कि मीडिया कश्मीर के बारे में गलत सूचनायें देनी बंद करे. भारतीय नागरिकों को कश्मीरी संघर्ष का इतिहास का सच जानने दिया जाये जिससे वे वहां की जमीनी हकीकत से रू-ब-रू हो सकें. अगर भारत सरकार कश्मीरी आवाम की इच्छा अनुरूप समस्याओं के हल की पहल नहीं करती है तो यह क्षेत्र हमेशा संघर्षों के हवाले रहेगा.
दूसरा, जब भारतीय न्यायतंत्र जेलों में बंद सैकड़ों कश्मीरियों को बिना वकील और बगैर फेयर ट्रायल के फांसी देने पर आमादा है तो कश्मीरी आवाम के बीच इसका क्या संदेश जायेगा. बुनियादी हकों को बहाल किये बगैर कश्मीर समस्या का समाधान कैसे संभव है? इसका एकमात्र उपाय है कि भारत-पाकिस्तान दोनों की ही लोकतांत्रिक संस्थायें मसलन संसद, न्यायपालिका, मीडिया, बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ इस मसले पर गंभीरता से पेश आयें.

संसद हमले में नौ सुरक्षाबलों के जवान मारे गये, आप उनके परिजनों से क्या कहना चाहेंगे?
जिन्होंने अपने परिजनों को गंवाया है, मैं उनकी तकलीफ को महसूस कर सकता हूं. लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूं कि उन्हें बहकाकर मुझ जैसे एक निर्दोष आदमी की फांसी से संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है. मुझे एक मोहरे के बतौर राष्ट्रवाद के नाम पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है. मैं अपील करूंगा कि वे इससे बाहर निकलें और मेरे नजरिये से भी सोचें.

आप अपने जीवन में अब तक की क्या उपलब्धि देखते हैं?
मेरी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे मुकदमे से जुड़े अन्याय के खिलाफ चले अभियान की है, जिसके जरिये एसटीएफ का खौफ उजागर हो पाया. मुझे ख़ुशी है कि सुरक्षाबलों द्वारा नागरिकों पर किये जा रहे अत्याचार, फर्जी मुठभेड़ों, उनके गायब होने, उन्हें प्रताडि़त किये जाने आदि पर अब लोगों के बीच चर्चा हो रही है. कश्मीरी इन्हीं सब सच्चाइयों के बीच बढ़े-पले हैं. कश्मीर के बाहर के लोगों को कतई नहीं मालूम है कि भारतीय सुरक्षाबल वहां क्या कहर ढाते हैं. अगर बिना अपराध के वो हमें मार भी दें तो यह कोई सवाल नहीं है. एक क’मीरी को बिना वकील की पैरवी के फांसी पर भी लटका दिया जाये तो यह कोई बड़ी बात नहीं होगी.

आप खुद को किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे?
कुछ देर सोचने के बाद-
अफजल के रूप में, मोहम्मद अफजल के रूप में. मैं कश्मीरी आवाम के लिए भी अफजल हूं और भारतीयों के लिए भी, लेकिन दोनों की निगाह में अलग-अलग. मैं कश्मीरी लोगों के न्याय पर पर सहज विश्वास कर सकता हूं. सिर्फ इसलिए नहीं की मैं उनके बीच से हूं बल्कि इसलिए कि वे सच से बखूबी वाकिफ हैं. उन्हें कभी भी इतिहास या पुरातन में गलतबयानी के जरिये बहकाया नहीं जा सकता है.

विनोद के जोसे अंग्रेजी पत्रिका 'कारवां' के कार्यकारी संपादक हैं. वर्ष 2006 में अफज़ल गुरू का यह साक्षात्कार सबसे पहले रीडिफ़-कॉम में प्रकाशित हुआ था. अब आप इस साक्षात्कार को कारवां की वेबसाइट पर अंग्रेजी में देख सकते हैं.

Sunday, February 03, 2013

मैं खान हूं।



मैं कलाकार हूं। वक्त मेरे दिन को तय नहीं करता, जितनी दृढ़ता से छवियां करती हैं। छवियां मेरे जीवन पर राज करती हैं। घटनायें और यादें तस्वीर के रूप में खुद मेरे जेहन में अंकित हो जाती हैं। मेरी कला का मूल है- छवियां गढ़ने की क्षमता, जो देखनेवाले की भावनात्मक छवि के साथ मिल जाती है।
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मैं खान हूं। यह नाम ही मेरे जेहन में खुद कई प्रकार की छवियां उभारता है। जैसे घोड़े पर बैठा एक आदमी। सिर पर पगड़ी के नीचे से उसके बाल लहरा रहे हैं। एक सांचे में गढ़ दिया गया कट्टरपंथी। जो न नाचता है, न शराब पीता है, न ईशनिंदा करता है। शांत मोहक चेहरा। लेकिन जिसके अंदर हिंसक पागलपन सुलग रहा है। एक ऐसा पागलपन जो उसे ईश्वर के नाम पर खुद को खत्म कर देने को प्रेरित कर सकता है। तभी मेरे जेहन में अमेरिकी एयरपोर्ट के पीछे बने कमरे में मुझे ले जाने की तस्वीर उभरती है। कुछ कपड़े उतारना, जांच करना और बाद में कई सवाल। मुझे कुछ इस तरह का तर्क दिया गया कि आपका नाम हमारे सिस्टम में आ रहा है, इसके लिए माफी। फिर मेरे जेहन में अपने देश में खुद की छवि उभरती है। वहां मुझे मेगास्टार कहा जाता है। प्रशंसक प्यार और गर्व से मेरी प्रशंसा करते हैं।

मैं खान हूं। मैं कह सकता हूं कि इन सभी छवियों में मैं फिट हूं। सीमित ज्ञान और पहले से ज्ञात मानकों के आधार पर हम घटना, चीज और लोगों की परिभाषा तय करने में राहत महसूस करते हैं। इन परिभाषाओं से स्वाभाविक तौर पर उपजी संभावनाएं हमें अपनी सीमाओं के दायरे में सुरक्षित होने का आभास देती हैं। हम खुद-ब-खुद छवि का एक छोटा बक्सा बनाते हंै। ऐसा ही एक बक्सा मौजूदा समय में अपने ढक्कन को कस रहा है।

इसी बक्से में लाखों लोगों के जेहन में मेरे धर्म की छवि है। मेरे देश में मुस्लिम समाज को जब भी अपना पक्ष रखने की जरूरत होती है, मेरा सामना इससे होता है। जब कभी इस्लाम के नाम पर हिंसा की घटना होती है, मुझे मुसलिम होने के नाते इसकी भत्र्सना करने के लिए बुलाया जाता है। अपने समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे एक आवाज के तौर पर चुना जाता है, ताकि दूसरे समाज को प्रतिक्रिया देने से रोका जा सके।

मैं कभी-कभार, जाने-अनजाने कुछ राजनेताओं द्वारा भारत में मुस्लिमों की देशभक्ति पर संदेह और अन्य दूसरी गलतियों का एक प्रतीक बनाने के लिए चुन लिया जाता हूं। ऐसे भी मौके आये जब मुझ पर अपने देश की बजाय पड़ोसी मुल्क के प्रति वफादार होने का आरोप लगाया गया। हालांकि मैं भारतीय हूं और मेरे पिता ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी।

मैंने अपने बेटे और बेटी का अखिल भारतीय और अखिल धार्मिक नाम रखा। आर्यन और सुहाना। खान विरासत में मेरे द्वारा दिया गया है और वे इससे बच नहीं सकते। कभी-कभार वे पूछते हैं कि उनका धर्म क्या है और मैं दार्शनिक अंदाज में उनसे कहता हूं कि आप पहले भारतीय हैं और आपका धर्म मानवता है या पुराना गाना कि ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा- इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’। अमेरिकी जमीन पर जहां मुझे कई बार सम्मानित करने के लिए बुलाया गया, मेरे जेहन में कई विचार उभरे, जो एक खास संदर्भ में होते थे। एयरपोर्ट पर रोकने की घटना मेरे साथ कई बार हो चुकी है।

आतंकवादियों के आखिरी नाम से मेरा नाम मिलने के कारण अपनी गलत पहचान से मैं इतना परेशान हो गया कि मैंने ‘माय नेम इज खान’ फिल्म बनायी ताकि अपनी बात साबित कर सकूं। मेरे आखिरी नाम को लेकर अमेरिकी एयरपोर्ट पर मुझसे घंटों पूछताछ की गयी। कभी-कभार मैं सोचता हूं कि क्या ऐसा ही सलूक सभी के साथ होता होगा, जिसका आखिरी नाम मैकवे या टिमोथी हो?

मैं किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन, सच कहा जाना चाहिए। हमलावर और जिंदगी छीननेवाले अपने दिमाग का अनुसरण करते हैं। इसका किसी के नाम, उसके स्थान, उसके मजहब से कोई लेना-देना नहीं होता है।

मुझे मेरे धर्म की शिक्षा पेशावर के एक खूबसूरत पठान ‘पापा’ ने दी। जहां उनके और मेरे परिवार के लोग आज भी रहते हैं। वे अहिंसक पठान आंदोलन ‘खुदाई खिदमतगार’ के सदस्य रहे थे और खान अब्दुल गफ्फार खान और गांधीजी दोनों के ही अनुयायी थे। उनसे मैंने इसलाम की जो पहली सीख ली वह थी औरतों और बच्चों का सम्मान करना और हर इंसान की गरिमा को बनाये रखना।

मैंने सीखा कि दूसरों के गुण, उनकी मर्यादा, उनकी दृष्टि, उनके विश्वास और दर्शन का उसी तरह सम्मान करना चाहिए, जिस तरह से मैं अपना करता हूं और उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया जाना चाहिए। मैंने अल्लाह की शक्ति और दयालुता पर यकीन करना सीखा। साथ ही इंसानों के साथ सौम्य और दयालु होना भी। हां, तो मैं एक खान हूं। लेकिन मुझमें मेरे अपने अस्तित्व को लेकर कोई बनी-बनायी धारणा नहीं है। मुझे लाखों-लाख भारतीयों की मोहब्बत मिली है। पिछले बीस वर्षों से मुझे यह स्नेह मिल रहा है, इस तथ्य के बावजूद कि मैं अल्पसंख्यक समुदाय से हूं। मुझे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक सरहदों के आर-पार लोगों की बेपनाह मोहब्बत मिली है। मेरे जीवन ने मुझमें यह गहरी समझ पैदा की है कि प्यार आपसदारी का मामला है। विचार की संकीर्णता इसके आड़े नहीं आती।

अपने सुपरस्टारडम के नीचे मैं एक साधारण इंसान हूं। मेरे मुसलमान होने का मेरी पत्नी के हिंदू होने से किसी किस्म का संघर्ष नहीं होता। हमारी एक बेटी है, जो घिरनी की तरह नाचती है और अपने नृत्य की खुद कोरियोग्राफी करती है। वह पश्चिमी गाने गाती है, जो मेरी समझ में नहीं आते। वह एक अदाकारा बनना चाहती है। किसी मुस्लिम देश में जहां सिर को ढकने की खूबसूरत, लेकिन अक्सर गलत समझी जानेवाली प्रथा का पालन किया जाता है, वह भी अपने सिर को ढंकने की जिद करती है।

मेरा मानना है कि हमारा धर्म नितांत व्यक्तिगत चयन का मामला है। न कि उसे सामाजिक रूप से अपनी पहचान के तौर पर घोषित करने का। आखिर क्यों न वह प्रेम जिसे हम साझा करते हैं, वही हमारी पहचान का आधार बने, बनिस्बत कि हमारे नाम के आखिरी हिस्से के। प्रेम देने के लिए किसी का सुपरस्टार होना जरूरी नहीं है। इसके लिए सिर्फ एक दिल होना चाहिए। और जहां तक मैं जानता हूं दुनिया में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो किसी को दिल से वंचित कर सके।

मैं एक खान हूं। और इसका मतलब सिर्फ ऐसा इंसान होने से ही है। भले ही मेरे इर्द-गिर्द एक बनी-बनायी छवि खड़ी कर दी गयी हो। एक खान होने का मतलब सिर्फ यही है कि प्रेम पाओ और बदले में प्रेम दो।

(‘आउटलुकः टर्निग प्वाइंट, द ग्लोबल एजेंडा 2013’ में छपे शाहरुख खान के लेख का अंश। इस लेख को आधार बना कर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने 28 जनवरी को आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और फिर दोनों देशों की ओर से जो बयानबाजी हुई उसके बाद आपसी रिश्ते और तल्ख हो गये।)

Friday, January 25, 2013

कश्मीर पर तो राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए



(पीयूडीआर ने जम्मू-कश्मीर में सैनिकों द्वारा उत्पीड़न पर ‘इम्प्यूटिनी फॉर एलिजिड परपेट्रेटर्स एंड क्वेस्ट फॉर जस्टिस इन जम्मू एंड कश्मीर’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 214 घटनाओं के हवाले से स्थिति की भयावहता स्पष्ट की गई है। रिपोर्ट के आख़िरी पन्नों में परिशिष्ट के रूप में कुछ दस्तावेजों को भी स्कैन कर लगाया गया है। कश्मीर की राजनीतिक स्थितियों पर अरुंधति लिखती रही हैं, पीयूडीआर की इस रिपोर्ट के मौके पर उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में जो भाषण दिया, पेश है उसका हिंदी तर्जुमा)

मैं ये कहना चाह रही हूं कि कश्मीर में सैनिकों द्वारा जो उत्पीड़न हो रहे हैं वो किसी सैनिक का निजी विचलन नहीं है बल्कि ये सांस्थानिक योजना है। .....अल्जीरिया जब फ्रांस का उपनिवेश था तो उस समय एक फ्रांसीसी सैनिक ने कहा कि ये मेरा काम है कि मैं अल्जीरिया में मानवाधिकार को तोड़ूं, यहां के लोगों को धमकाकर रखूं, लोगों को यातनाएं दूं। मुझे ऐसी ही पाठ पढ़ाई गई है! इसलिए मानवाधिकार हनन का मसला किसी का निजी मामला भर नहीं है, ये सांस्थानिक है और ऐसी स्थिति में इस तथ्य पर नज़र दौड़ाइए कि कैसे भारतीय सेना ये कहती है कि कश्मीर में वे सेना द्वारा हुए मानवाधिकार हनन की जांच खुद अपनी संस्था के मार्फ़त करवाएगी! इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए?
.....कश्मीर की हालत बेहद ख़स्ता है और इस लिहाज से पीयूडीआर ने जो काम किया है उसकी हमें ज़रूरत है। कश्मीर के बारे में लोगों के पास अब सूचनाएं आने लगी हैं। इसलिए कई दफ़ा सुधिजन ये कहने लग जाते हैं, अरे यार, क्या होगा इन आंकड़ों और बातों का, क्या फ़ायदा होने जा रहा? लेकिन ऐसे मुश्किल हालात में काम करने वालों को लगातार काम करते रहना चाहिए क्योंकि इन कामों के पुलिंदों में असर छुपा होता है।
मुझे नर्मदा घाटी की एक बात याद आ रही है: एक गांव में आदिवासी लोग अपने खेत में रोपनी कर रहे थे। वो गांव डूब क्षेत्र में आने वाला था, तो मैंने पूछा कि जब फ़सल डूबनी ही है तो वो क्यों रोपनी कर रहे हैं? गांव वालों ने जवाब दिया कि वो जानते हैं कि फ़सल डूब जाएगी, लेकिन वे और कर क्या सकते हैं। फ़सल रोपना उनका काम है और वो ऐसा करेंगे। इसलिए डुबोने वालों को अपना काम करने दीजिए, आप अपना काम करते रहिए।
बहरहाल, ये रिपोर्ट महज इन आंकड़ों की सूची और घटनाओं का संग्रहण नहीं है कि कितने लोग कश्मीर में मारे गए और कितनों को यातनाएं मिलीं, बल्कि ये हमारे सामने कहीं ज़्यादा गंभीर सवाल उछालती है। ये हमें बताती है कि वास्तव में सैन्य कब्जेदारी का नतीजा किस रूप में सामने आ रहा है। सैन्य अत्याचार की इन घटनाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसा नहीं है कि एक सेना का जवान आया और यातना बरसा गया, एक सेना का जवान आया और ख़ून बहा गया, वास्तव में ये सांस्थानिक मसला है। ये घटनाएं भटकाव या अपवाद को रेखांकित नहीं करतीं। उनको उन्हीं खातिर तैयार किया गया है और वे जो वहां कर रहे हैं वही उनका कर्तव्य है!
मैं कई बार कश्मीर गई हूं और मैंने देखा है वहां के लोगों की आंखों में क्या है? आफ़्सपा जैसे क़ानून के साए में जी रहे कश्मीर में अत्याचार के कैसे-कैसे वारदात अंजाम दिए जाते हैं ये इधर के लोगों की कल्पना से परे हैं। कश्मीर के (तकरीबन) किसी भी घर में चले जाइए वहां दस्तावेज़ों से भरा प्लास्टिक का थैला आपको मिल जाएगा। लोग आपको बताएंगे,- मैंने यहां एफआईआर किया, वहां अर्जी डाली, फिर ऊपर गया, अदालतों के चक्कर काटे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसी निराशा हर घर में पसरी मिलेगी। दस्तावेज़ों के पुलिंदों के बावज़ूद कुछ नहीं हो रहा! पूरी अवाम के साथ ये किस तरह का बरताव है?

...सवाल ये है कि हम इस रिपोर्ट का क्या करें, हमें कश्मीर के बारे में क्या करना चाहिए? चलिए एक सामान्य उदार भारतीय के लिए इसके मायने ढूंढते हैं। आप देखिए न, अन्ना हज़ारे के साथ और दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध में हुए आंदोलन में डूबते-उतराते लोग कहां खड़े हैं? कौन बोल रहा है कश्मीर पर? उनके पोजिशन और मुद्दे साफ़ हैं। कश्मीर से उनको क्या लेना-देना? लेकिन एक उदार राजनीति के व्यक्ति को भी इस मुद्दे पर साथ होना चाहिए। मैं तो कहूंगी कि राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए कि कश्मीर के मुद्दे उनके लिए क्यों महत्वपूर्ण है! मैं कारण बताती हूं। आज़ादी के 60 साल बाद तक पुलिस, भारतीय सेना, सीआरपीएफ़ और बीएसफ़ ने नागालैंड, मणिपुर और कश्मीर में कब्जेदारी की बदौलत जिस तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है और इस दौरान उन्होंने जो भूमिका निभाई है, उसने सांस्थानिक रूप ले लिया। राष्ट्रवादियों को बस मैं ये बताना चाहती हूं कि रक्षा बलों ने जो कसरत उन इलाकों में की है वे अब भारत की “मुख्यभूमि’ में उनका इस्तेमाल करने लग गई हैं। छत्तीसगढ़ में यही कार्रवाई हो रही है और धीरे-धीरे इसकी परास बढ़ती जा रही है.....
....रक्षा बलों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं पर तो सवाल भी नहीं उठते। बड़ी आबादी यातना देने वालों की पांत के साथ खुद को नत्थी पाती है, इस महसूसियत में एक तरह का वर्चस्व का पुट शामिल होता है, इसलिए ये मज़ा देता है। मुझे संसद भवन पर हुए हमले के तुरंत बाद हुए एक टीवी शो की याद आ रही है जो शायद सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित हुआ था, उसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कह रहे थे“हां, ये सच है कि अफ़जल गुरू को मैंने यातनाएं दी है, मैंने उसकी गुदा में पेट्रोल डाला है, मैंने उसको बेतरह पीटा है, लेकिन अफसोस उसने कुछ नहीं कबूला।” उस चर्चा में कई राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार और पत्रकार भी थे, शायद राजदीप सरदेसाई शो को एंकर कर रहे थे, लेकिन किसी ने पुलिस अधिकारी की आपकबूली पर एक वाक्य नहीं बोला। पुलिस अधिकारी ने दावा ठोका कि उसने राष्ट्रहित में ऐसा किया है।....इसलिए मेरा ये मानना है कि ये रिपोर्ट ऐसे कॉरपोरेट मीडिया के लिए नहीं है और न ही उन लोगों के लिए है जिन्हें ऐसी यातनाओं को देखने-सुनते में मज़ा हासिल होता है।

ये उन लोगों के लिए है जो वाकई इन यातनाओं को संदर्भ सहित जानने-समझने की चाह रखते हैं, जो ये समझना चाहते हैं कि बीते छह दशकों में कश्मीर में वाकई हुआ क्या है? बड़ी आबादी की राजनीति को खारिज करने से उपजे सवाल को लेकर कई लोग असहज और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ये ढोंग नहीं है, राजनीति है। मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि आज यदि एक कश्मीरी पंडित 200 लोगों का संदर्भ देकर एक किताब लिखता है तो लोग उसको हाथों-हाथ लेते हैं, कश्मीर का एक भयावह चेहरा लोगों के सामने नमूदार होने लगता है। लेकिन आज ही अगर आप हज़ारों पेज के दस्तावेज़ के साथ उसी कश्मीर पर सैंकड़ों पेज का किताब लिखेंगे तो लोग तवज्जो तक नहीं देंगे। यही राजनीति है। राजनीति यही है कि बहुसंख्य आबादी को क्या रास आ रहा है और लोग किस मुद्दे के साथ तादात्मय बना पा रहे हैं। लेकिन ऐसे काम लगातार होते रहना चाहिए, कश्मीर पर ये बढ़िया रिपोर्ट है, जिसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

Friday, January 04, 2013

बारा रबीअव्वल – गम या खुशी?



बर्रा सगीर (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश) मे हर साल 12 रबीअव्वल को बड़ी धूम-धाम से रसूल अकरम सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का यौम ए विलादत मनाया जाता हैं, जगह-जगह जुलूस निकलते हैं, गली-गली चरागा होता हैं, खाने-पकाने का भी खूब इन्तज़ाम होता हैं और ये सब एक जश्न की सूरत मे हर साल नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत बड़े ही एहतमाम के साथ करती हैं| और इस जश्न को ईद मिलादुन्नबी कहा जाता हैं|

इसमे कोई शक नही के ये तमाम काम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की अकीदत और मोहब्बत मे होते हैं लेकिन काबिले गौर बात ये हैं के हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के साथ किस तरह की मोहब्बत रखनी चाहिए और हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने इस बारे मे क्या हुक्म दिया हैं| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये हैं कि हम साल मे एक बार उनके विलादत का जश्न मना ले तो क्या हमने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत क हक अदा कर दिया या नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये के हम उनके लाये हुए इस दीन ए इस्लाम को अपनी ज़िन्दगी का आईना बना ले?

अगर हम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के विलादत के जश्न को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत का नाम दे तो ज़ाहिर और साबित तौर पर हम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा अरबाअ को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की इस अकीदत और मोहब्बत से बेगाना पायेगें क्योकि जश्न विलादत का ये एह्तमाम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा मे से किसी ने भी नही किया न किसी ने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के बाद इसका हुक्म दिया| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब उनके लाये हुये दीन की पैरवी करना हैं तो आज हम दीन ए इस्लाम से बेगाने हैं क्योकि दीन ए इस्लाम को सहाबा के बाद अगर किसी ने समझा हैं तो ताबाईन और तबाताबाईन हैं लिहाज़ा हम जिस काम को आज दीन समझ कर कर रहे हैं उसका दीन ए इस्लाम से कोई वास्ता नही और इस लिहाज़ से हम गुनाह की ज़द मे हैं|

कोई इन्सान नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत और दीन ए इस्लाम का हक तब तक नही अदा कर सकता जब तक वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के लाये इस दीन की पैरवी न करे और उसे अमली तौर पर न करे| जैसा के सहाबा, ताबाईन और तबाताबाईन ने किया तो फ़िर सोचने की बात ये हैं के क्या जश्न ए मिलादुन्नबी से हमारा कोई वस्ता हैं या नही?

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

दीन मे अपनी तरफ़ से इजाफ़ा मरदूद और नाकाबिले कबूल हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

मज़ीद फ़रमाया के –

दीन मे इज़ाफ़ाशुदा काम (बिदअत) मरदूद ही नही बल्कि गुमराही हैं जो जहन्नम मे ले जाने वाली हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

ईदमिलदुन्नबी मनाने से पहले ये तय करना ज़रूरी हैं नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत कब हुई? और आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने वफ़ात कब पाई क्योकि आज जिस तारिख पर ये जश्न होता हैं उसी दिन आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात भी हुई और विलादत भी हुई| लिहाज़ा आज मआशरे मे जिस दिन जश्न होता हैं वो विलादत और वफ़ात दोनो का ही दिन हैं|

इस बारे मे तमाम तारीख लिखने वालो और सीरत लिखने वालो का इस बारे मे इत्तेफ़ाक हैं के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पीर(सोमवार) को हुई| और बारे मे आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की एक हदीस मौजूद हैं|

हज़रत अबू कतादा रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से पीर(सोमवार) के बारे मे पूछा गया तो आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – ये वो दिन हैं जिस दिन मैं पैदा हुआ और इसी दिन मैं मबऊस हुआ या मुझ पर वह्यी नाज़िल की गयी| (मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि0 से रिवायत हैं के – नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम पीर(सोमवार) के दिन पैदा हुये और पीर(सोमवार) के दिन नबूअत का ऐलान किया| और पीर(सोमवार) के दिन ही वफ़ात पाई और पीर(सोमवार) के दिन नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम मक्का से मदीना की तरफ़ हिजरत के लिये रवाना हुये और पीर(सोमवार) के दिन ही मदीना पहुंचे और पीर(सोमवार) के दिन हुजरे असवद को उठाया| (हदायक अल नवार)

इन हदीसो की रोशनी मे साबित हैं की नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने पीर(सोमवार) के दिन विलादत पाई| अब रहा सवाल तारीख विलादत तो इस बारे मे खुद नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से तो कोई रिवायत नही अलबत्ता मशहूर मुफ़स्सिर और तारीखदान इब्ने कसीर रह0 ने अपनी तारिख अलबदायाह व अलनहायाह मे लिखा हैं के जमहूर अहले इल्म का इत्तेफ़ाक ये हैं आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम माहे रबीअव्वल मे पैदा हुये लेकिन ये के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस माह के अव्वल, आखीर या किस तारिख को पैदा हुये? इस बारे मे तारिखदान और सीरत निगारो के कयी अलग-अलग राय हैं किसी ने 2 रबीअव्वल, किसी ने 8 रबीअव्वल, किसी ने 10 रबीअव्वल, किसी ने 12 रबीअव्वल , किसी ने 17 रबीअव्वल और किसी ने 18 रबीअव्वल और किसी ने 22 रबीअव्वल कहा हैं और इनमे से दो राय सबसे ज़्यादा बाएतबार हैं एक 8 और दूसरी 12 की| इमाम हमीदी ने इब्ने हज़म से 8 रबीअव्वल ही नकल किया हैं और कयी दूसरे अईम्मा ने इसी बात की तायद की हैं| इमाम तिबरानी और इमाम इब्ने खलदून ने 12 रबीअव्वल की तायद की हैं| और इमाम इब्ने जोज़ी ने अल वफ़ाबा हवालल मुस्तफ़ा मे 10 रबीअव्वल की तायद की हैं| जबकि माज़ी के दो करीबी अज़ीम सीरत निगारो मे अल्लामा काज़ी सुलेमान मन्सूरपुरी ने अपनी किताब रहमतुल्लिल आलामीन मे और अल्लामा सिबली ने सिरतुन्नबी मे 9 रबीअव्वल (20 अप्रेल 571 ईसवी) को तहकीक जदीद सही तारीख करार दिया हैं|

तारीख विलादत और मज़ीद बहस का मौअज़ू हैं जिसमे अलग-अलग उल्मा, अईम्मा, और तारिखनिगारो के कौल मौजूद हैं| बहरहाल सही तारीख का किसी को अन्दाज़ा नही| हालाकि तारीख वफ़ात का दिन 12 रबीअव्वल ये बिल्कुल सही हैं जो बारावफ़ात के नाम से आज तक मौजूद हैं| तो वफ़ात रसूल पर ये खुशीया नही| यही वो तारिख हैं जिस रोज़ हज़रत फ़ातिमा रज़ि0 यतीम हुई| यही वो तारीख हैं जिस रोज़ उम्मुल मोमिनीन बेवा हुई| गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर आज किसी बेवा या यतीम के सामने उसके बाप या शौहर के मरने का जश्न मनाया जाये तो ये बात नाकाबिले बर्दाश्त कही जायेगी तो फ़िर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात पर जश्न क्यो?

दूसरे खुशी मनाने का ये अन्दाज़ जो माआशरे मे चला आ रहा हैं क्या वो सही हैं? क्या इसकी कोई गुन्जाइश भी दीन मे हैं? खुशी के मौके पर जुलूस निकालना, चिरागा करना, ढोल बजाना क्या दीन ए इस्लाम मे हैं क्या सहाबा ने किसी खुशी के मौके पर ये सब किया| यकीनन नही किया| जैसे के दीन ए इस्लाम मे दो ईद के मौके पर नमाज़ पढने और तकबीर व तहलीक ही का हुक्म दिया तो ईद मिलादुन्नबी के मौके पर ये सब खुराफ़ात कैसे की जा रही हैं| जैसा के तमाम दुनिया मे 25 दिसम्बर को ईसा अलै0 की विलादत का जश्न मनाया जाता हैं और खुराफ़ात होती हैं जैसे नाच-गाना, शराबनोशी वगैराह ठीक उसी तरह हम उनकी मुशाबहत करते हैं और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत का जश्न मनाते हैं हालाकि ना ईसाईयो को अल्लाह ने ईसा अलै0 की विलादत मनाने का हुक्म दिया ना ही उनकी किताब इन्जील मे इस बारे मे कही हुक्म हैं| लिहाज़ा हम उनकी नकल करते हैं और किसी कौम की मुशाबहत करने के बारे मे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

जिसने किसी कौम की मुशाबहत इख्तयार करी वो इन्ही मे से समझा जायेगा| (अबू दाऊद)

बहरहाल जिस एतबार से भी देखा जाये जश्न मिलादुन्नबी की कोई शरयी हैसियत नही| ये मोहब्बत रसूल के नाम पर एक खोखला अकीदा हैं क्योकि मुसल्मानो के लिये यौमे विलादत से ज़्यादा अहम रिसालत हैं जिसके तहत अल्लाह ने इन्सान को अंधेरे से निकाल कर उजियाले की राह दिखाई| यौमे रिसालत से ही इन्सान को तौहीद मिली जिससे इन्सान को अपनी दुनिया और आखिरत की ज़िन्दगी सुधारने का मौका मिला|

अगर यौम ए विलादत को किसी मुसलमान को खुशी हैं तो यकीनन हर मुसल्मान को ये खुशी होनी चाहिए| लिहाज़ा मसला खुशी का नही बल्कि इज़हारे खुशी का हैं जिसकी बुनियाद पर मुसलमानो मे एक बिदाआत का रिवाज हैं| क्या इस बेबुनियाद इज़हारे खुशी को करके ही ये साबित होता हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत हैं जबकि सहाबा रज़ि0 ने अगर इसको नही किया तो नाऊज़ोबिल्लाह वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत नही करते थे और उनसे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की शान मे ये अमल छूट गया|

जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत करने वाली असल जमात सिर्फ़ और सिर्फ़ सहाबा रज़ि0 की थी जिन्होने अपने अमल और किरदार से नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत को साबित किया और इस उम्मत मुस्लिमा के लिये एक सबक दिया| आज मुसल्मान इस काम को जिस तरह कर रहा हैं नाऊज़ोबिल्लाह क्या अल्लाह ने अपने दीन को मुकम्मल नही किया जो आज लोग ये ईदमिलादुन्नबी मनाकर इसे पूरा कर रहे हैं| जबकि अल्लाह फ़रमाता हैं –

आज मैने दीन को तुम्हारे लिये मुकम्मल कर दिया| ( सूरह माईदा सूरह नं0 5 आयत नं0 3)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया –

हज़रत अबदुल्लाह बिन उमर रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – अल्लाह ने कोई नबी नही मबऊस फ़रमाया, मगर इसका ये फ़रीज़ा था के वो अपनी उम्मत को हर वो खैर का काम बताये जो अल्लाह ने इसे सिखाया था, और उम्मत को हर वो शर से डराये जो अल्लाह ने इसको तालिम दी थी| (मुस्लिम)

क्या अल्लाह के इस हुक्म और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस फ़रमान को पढने के बाद भी कोई ये कहेगा के दीन आज ईदमिलादुन्नबी मना कर पूरा हो रहा हैं| वो भी उस वक्त जब उसे खुद उसके पास इस बात का सबूत न हो के विलादत की असल तारिख क्या हैं जैसा के उपर गुज़रा के 12 रबीअव्वल वफ़ात नबी की तारीख हैं तो मुसलमान आज वफ़ात पर खुशी मनाते हैं|

आज नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पर जश्न मनाने वाले एक तरफ़ तो तमाम नबी और बुज़ुर्गो को एक तरफ़ तो जिन्दा तसलीम करते हैं दूसरी तरफ़ अगर सचमुच नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम जिन्दा हैं तो सहाबा से नबी की शान मे एक अमल छूट गया| जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने 23 साल अपनी दावत तब्लीग जारी रखी उस लिहाज़ से सहाबा को 23 बार ये मौका मिला बावजूद इसके उन्होने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मौजूदगी मे ये जश्ने विलादत क्यो न मनाया| नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इरशाद हैं-

तमाम ज़मानो मे बेहतरीन ज़माना मेरा ज़माना हैं, फ़िर इन लोगो क जो इसके बाद वाले हैं और फ़िर इन लोगो क जो इन के बाद वाले हैं| (मुस्लिम)

इस हदीस से ये साबित होता हैं के नबी के बाद सहाबा का और सहाबा के बाद ताबाईन का ज़माना बेहतर हैं लिहाज़ा 12 रबीअव्वल को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का जश्न विलादत इन तीन ज़मानो मे से किसी भी एक आदमी से भी साबित हैं लिहाज़ा अगर आज मुसलमान इस अमल को नबी की विलादत का जश्न समझ कर रहा हैं तो यकीनन गुमराही मे हैं|

जश्ने विलादत को लेकर एक और बातिल अकायद हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस महफ़िल मे हाज़िर होते हैं और इसीलिये लोग नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस्तक्बाल मे खड़े हो जाते और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम को सलाम व खुशामदीन और मरहबा कहते हैं| ये एक ऐसा बातिल और जिहालत भरा अकीदा हैं क्योकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मुबारक से कयामत से पहले नही निकलेगें और न किसी इन्सान से मिलेगें और न किसी मजलिस मे हाज़िर होगें बल्कि आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मे कयामत कायम होने तक मुकिम रहेगें| जैसा के अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं-

इसके बाद फ़िर तुम सब यकिनन मर जाने वाअले हो, फ़िर कयामत के दिन बिलाशुबहा तुम सब उठाये जाओगे| (सूरह मोमिनून सूरह नं0 23 आयत नं0 15-16)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इर्शाद हैं –

कयामत के दिन सबसे पहले मैं कब्र से उठूगां, और मैं ही सबसे पहले शफ़ाअत करूगां और सबसे पहले मेरी ही शफ़ाअत कुबूल होगी| (मुस्लिम)

कुरान और हदीस की रोशनी मे ये पता चलता हैं की तमाम इन्सान और अंबिया सिर्फ़ कयामत के रोज़ ही उठेगें उससे पहले नही| और इस बारे मे तमाम उल्मा का इजमा हैं और इस बारे मे कोई इख्तलाफ़ नही|

गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर विलादत नबवी जश्न का मसला अगर अल्लाह और उसके रसूल के नज़दीक पंसदीदा अमल होता तो वो शरियत बन जाती जबकी ऐसा नही हैं क्योकि जश्न मिलादुन्नबी किसी एक सहाबा या ताबाईन से साबित ही नही और जो चीज़ नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम या सहाबा या खुल्फ़ाए राशीदीन या ताबाईन से साबित नही उसकी कोई शरई हैसियत नही बल्कि वो बिदात हैं|