Wednesday, February 10, 2016

संघ के हाथों में "कौम के मीरजाफर"

 व्यापारिक कारणों से मैं पिछले 4-5 दिन टूर पर था और जो ढाबे और चाय की दुकानों पर रुक रुक कर लोगों से चर्चा की और 2014 से अब तक हुए परिवर्तन का लोगों की दृष्टि से आकलन किया वह "केन्द्र सरकार" के लिए बेहद निराशाजनक है । मात्र 20 महीने में लोग इस सरकार और इसके शातिर मुखिया को भद्दी-भद्दी गालियाँ देने लगे हैं ।
मऊ-गाजीपुर रोड पर "बिरनो थाने" के समीप एक "शुद्ध शाकाहारी भोजनालय" में एक सज्जन मिले जो पहनावे और बोलचाल से ब्राह्मण दिख रहे थे और लगातार राजनैतिक टिप्पणी करते जा रहे थे । अपनी पहचान छुपाते हुए मैने उनको छेड़ा कि "काहो पंडित जी मोदी को हमनन के बड़ा उम्मीद से वोट देहले रहलीं पर इ ता सबहन से निकम्मा निकल गईल" पंडित जी जो संभवतः उस भोजनालय के मालिक थे फटाक से बोले "सच त इ बा कि हमार भोट मोदी के ई उम्मीद से गइल रहल कि जैसन गुजरात में मोदी मियवन के बर्बाद कइले रहलन वइसे पूरे देश में करिहन अउर सैकड़ों सालन पहले हमरे पुरखन पर मियवन के किये अत्याचार का बदला लैहन, पर प्रधानमंत्री बनले के बाद अब हमार जइसन संघ के लोगन की उम्मीद टूट गईल इनसे" ।

कहने का अर्थ यह है कि जब मेरे जैसा एक सामान्य सा व्यक्ति चलते-चलते चार जगह रुक कर किसी विषय पर जनमानस टटोल सकता है तो "केन्द्र सरकार" जिसके पास तमाम खूफिया और सर्वे एजेंसियों का विकल्प है वह कितनी गहन सूचनाओं को प्राप्त करती होगी यह समझा जा सकता है। सच यह है कि कोई प्रदर्शित करे या ना करे पर मोदी के कट्टर समर्थक भी इस सरकार से निराश हो चुके हैं और उनकी उम्मीदें टूट चुकी हैं,  हालाँकि झेंप और शर्म के कारण वह स्विकार नहीं कर रहे हैं। अपने कट्टर समर्थकों के मुस्लिम विरोध की उम्मीदों को तोड़ती यह सरकार स्वतंत्र भारत की सबसे निकम्मी और विफल सरकार होने जा रही है जिसे छुपाने के लिए पिछली सरकारों की उपलब्धियों की क्रेडिट खुद लेकर उसे प्रचारित कर रही है।

अपने राजनैतिक लाभ और कुर्सी बचाने के लिए "गोधरा" के मृतक कारसेवकों के 59 शवों को अहमदाबाद की एक एक गली में एक एक शव को लेकर शवयात्रा निकलवाने वाले नरेंद्र मोदी को शवों को देखकर ही प्रसन्नता होती है यह 2002 में ही दिख गया था अन्यथा अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय सुनिश्चित थी । 59 शवों में से एक एक शव को अलग अलग क्षेत्रों घुमा कर उत्तेजना फैलाई गयी और फिर दंगा भड़काया गया,  उसके बाद का इतिहास दुनिया के सामने है । तब यही नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी वहाँ थी,  जिस तरह गोधरा जैसी अपराधिक घटना का लाभ सुनियोजित तरीके से मोदी ने लिया उससे मेरा निश्चित मत है कि "गोधरा कांड" भी इनके अपराधिक सोच का ही परिणाम था ।

2002 के पूर्व के गुजरात सरकार जैसी स्थिति में ही लगभग अब केन्द्र की सरकार है और मेरा विश्वास है कि माँ से लेकर अस्पताल में सैनिक तक को कैमरा लेकर मिलने जाने वाले नरेंद्र मोदी इस सरकार की विफलता से ध्यान हटाने के लिए "गोधरा कांड" जैसी घटना को फिर से अंजाम दे सकते हैं। पर इस बार उनकी चाल और शातिराना है और मुसलमानों को इससे सचेत रहने की आवश्यकता है ।

दरअसल इसकी पटकथा केन्द्र सरकार के 2014 में बनने के बाद ही शुरू हो गयी और संघ का मुस्लिम-प्रेम उफान मारने का ढोंग करने लगा,  इसी ढोंग के कारण अपंजीकृत गिरोह ने एक अपंजीकृत विंग "राष्ट्रीय मुस्लिम मंच" की स्थापना मालेगाँव और अजमेर बम विस्फोट के मुख्य आरोपी इंद्रेश कुमार के नेतृत्व में की जिसका काम है मुसलमानों कि 25 करोड़ आबादी से कुछ 50-100 मीरजाफरों को ढूँढना और उनका प्रयोग मुसलमानों को आपस में बाँटने के लिए करना । पूर्व में अफ्तार पार्टी के आयोजन की तीखी आलोचना करने वाला गिरोह इसी साजिश के तहत इस साल अफ्तार पार्टी आयोजित करके इन "मीर जाफरों" को बढ़ावा देता दिखा,  भाँड मीडिया, संघ और मोदी की इस साजिश में पूरे ज़ोर शोर से लगा हुआ है और विदेशी "तारेक फतेह" जैसे मीर जाफर को लगातार अपने पैनल में बुलाकर मुसलमानों को बाँटने और उस खाई को चौड़ी करने में संघ की साजिश को अंजाम दे रहा है।

13 नवंबर 2015 को "वेम्बले स्टेडियम" इंग्लैंड में यदि किसी को नरेंद्र मोदी का भाषण याद हो तो वह अंदाजा लगाले कि मुसलमानों को आपस में बाँटने की इसी साजिश को कैसे उन्होंने अपने भाषण में अंजाम दिया और जबकि पूरी दुनिया में उनका भाषण प्रसारित हो रहा था तब वह मुसलमानों के एक फिरके की तारीफ पर तारीफ करके अपनी शातिर कार्य योजना पर अमल कर रहे थे । क्या यह बेहतर नहीं होता कि वह वहाँ से आपनी सरकार बनने के बाद भारत में दलितों पर लगातार बढ़ रहे अत्याचार, किसानों की लगातार हो रही आत्महत्याएँ और यदि मुसलमानों से इतनी हमदर्दी ही थी तो कुछ दिन पहले ही हुई "दादरी कलंक" पर कुछ बोल देते, पर अपनी सरकार के मुँह पर कालिख पोतने का ऐसा कार्य एक अपराधिक सोच का व्यक्ति करेगा ऐसा सोचना मुर्खता ही होगी।
उस स्टेडियम में अपने 90 मिनट के संबोधन का उपयोग उन्होंने मुसलमानों के बीच मौजूद फिरके को बढ़ाने के लिए किया और यही उनकी और उनके नाजायज़ माँ-बाप संघ की साजिश है।

मुसलमानों होशियार हो जाओ , क्युँकि यह शातिर अपराधी अपने मीरजाफरों से किसी फिरके के मुसलमानों के साथ "गोधरा" जैसा कारनामा कराकर इस देश के मुसलमानों को आपस में लड़ा सकता है जैसे पाकिस्तान,  इराक,  सीरिया इत्यादि में हो रहा है ।
यह कड़वा सच है कि मुसलमान फिरके में बँटा हुआ है पर यदि भारत के संदर्भ में देखें तो यह केवल धर्म-कर्म तक ही अभी तक सीमित है, सामाजिक रूप से आपस का तानाबाना आपस में कुछ हद तक बेहद मजबूत है। परन्तु जिस तरह की समझदारी मुसलमानों ने दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव तथा देश के अन्य सभी पंचायतों, निकायों और जिला पंचायतों के चुनाव में दिखा कर भाजपा का सूपड़ा साफ कर दिया उससे चिंतित संघ अब मुसलमानों को व्यवहारिक रूप से बाँटने और फिरके की उस लकीर को और चौड़ी खाई में परिवर्तित करने की साजिश में लग गया है।

सतर्क रहिए और "मीर जाफरों" के फिरकेवाराना बयानों पर आपा मत खोईये क्युँकि यह "क्रिमिनल माइंड" के प्रधानमंत्री और उनके नाजायज़ अम्मा-अब्बा किसी भी तरह सत्ता पाने की अपनी नीति के तहत मुसलमानों का "गोधरा" बनाकर गुजरात की तरह 15 वर्ष या उससे अधिक वर्ष तक सत्ता पाना चाहते हैं । सावधान रहिए,  सतर्क रहिए,  और सब्र रखिए क्युँकि "मीरजाफरों" द्वारा दिल्ली जैसे फिरकेवाराना भड़काऊ बयान अब लगातार आएंगे,  तारेक फतेह जैसे मीरजाफर टुकड़े की लालच में आकर तलवे चाटेंगे और फिर दुम नीची करके भाग जाएंगे ।

साजिश को अमलीजामा पहनाने की नीति पर अमल हो चुका है और इसका पहला परिक्षण "आसाम" और "पश्चिम बंगाल" चुनाव में होगा जहाँ पर भाजपा का मटियामेट करने के लिए जनता चुनाव का इंतजार कर रही है ।

अपील :- मुस्लिम मित्रों से अपील है कि किसी भी फिरकेवाराना पोस्ट से बचें और किसी ऐसी पोस्ट का स्क्रीनशाट पोस्ट करके उस फेक आइडी के मकसद को कामयाब ना बनाएँ जो संघ साइबर सेल द्वारा बनाई गई है ।

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Friday, February 05, 2016

गंगाजल, साधू यादव, लोकतंत्र की हत्या, संघ व उच्चतम न्यायालय का मूकदर्शक बना रहना

फिल्म "गंगाजल" में तेजपुर के एसपी अमित कुमार अपने इंस्पेक्टर बच्चा यादव से तमाम केस को दिखाते हुए कहते हैं कि "यह ऐसे तमाम केस जो तुम्हें दिये गये तुमने अपनी इमानदारी और दिन रात की मेहनत और लगन से काम करके इन पर फाइनल रिपोर्ट लगाई और मुजरिमों को अदालत से सज़ा दिलवाई पर जैसे ही "साधू यादव" से संबंधित इन फाईलों की ओर मैं देखता हूँ तो सोचता हूँ कि तुम्हारी इमानदारी और मेहनत को क्या हो जाता है"।

यही सवाल कल मेरे दिमाग में तब गूँजा जब उच्चतम न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध सुनवाई पर टिप्पणी करते हुए कही कि "लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकते" उच्चतम न्यायालय का यह व्यवहार बिल्कुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह था। क्युँकि जब मुसलमानों से संबंधित विषयों पर इसी तरह "लोकतंत्र की हत्या" होती है तो उच्चतम न्यायालय "मूक दर्शक" बन कर सदैव रहा है । आजादी से आजतक कोई एक मामले पर ऐसा फैसला जो देश के मुसलमानों के हक में उच्चतम न्यायालय ने दिया हो मुझे याद नहीं आता, फैसला तो छोड़िए एक टिप्पणी भी हक में आई हो मुझे याद नहीं पड़ती ।

इसी उच्चतम न्यायालय ने "बाबरी मस्जिद" के मामले में यथास्थिति रखने के अपने आदेश, 6 दिसम्बर के पूर्व बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए कल्याण सिंह से लिए "शपथपत्र", संसद को विश्वास में लेने कि "बाबरी मस्जिद" की सुरक्षा की जाएगी, जैसे तमाम संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रयासों को ध्वस्त करते हुए "बाबरी मस्जिद" उसी कल्याण सिंह ने ध्वस्त करा दी और लोकतंत्र की हत्या कर दी तब "उच्चतम न्यायालय" अपने ही आदेश की अवमानना पर "मूकदर्शक" बना रहा और बहुत किया तो लोकतंत्र के उस हत्यारे को मात्र "24 घंटे" की पिकनिक मनाने के लिए जेल भेजती है जो 6 दिसम्बर की घटना पर गर्व करता रहा है बार बार करता रहा है। 

गर्व किस बात का ? उच्चतम न्यायालय के आदेश, शपथपत्र, संसद और संविधान की हत्या पर गर्व, और उच्चतम न्यायालय मूक दर्शक बनकर बैठा रहता है, बिलकुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह जो साधू यादव और उसके पुत्र से संबंधित अपराधों पर चुप्पी साध लेता है ।

मुसलमानों से संबंधित तमाम विषयों पर तमाम न्यायिक जाँच आयोग भारत की ही सरकारों ने बनाए जिसके मुखिया मुसलमान नहीं थे, जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग, जस्टिस सच्चर आयोग, जस्टिस  काटजू आयोग, जस्टिस श्रीकृष्णा आयोग तथा जस्टिस लिब्राहन आयोग इत्यादि इत्यादि आयोग जो कि मुसलमानों से संबंधित मामले और उनके हक, बर्बादी, तबाही, खूनखराबे तथा हक माँगते इन आयोग की रिपोर्ट की वही सरकारें चिता जला देती हैं जिनका उन्होंने ही गठन किया होता है पर उच्चतम न्यायालय सरकार से यह नहीं पूछती कि जब कार्यवाही करना नहीं तो ऐसे ईमानदार पूर्व न्यायाधीशों को आयोग का प्रमुख बनाकर उनका अपमान क्यों किया जाता है ? 
परन्तु यही उच्चतम न्यायालय क्रिकेट के सुधार के लिए बनी जस्टिस लोढ़ा कमेटी की आज से एक महीने पहले आई रिपोर्ट को लागू करने के लिए आदेश पर आदेश सुनाती है तो हैरानी होती है कि उपरोक्त आयोग की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को क्यूँ नहीं दिखते ? या देख कर भी उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनी रहती है ?

लिब्राहन आयोग ने अपनी जाँच में 68 लोगों को दोषी पाया जिन्होंने "बाबरी मस्जिद" को ध्वस्त करने की साजिश रची और ध्वस्त करके "लोकतंत्र" की हत्या की परन्तु 24 वर्ष बाद भी यही उच्चतम न्यायालय "बच्चा यादव" की तरह मूक दर्शक आजतक बना हुआ है जबकि उन 68 दोषियों में कितने तो बिना सज़ा पाए तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ दुनिया से विदा हो गये और उनकी मृत्यु पर "राजकीय शोक" तक मनाया गया ।

क्यों "मूकदर्शक" बन जाती है "उच्चतम न्यायालय" गुजरात के 3000 बेगुनाह लोगों की हत्या पर और उस समय के राज्य के मुखिया जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी और 3000 हत्याएँ बताती हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी में विफल हुए, उनके अनेकों अनेक अप्रत्यक्ष और सांकेतिक बयान बताते हैं कि 3000 हत्याएँ उनके ही अप्रत्यक्ष आदेश पर हुईं, तो क्यों "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनकर "क्लीनचिट" पर "क्लीनचिट" देता चला जाता है ? राज्य के मुखिया के रूप में क्या वह इन हत्याओं के जिम्मेदार नहीं ?

गर्भवती महिलाओं के पेट चीरकर अजन्मे शिशु निकाल लिए जाते हैं, उस शिशु को त्रिशूल में गोद कर झंडे की तरह लहराया जाता है तो उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनकर चुप अजन्मे रहा ? गोधरा कांड हो या गुजरात दंगे के लगभग सभी सजायाफ्ता मुजरिमों को जिनको फाँसी पर लटका कर एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए था उनमें गुजरात दंगों के लगभग सभी दोषी "माया कोडनानी तथा बाबू बजरंगी" समेत सबके सब किसी ना किसी आधार पर बाहर घूम रहे हैं, क्यों ? 
और गोधरा के दोषी ऐसी ही घटनाओं के कारण जेल में सड़ रहे हैं क्यों ? उच्चतम न्यायालय क्यों "मूकदर्शक" बनकर बैठ जाती है ? 

हाशिमपुरा में 40 मुसलमानों को पीएसी के जवान भूनकर नहर में फेक देते हैं और लगभग 30 वर्ष मुकदमा चलने के बाद उनको बाईज्जत बरी कर दिया जाता है, हाशिमपुरा हत्याकांड की फाईलों को गायब कर दिया जाता है और "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनी रहती है तो यह भी सवाल नहीं करती कि यदि आरोपी निर्दोष हैं तो 40 लोगों की हत्या करने वाले कौन थे कहाँ हैं ?

कभी "सिमी" तो कभी "इंडियन मुजाहिदीन" जैसे छद्म संगठन जिसका कोई आस्तित्व ही नहीं तो कभी अलकायदा और अब "आइएस" के नाम पर सरकार जब चाहे मुसलमानों को उठाकर आतंकवादी बता देती है और जेलों में ठूसकर देश को अपनी चाकचौबंद व्यवस्था होने का एहसास दिलाती है, 10-10 वर्ष 15-15 वर्ष बाद यह जेल में ज़िन्दगी बर्बाद करके यही "सिमी" "इंडियन मुजाहिदीन" "अलकायदा" और अब "आइएस" के आतंकवादी बिना सबूतों के आधार पर बाईज्जत रिहा हो जाते हैं तो भी "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बन कर बैठी रहती है और एक सवाल नहीं पूछती कि सबके सब आतंकवादियों के विरुद्ध सबूत क्यों नहीं हैं और सबूत नहीं है तो किस आधार पर 10-15 वर्ष जेलों में बंद किये जाते रहे हैं, किस आधार पर उनपर आतंकवादी का टैग गिरफ्तार करते ही लगा दिया जाता है।

महाराष्ट्र के हेमंत करकरे ने संघ के लोगों को 12 आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के सबूत इकट्ठा करके लोगों को गिरफ्तार किया और "सिमी" पर ऐसे ही आरोपों से प्रतिबंध तो लग गया पर "संघ" देश पर शासन कर रहा है और उच्चतम न्यायालय उसी इंस्पेक्टर "बच्चा यादव" की तरह चुप है तो क्यों चुप है ? उच्चतम न्यायालय तो इस देश के लोकतंत्र और न्याय का प्रहरी है ? तो देश के एक वर्ग के साथ ही होता अन्याय उस प्रहरी को क्यों नहीं दिखता ? और दिखता है तो देखकर भी "मूकदर्शक" क्यों बना बैठा रहता है ? बच्चा यादव की तरह।

उसी "गंगाजल" फिल्म में आगे इंस्पेक्टर बच्चा यादव "साधू यादव" के विरुद्ध कार्यवाही करता है तो उसकी आँख फोड़कर हत्या कर दी जाती है । कहीं उच्चतम न्यायालय को यही डर तो नहीं ? जो साधू यादव ( संघ ) के विरुद्ध कार्यवाही से रोक तो नहीं रहा ? कहीं साधू यादव का डर उच्चतम न्यायालय को मुसलमानों से संबंधित मामलों में मूकदर्शक बनने को बाध्य तो नहीं कर रहा है ? या उच्चतम न्यायालय में सब साधु यादव के लोग ही बैठे हैं ?