Thursday, December 02, 2010

आजादी ! आजादी ! आजादी ! और जम्मू-कश्मीर

जम्मू एंड कश्मीर हालात पिछले कुछ दिनों से अत्यधिक बिगड़े हुए हैं। जिसका राजनीतिक समाधान होना अतिआवश्यक है। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से एक नेता ने कहा कि हमको आजादी चाहिए। यह बात पिछले कुछ वर्षों में साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा इस प्रदेश की जनता में कूट-कूट कर भरा गया है लेकिन ऐसे तत्वों के साथ सामान्य जन नहीं है। हमारी व्यवस्था की असफलताएं ऐसे तत्वों को पल्लवित होने में मदद करती हैं। इन अलगावादी तत्वों से यह पूछने की आवश्यकता है कि वह किसके गुलाम हैं जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ था और उसके बाद पकिस्तान पूरी तरह से अमेरिकन साम्राज्यवादियो के साथ रहा और आज उसकी राजनीतिक, आर्थिक स्तिथि अत्यधिक ख़राब है। जम्मू एंड कश्मीर का भी अर्थ तंत्र काफी अच्छा नहीं है। काफी हिस्सा बर्फीला होने के कारण रोजगार के अवसर कम हैं। पर्यटन से ही मुख्य आय होती है जो सीमा पार की गतिविधियों से कम होती जा रही है। दूसरी तरफ गुलाम कश्मीर जिसके हालात जम्मू एंड कश्मीर से भी बदतर हैं।

अमेरिकन साम्राज्यवाद का पुराना सपना है कि जम्मू एंड कश्मीर को भारत और पकिस्तान से अलग कर वहां पर सैनिक समुच्चय स्थापित करने का किन्तु उसका सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। भारतीय नागरिको की उदारतावादी नीति के कारण कश्मीर के उच्च इलाकों पर अमेरिकन सैनिको की तैनाती से वह भारत, चाइना सहित कई मुल्कों के ऊपर अपना अघोषित नियंत्रण कर सकता है। आज जब भारत की विदेश नीति से लेकर सभी नीतियों में परिवर्तन हुए हैं तो उसका लाभ साम्राज्यवादी शक्तियों को भी हो रहा है जिसका प्रतिबिम्ब मुख्य रूप से जम्मू एंड कश्मीर में दिखाई देता है।

जरूरत इस बात की है कि यह एक राजनीतिक समस्या है वहां की जनता से सद्भावपूर्ण तरीके से एक अच्छी व्यवस्था देकर संवाद कायम करने की है। संवाद से ही अच्छा रास्ता निकलेगा। सेना, कर्फ्यू, फायरिंग कोई विकल्प नहीं होते हैं। इससे कुछ समय के लिए शांति तो कायम की जा सकती है लेकिन स्थायी शांति नहीं।

साम्राज्यवादी शक्तियों के भारतीय सन्देश वाहक इस समस्या को हिन्दू और मुसलमान के चश्मे से ही देखते हैं और उनको देखना भी चाहिए पहले वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए हिन्दू और मुसलमान, हिंदी और उर्दू का विवाद उठाते रहे हैं और आज भी वह कश्मीर के सवाल को साम्राज्यवादी शक्तियों को फ्रायदा देने के लिए तरह-तरह के राग अलाप रहे हैं। मैं नहीं समझता कि संविधान के अनुच्छेद 370 के प्राविधानो से भारतीय संघ के अन्य नागरिको का कोई नुकसान होता है।




-लोकसंघर्ष !

No comments:

Post a Comment