Sunday, July 22, 2012

मैं जेल से लिंगा कोडोपी बोल रहा हूँ



तुमने मुझे धकेल दिया जेल की कोठरी के अँधेरे में,
क्योंकि राष्ट्रपति भवन के,
विशालकाय गणतंत्र के गुम्बद पर
चमचमाता हुआ प्रकाश पुंज,
मेरी ही जमीन छीनकर बनाये गये,
बिजलीघर में तैयार बिजली से दमदमाता है ,

मेरी आजादी को खतरा बताया गया,
गणतन्त्र के उस विशालकाय गुम्बद के
बल्ब की रौशनी के लिये,
पुलिस की कितनी लाठियां टूटी मुझपर,
अब याद नहीं,

मार खाते हुए रोने का विकल्प नहीं था मेरे सामने ,
क्योंकि मेरी आँखों के आंसू
ताड़मेटला गाँव में थाने से बलात्कार होकर लौटी
लड़की की कहानी सुनने के बाद,
बहकर समाप्त हो चुके थे,
सिर्फ खून उतर आया था मेरी आँखों में पुलिस से पिटते समय,

लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा के लिये ,
सभ्य लोगों को जरूरी लगता है ,
हमे लगातार हमारी हैसियत का
अहसास कराते जाना,
और हमारी औरतों के शरीर में ,
तुम्हारे राष्ट्र का पौरुष,
और कंकड,पत्थर भर दिये जाना ,
उस रात तुमने मेरी बुआ सोनी सोरी को नहीं
अपने लोकतन्त्र को नंगा किया था थाने में,

मैं लडूंगा, क्योंकि न लड़ने का विकल्प तुमने छीन लिया मुझसे,
मैं मरूँगा नहीं,
क्योंकि मुझे शपथ लगी है उन सबकी,
जिनकी इज्जत लूटी, जिनके घर जले ,
जिनके बच्चे मरे और वो रो न सके ,
हाथ मेरे अब जुडेंगे नही ,
गर्दन मेरी अब झुकेंगी नही,
जंग मेरी अब रुकेगी नहीं ,
मैं मरूँगा नहीं, लडूंगा मैं अब ,
हर पेंड़ की छाँव में, हर पहाड़ी पर
जंगल के हर मोड पर ,
तुम मुझे ही पाओगे,

तुम्हारी हर लाठी,
तुम्हारे लोकतन्त्र पर ही चली है ,
तुम्हारी हर गोली ने तुम्हारी ही संस्कृति को मारा है,
तुम्हारी हर जेल में तुम्हारा ही लोकतन्त्र कैद है ,
मैं ना पिटा हूँ, ना मरा हूँ और न कैदी ही हूँ,
मेरी बुआ की कोख से निकले पत्थर के नीचे,
दब गया है तुम्हारा गणतन्त्र, संविधान और लोकतन्त्र,
मेरी बुआ रोज पीटती है तुम्हें, सुबह से शाम तक,
देखो कितने अपमानित, पीड़ित और बेचारे दिख रहे हो तुम सब,
मैं और मेरी बुआ जेल से खिल्ली उड़ा रहे हैं तुम्हारी,

तुम हांफ रहे हो,
दम घुट रहा है तुम्हारे नकली लोकतन्त्र का,
मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं,
मैंने तुम्हारे ढोंग के मुखौटों को,
मक्कारी और शराफत की
नकाब को फाडकर फेंक दिया है और
तुम्हारा राष्ट्र, संस्कृति और लोकतन्त्र नंगा हो चुका है,
ताड़मेटला की उस बलात्कृत लड़की के सामने,

देखो मेरी आँखों में झांककर देखो
तुम्हें मेरी आँखों में गुस्सा और
मुझे तुम्हारी आँखों में घबराहट और
डर दिखाई दे रहा है,

Wednesday, July 18, 2012

लड़कियों के लिए क्यों तंग कर दीगई है जमीन?



जब अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था, तब एक वीडियो फुटेज बार-बार दिखाया जाता था, जिसमें तालिबान कुछ महिलाओं को उनके ‘कथित’ जुर्म की सजा सरेआम छड़ी से पीटकर दे रहे थे। तालिबान की उस हरकत की जबरदस्त आलोचना की गई थी। गुवाहटी के जो वीडियो फुटेज हैं, वे उन फुटेज के सामने ज्यादा अमानवीय हैं। इसकी वजह यह है कि तालिबानी निरंकुश शासक थे। उनका विरोध नामुमकिन न सही, मुश्किल जरूर था। हम उन्हें लगभग असभ्य की श्रेणी में रखते थे। आज भी रखते हैं। हम लोकतांत्रिक और सभ्य देश होने का दावा करते हैं। यहां आम नागरिक भी किसी पर ज्यादती होने पर हस्तक्षेप का हक रखता है। गुवाहटी में एक मासूम लड़की पर हो रही ज्यादती रोकने में किसी नागरिक ने अपने इस हक का इस्तेमाल नहीं किया। वह भी तब, जब लड़की के साथ ज्यादती करने वाले ‘तालिबानी’ नहीं थे। तालिबानी तो वे लोग बन गए थे, जो एक लड़की का ‘चीरहरण’ होता देखकर चुप रहे।
कुछ साल पहले नए साल के अवसर पर बंगलूरू के एक पब में घुसकर कुछ लड़कियों को इसलिए पीटा गया था, क्योंकि एक धार्मिक संगठन की नजर में वे भारतीय संस्कृति को कलंकित कर रही थीं। हालांकि वह खुद लड़कियों को सरेआम पीटकर भारतीय संस्कृति के मुंह पर तमाचा मार रहे थे। उनसे तब भी सवाल किया गया था कि महिलाओं को पीटना कौन-सी भारतीय संस्कृति है? इसी बीती 31 दिसंबर को जब पूरा देश नए साल का जश्न मना रहा था, तो गुड़गांव की एक पॉश कही जाने वाली जगह पर एक लड़की के साथ 20 से ज्यादा लोगों ने इसी तरह की वहशियाना हरकत की थी, जैसी गुवाहाटी में की गई है। तब भी उस लड़की को बचाने में समाज सामने नहीं आया था। दिल्ली में कारों में गैंग रेप की घटनाएं लगातार हो रही हैं। गुवाहाटी की घटना पिछली घटनाओं का ‘एक्शन रिप्ले’ भर है। एक मासूम लड़की को भीड़ के सामने 15-20 लड़के नोंचते-खसोटते हैं। भीड़ तमाशा देखती रहती है। वह मदद के लिए चिल्लाती है, लेकिन कोई हाथ मदद के लिए नहीं बढ़ता। किसी को भी उस पर दया नहीं आती। शर्मनाक यह भी कि लड़की ने मीडिया से भी मदद की गुहार लगाई, लेकिन वह उसे बेइज्जत होते शूट तो करता रहा, लेकिन ‘ड्यूटी’ पर होने की वजह से कुछ करने में ‘असमर्थ’ था। मीडिया को भी तय करना पड़ेगा कि उसकी जिम्मेदारी में किसी मरते आदमी को बचाना प्राथमिकता है या उसे मरते हुए कैमरे में कैद करना?
किसी के सामने वहिशयाना हरकत होती रहे और वह खड़ा तमाशा देखता रहे यह असंवेदनशील होने की इंतहा है। क्या वाकई समाज कायर हो गया है? आखिर ऐसी घटनाओं के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? लड़की के साथ जिस तरह की हरकत हुई है, उससे लड़की की दिमागी हालत का अंदाजा ही लगाया जा सकता है। क्या वह अपनी जिंदगी सामान्य तरह से जी पाएगी? क्या समाज ने एक लड़की को जीते-जी नहीं मार दिया है? क्या वह किसी पुरुष पर भरोसा कर पाएगी? लड़कियों का घर से निकलना क्यों गुनाह हो गया है? क्या वे किसी पार्टी में नहीं जा सकतीं? इस घटना ने अंतहीन सवाल पैदा किए हैं, जिनका जवाब समाज को देना है।
समाजशास्त्रियों के लिए यह रिसर्च का विषय है कि आखिर इस तरह के मामले उन बड़े शहरों में ही क्यों हो रहे हैं, जो कथित रूप से प्रगतिशील और सभ्य होने का दंभ भरते हैंदरअसल, समाज की यह तटस्थता घरों में दी जाती रही उस तालीम का नतीजा है, जिसमें बार-बार पढ़ाया जाता है कि किसी के पचड़े में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है, अपने काम से काम रखा करो। कुछ तालीम का असर, कुछ खुदगर्जी और कुछ पुलिस के रवैये ने ऐसा माहौल बना दिया है कि यदि कोई किसी के लिए मदद के लिए आगे आना भी चाहे, तो वह बहुत बातें सोचकर बढ़ते कदमों को पीछे खींच लेता है। पीछे खींचे गए कदम आतताइयों के हौसले बुलंद करती है, जिसका नतीजा गुवाहाटी जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है। इस मामले में अभी कम से कम छोटे शहरों और कस्बों का समाज इतना खुदगर्ज नहीं हुआ है कि वह किसी लड़की को सरेआम बेइज्जत होता देखता रहे। और यही वह समाज है, जिस पर बड़े शहरों के प्रगतिशील लोग औरतों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हैं। 
समाज में ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि जो लड़कियां जींस-टीशर्ट में पबों में जाती हैं, वे यकीनी तौर पर भोगने वाली वस्तु हैं। इस घटना के बाद सवाल लड़की पर भी उठाए जाएंगे। मसलन, वह रात को पब में क्या कर रही थी, वह भी इतनी छोटी उम्र की लड़की? यह भी कहा जाएगा कि आजकल की लड़कियां भी कम नहीं हैं। सवाल उसकी ड्रेस पर भी उठाए जाएंगे। कुछ उसके चरित्र पर भी उंगली उठा देंगे। सारा दोष लड़की पर ही मढ़ देने वाले भी कम नहीं होंगे। इन सबके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि लड़की की गलती हो भी, तो क्या किसी को उसे सरेआम नोंचे-खसोटे जाने का लाइसेंस मिल जाता है? पाबंदियां सिर्फ लड़कियों के लिए ही क्यों हैं? लड़की प्रेम विवाह करे, तो उसे मौत मिलती है। कभी सुनने में नहीं आया कि किसी परिवार ने अपने ‘लाडले’ को मौत की नींद इसलिए सुलाया कि उसने प्रेम विवाह क्यों किया है?
घटना पर असम के पुलिस महानिदेशक जयंत नारायण चौधरी ने जो कहा है, वह भी बेशर्मी की पराकाष्ठा है। वह फरमाते हैं कि  'पुलिस एटीएम मशीन नहीं होती, जिसमें कार्ड की तरह घटना का ब्योरा डाला जाए और मुजरिम हाथ आ जाए।' लखनऊ में एक दारोगा थाने में एक महिला से बलात्कार करने की कोशिश करता है। जब पुलिस ही महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाएगी, तो वही होगा, जो बागपत के एक गांव असारा की एक पंचायत में हुआ है। वहां पंचायत ने 40 साल से कम उम्र की महिलाओं पर अकेले बाजार आदि में जाने पर पाबंदी आयद करने का फरमान जारी किया है। इस फरमान की आलोचना हो रही है, होनी भी चाहिए। लेकिन जब पुलिस ही महिलाओं के साथ हुए उत्पीड़न पर उदासीनता बरते, तो समाज के वे लोग मजबूत होंगे ही, जो महिलाओं को परदे में रखने की कवायद करते हैं।
जब लड़कियों को सताया जाएगा, तो कन्या भ्रूण हत्याओं में इजाफा होगा। यह भी अकारण नहीं है कि जब भी लावारिस नवजात शिशु पड़ा पाया जाता है, तो वह शिशु लड़की ही होता है। देखा जाए, तो लड़कियों को दुनिया में आने जसे रोका ही इसलिए जाता है, क्योंकि उनके साथ ‘इज्जत’ नत्थी कर दी गई है। यही वजह है कि उनके लिए ड्रेस कोड निर्धारित किए जाते हैं। उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है। सोच बनती जा रही है कि लड़कियां अपनी तरफ से भले ही कोई गलत कदम न उठाएं, लेकिन उनके साथ कहीं भी कुछ हो सकता है, इसलिए लड़की न होना ही अच्छा है। गुवाहाटी जैसी घटनाओं के बाद यह सोच और ज्यादा पुख्ता होगी।

Wednesday, June 27, 2012

आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह पकड़े गए, 30 जून को विस के सामने धरना


लखनऊ। समाजवादी पार्टी द्वारा आतंकवाद के आरोप में बंद निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को छोड़ने के वादे को याद दिलाने के लिये 30 जून को विधान सभा के सामने धरना दिया जाएगा। यह जानकारी देते हुए पीयूसीएल के प्रदेश संगठन सचिव राजीव यादव और शाहनवाज आलम ने बताया कि तमाम मानवाधिकार संगठनों और नेताओं ने पिछले दिनों हुई बैठक में इस अभियान को चलाने के लिये प्रदेश स्तरीय ‘आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों का रिहाई मंच’ का गठन किया है। जिसके बैनर तले 30 जून को धरना दिया जाएगा। धरने की तैयारी के तहत लखनऊ, आजमगढ़, सीतापुर, प्रतापगढ़, बिजनौर, मुरादाबाद और रामपुर समेत कई जिलों में समाजवादी पार्टी द्वारा विधानसभा चुनाव में बेगुनाहों को छोड़ने के वादे से मुकरने के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है।
उन्होंने आगे बताया कि मुहीम में इंडियन मुजाहिदीन के नाम पर की जा रही निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारियों को तत्काल रोकने और खुफिया विभाग और एटीएस द्वारा बनाये गये इस कागजी संगठन पर केंद्र सरकार से श्वेतपत्र की मांग, तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी की जांच करने के लिये गठित निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करने, पीयूसीएल नेता और पत्रकार सीमा आजाद और विश्वविजय को तत्काल रिहा करने, जेलों में बंद नौजवानों की सुरक्षा की गारंटी करने, यरवदा जेल में पिछले दिनों एटीएस और खुफिया विभाग द्वारा की गयी कतील सिद्दीकी की हत्या की सीबीआई जांच कराने, फसीह महमूद को तत्काल प्रस्तुत करने समेत दस सूत्री मांग पत्र पर हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है।

इस पूरे अभियान का संचालन कर रहे मो. शोएब, एडवोकेट ने बताया कि एक तरफ तो समाजवादी पार्टी की सरकार 100 दिन पूरे होने का जश्न मना रही है जबकि उन मुसलमानों के घरों में सियापा पसरा है जिनके बच्चों को जेल से रिहा करने का वादा करके यह सरकार सत्ता में पहुंची है। उन्होंने सपा सरकार पर मुसलमानों को धोखा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि एक तरफ तो सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं पर से मुकदमे उठाये जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर एटीएस और खुफिया विभाग के जरिये मुसलमानों का उत्पीड़न जारी है। जिसका मिसाल सीतापुर से मौलाना शकील और आजमगढ़ के मदरसे में पढ़ने वाले दो कश्मीरी छात्रों का यूपी एटीएस द्वारा उठाया जाना है। मो. शोएब ने बताया कि 30 जून को होने वाले इस धरने में पूरे प्रदेश से आतंकवाद के नाम पर पकडे़ गये लोगों के परिवार के लोग और आम जनता शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि इस अभियान की शुरुआत 24 जून को फूलबाग से हो चुकी है। 25 जून को मौलवीगंज, 26 जून नखाश, अकबरी गेट, बिलौजपुरा, 27 जून चैपटिया, 28 जून खदरा में हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा।
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Tuesday, June 26, 2012

सूअर की खेती !


पूरी दुनिया मे भारी मात्रा मे ‘सूअर की खेती’ व सामने भारत के रूप मे बड़ा अंधा ग्राहक?

सूअर की खेती अर्थात सूअर को मांस और अन्य उत्पाद के लिए पालना । यूरोप मे सूअर व्यवसाय या सूअर खेती बहुत समय से चली आ रही है वहाँ के लोग मांस से अर्थ सूअर के मांस से ही लेते है । कोई दिन ऐसा नहीं की सूअर का स्वाद मुंह से न लगे । इसाइयों के बड़े पर्व पर सूअर को मारकर उसके मुंह से स्टील की मजबूत पाइप डालकर उसे आग के ऊपर रख देते है बारी बारी से घुमाकर फिर भूनकर खाया जाता है !

हम चटनी को सॉस कहने लगे है उस सॉस शब्द की उत्पति ही सूअर के मांस और आंतों से बनाए जाने वाले सौस ( Sause, sausage ) से हुई है

सूअर की खेती क्यूँ करते है अंग्रेज़ ?

सूअर का मांस यूरोप और चीन जैसे देशों मे अधिक लोकप्रिय है, जो अत्यादिक शीत प्रदेश है वहाँ सूअर के मांस का अधिक प्रयोग होता है ,सूअर के सिर से ‘मस्तिष्क चीज’ (head cheese) सूअर के मांस से पकौड़े जो इंगलेंड, औस्ट्रेलिया, न्यूजीलेंड और इटली मे काफी लोकप्रिय है, हमारे देश मे अच्छे ग्लेमर से भरे विज्ञापन देखकर के केएफ़सी (KFC) और मेकडोनाल्ड के तथाकथित ‘क्रिस्पी’ popcon – chicken नामक मांस के पकौड़े शाकाहारी लोग भी खाने लगे है यह माल का नहीं, विज्ञापन और कंपनी की मिलीभगत का कमाल है ।

यूरोप का सबसे सस्ता और लोकप्रिय खाना है sausage जो सूअर के मांस और आंतों से बनाया जाता है मांस को बारीक पीस करके उसे आंतों मे भरकर के भूनकर या कही कही उबाल कर खाया जाता है ।

इसके अलावा बेकन, ब्लेक पुडिंग, अतड़ियाँ का मुख्य रूप से खाद्य व्यवसाय होता है

सूअर के मांस से कुछ अम्ल का उत्पादन होता है जैसे सोडियम इनोसिनेट :-----

सोडियम इनोसिनेट : सोडियम इनोसिनेट अम्ल (E631) एक प्रकृतिक अम्ल है जो औद्योगिक रूप से सूअर के मांस या मछली मे निकाला जाता है

उत्पादन :-----

यह जलीय जीवों से उत्पन्न किया जाता है जैसे आंशिक रूप से मछली से ।

शराब बनाने मे जिस खमीर का प्रयोग होता है उससे

सूअर की चर्बी या मांस से ।

गुण : स्वाद को बढ़ाने मे, इनोसिनिक और इनोसिनेट मे ‘उमामी स्वाद’ नहीं होता लेकिन यह बाकी व्यंजन को निखारता है चाहे नमक की मात्रा हो या ना हो ।

उत्पाद : यह अम्ल कई खाद्य पदार्थो मे प्रयुक्त होता है

कई दैनिक भोज्य पदार्थो मे इसका प्रयोग होता है

12 सप्ताह से कम बच्चो को दिये जाने वाले खाद्य पदार्थो मे यह अम्ल की मात्रा बिलकुल नहीं होनी चाहिए !

बाजार मे मिलने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आलू चिप्स एवं नूडल्स मे इस अम्ल का उपयोग उत्पाद का स्वाद बढ़ाने मे होता है । नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्टमेकर पर कुछ लिखा नहीं होता है की उसमे कौनसा पदार्थ का उपयोग हुआ है क्या आपने इस बात को सोचा ? क्या खा रहे है आप ?

अधिकतर बहुराष्ट्रीय कंपनीयां टूथपेस्ट बनाने मे इसका इस्तेमाल करती है

अधिकतर बहुराष्ट्रीय कंपनीयां दाढ़ी की क्रीम बनाने मे इसका उपयोग करती है ।

इसके बिना चुइंगम बनाना मुश्किल है और वो सस्ती चुइंगम तो कभी नहीं बन सकती बिना मांस की चर्बी से बनाए गएँ E631 से ।

जानवरो से प्राप्त E631 कम लागत का होता है । अधिकतर E631 जानवरो से ही प्राप्त होता है ।

दुष्परिणाम : जिन लोगो को गठियाँ और स्वास संबंधी रोगो और अस्थमा की शिकायत है उन्हें इस अम्ल के बने पदार्थो से बचना चाहिए ।

सूअर के मांस खाने वाले और सूअर की खेती करने वाले प्रमुख देश है (आकड़ें2007)

देश सूअर की अनुमानित

संख्या (मिलियन)

चीन 425

अमेरिका 71

ब्राज़ील 35.5

जर्मनी 27.1

वियतनाम 26.1

स्पेन 26

आहार प्रतिबंध :---- इनोसिनेट सामान्यतः जानवरों की चर्बी से प्राप्त किए जाते है आंशिक रूप से मछलियों से भी प्राप्त होता है । इस प्रकार शाकारियों के लिए इस अम्ल के बने पदार्थ उपयुक्त नहीं है मुस्लिम, धर्म के लोगो इससे बने पदार्थों को अस्वीकार करते है क्यूँ की औद्योगिक रूप से यह अम्ल सूअर की चर्बी से प्राप्त होता है

निष्कर्ष :---- अक्सर कहा जाता है की ‘उमामी स्वाद’ कृतिम रूप से बनाएँ गए E-631 मे नहीं मिल पाता, अक्सर कंपनियाँ अपने ग्राहको को बताती है की उनके E-631 का निर्माण सूअर की चर्बी से नहीं हुआ है रासायनिक प्रक्रिया से उत्पन्न हुआ है, लेकिन मुख्य रूप से इसका स्रोत सूअर की चर्बी है, उत्पादक अपने उत्पादों पर लेबल नहीं लगा सकते की उक्त उत्पाद मे सूअर की चर्बी से निकाले गएँ उक्त अम्ल का प्रयोग हुआ है क्योंकि खाने वाले ग्राहक पता नहीं कौन है शाकाहारी या मासाहारी । सूअर की चर्बी से प्राप्त किए गए इस इनोसिनेट अम्ल की लागत काफी कम आती है अतः औद्योगिक रूप से मुख्यतः यह अम्ल सूअर की चर्बी से ही प्राप्त होता है ।

अक्सर आपने देखा होगा की इन कंपनीयों की वैबसाइट पर कंपनियों द्वारा विभिन्न डिस्क्लेमर लिखे रहते है या यह लिखित प्रमाण दिखाया जाता है की की हमारे उत्पाद जानवरों की चर्बी से रहित हैं । मान लो अगर एक कंपनी का कारोबार 200 – 500 – 1000 करोड़ तक है तो उसे कोई परेशानी नहीं होगी लोगो को बेवकूफ बनाने मे । क्या वह सच बताएगी लोगो को ? भारी मुनाफा ऐसे ही नहीं मिलता आजकल, वैसे भी रिश्वत खाने वाले मीरजफर और जयचंद बहुत है भारत मे, बच जाती है ऐसी कंपनियाँ जैसे 2004 मे कोक पेप्सी बच गई थी शरद पवारों और के हाथो । अगर विदेशी भारत मे हमें लूट सकते है तो वे सब कुछ कर सकते है जो उनके कमाने के आड़े आएगा

अम्ल (खाद्य) E – कोड उत्पादन उपयोग:-------

Disodium Guanylate E627 सुखी मछलियाँ, समुंद्री सिवार ग्लूटामिक अम्ल बनाने मे

Dipotassium guanylate E628 सुखी मछलियाँ स्वाद बढ़ाने मे

Calcium guanylate E629 जानवरो की चर्बी स्वाद बढ़ाने मे

Inocinic Acid E630 सुखी मछलियाँ स्वाद बढ़ाने मे

Disodium inosinate E631 वृहद मात्रा मे सूअर, मछली चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने एवं स्वाद बढ़ाने मे

इन सबके अलावा हमारे दैनिक जीवन मे घरेलू वस्तुओं मे जानवरो के जीवन और खून का कितना योगदान होता है लिपिस्टिक बनाने मे गाय के मस्तिष्क का उपयोग होता है सौन्दर्य प्रसाधन मेकअप का सामान बनाने की बहुत सी सामाग्री चीन मे जानवरो से सस्ती दरो पर बनाकर के अमेरिकी कंपनियों को एक्सपोर्ट की जाती है फिर अमेरिका से भारत आती है !