Friday, May 29, 2015

हम कहां भाग कर जाएं


मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सब कुशल होंगे। पत्र लिखने का तरीका ज़रा पुराना है पर बात नई है। मुझे इस बात की खुशी है कि आप शिद्दत से अख़बार पढ़ते हैं और न्यूज़ चैनल देखते हैं। लोकतंत्र में सटीक जानकारी ही हम सबको बेहतर नागरिक बनाती है और चुनाव के वक्त मतदाता। नागरिक और मतदाता में फर्क होता है। मतदाता आप मतदान के दौरान ही होते हैं लेकिन नागरिक आप हर समय होते हैं। पत्र लिखने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि क्या आपके साथ भी वैसा ही हो रहा है, जैसा मेरे साथ हो रहा है। मेरा मतलब है कि क्या हम और आप सेम टू सेम फील कर रहे हैं।

क्या आप भी मेरी तरह अख़बारों और चैनलों से घबराए हुए हैं। सरकार के एक साल पूरे हुए हैं, लेकिन हमारे तो नहीं हुए हैं। इस एक साल पर इतना कुछ छप रहा है और टीवी पर दिखाया जा रहा है, उन सबको देखने-पढ़ने में ही दस साल निकल जाएंगे। पिछले दस दिनों से सरकार का एक साल चल रहा है और यही रवैया रहा तो मैं आपको सतर्क कर देता हूं कि दो दिन बाद यानी बुधवार से सरकार का दूसरा साल शुरू हो रहा है। दूसरे साल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्या-क्या चुनौतियां होंगी, इन चुनौतियों में दस बड़ी चुनौतियां क्या होंगी, दस-दस के हिसाब से विदेश नीति से लेकर अर्थ नीति को लेकर उनकी चुनौतियां क्या होंगी। उन सभी चुनौतियों की पहले साल की चुनौतियों से तुलना भी की जाएगी। तैयार रहिए हमारी आपकी भी चुनौतियां कम नहीं हैं।

ख़ैर जब दूसरा साल आएगा तब आएगा, लेकिन यह पहला साल पूरा हुआ है उसके चक्कर में हम पूरे हुए जा रहे हैं। लगता है सरकार और मीडिया हर नागरिक को पकड़ कर उपलब्धियां-नाकामियां बताने की ज़िद पर आ गए हैं। विपक्ष लगता है कि हर उपलब्धियों को खारिज करने पर आमादा है। जैसे सोसायटी कल्चर में बर्थ-डे पर होता है कि आपने गिफ्ट दिया नहीं कि उधर से रिटर्न गिफ्ट थमा दिया गया। जैसे ही सरकार प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है, विपक्ष का भी होने लगता है। हम एक हाथ में केक और एक हाथ में गिफ्ट लिए हिलते-डुलते रह जाते हैं।

आज सुबह दही लेने गया तो लगा कि दुकानदार भी प्रेस काॉन्फ्रेंस के अंदाज़ पर महंगाई पर बोल रहा है, बगल की दुकान से टिंडे वाला खंडन किए जा रहा है। हर आदमी में मुझे दो आदमी नज़र आ रहे हैं। एक दावा करने वाला और एक खंडन करने वाला। अभी तो प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों का स्टॉक शुरू ही हुआ है। सुना है सरकार और बीजेपी 200 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली है। 200 रैलियां की जाएंगी और इससे भी बच गए तो आप उन 5,000 सभाओं से तो बच ही नहीं सकते, जो सरकार के एक साल पूरे होने पर की जाने वाली हैं। इससे अच्छा था कि एक अध्यादेश लाकर हर नागरिक को कम से कम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, एक सभा या एक बड़ी रैली में शामिल होना अनिवार्य कर देती। न्यूज़ चैनलों में तो प्रवक्ता और जानकार डेरा डालकर बैठ गए हैं। आप चैनल भले बदल लीजिए, लेकिन इन प्रवक्ताओं और जानकारों को नहीं बदल सकते। ये सर्वव्यापी हो गए हैं।

विपक्ष भी डाल-डाल तो पात-पात टाइप करने लगा है। विपक्ष वालों को कहीं जाना भी नहीं पड़ रहा है। सरकार घूम घूम कर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है, रैली कर रही है और ये हैं कि एक ही जगह से रोज़ उन दावों का खंडन कर देते हैं। जितना सरकार बोल रही है, उतना ये भी बोल रहे हैं। दोनों के बयान से सारे दावे और खंडन आपस में लड़-मर कर ढेर हो जा रहे हैं। और हम हैं कि वहीं गब्बू की तरह खड़े रोने लगते हैं कि अभी-अभी तो इस पर यकीन किया था और अभी-अभी फलाने ने यकीन तोड़ दिया। प्लीज़ यहां यकीन को खिलौना न समझें।

हम बहुत परेशान हैं। परेशान न होते तो आपको ख़त न लिखते। हमको बुझाता ही नहीं है कि कौन सा दावा जीता और कौन सा खंडन हारा। कोई ट्राइब्यूनल तो होना चाहिए, जहां सही गलत का फैसला हो। मंत्री को सुनकर लगता है कि वाह सरकार ने क्या-क्या कमाल कर दिया है। विपक्ष को सुनकर लगता है कि अरे वाह, जो बोला झूठ ही बोला है। ऐसे कैसे होगा। कुछ तो सही होगा और कुछ तो गलत होगा, लेकिन जो भी सही होगा वह गलत ही होगा या जो भी गलत है, वही सही है इससे तो मेरी आंतों में चक्कर आने लगे हैं।

मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों, आप कैसे झेल रहे हैं। अपना घर छोड़कर पड़ोसी के घर जाता हूं तो वहां भी वही अख़बार मिलता है। वही चैनल चल रहा होता है। इन लोगों ने तो हमें इम्तहान के दिनों की याद दिला दी है। दोनों हमें पकड़-पकड़ कर रटा रहे हैं। कितना याद रखें भाई। डर लगता है कि कहीं सरकार बहादुर ने टेस्ट ले लिया तो क्या होगा। भाई लोगों ने हम पाठकों और दर्शकों के लिए इतना मैटिरियल ठेल दिया है कि शिंकारा टॉनिक पीकर और च्यवनप्राश खाकर भी स्मरण शक्ति का बंटाधारा होने से कोई नहीं बचा सकता है।

सालगिरह सरकार की है और लाउडस्पीकर पड़ोसी झेल रहा है। हम किसी के जश्न में खलल क्यों डालें। सोचते हैं कि मना लेने दो भाई बस हमारी एक अर्ज़ी स्वीकार कर लें। हम इतना लेख नहीं पढ़ सकते हैं। इतना भाषण नहीं सुन सकते हैं। इतना प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं झेल सकते हैं। इतना मंत्रियों का इंटरव्यू नहीं झेल सकते। हमारी तरफ से आप भी प्रधानमंत्री मोदी से कहिये। हमने उनका हमेशा भला चाहा है, वह भी हमारा भला चाहें। वह टीवी वाले और अख़बार वालों को मना करें। अपनी पार्टी से भी कहें कि बस भाई बस। 5,000 सभाएं और 200 प्रेस कॉन्फ्रेंस। लोगों को रटवा-रटवा कर मार दोगे क्या।

हम दुआ करते हैं कि प्रधानमंत्री जी पांच साल पूरे करें और झमाझाम काम करें, लेकिन पहले साल पर ये हाल है तो मुझे डर है कि कहीं किसी ने यह सुझा दिया कि दूसरे साल पर सब दुगना होगा तो क्या होगा। यानी 400 प्रेस कॉन्फ्रेंस, 10,000 सभाएं। तीसरे साल पर 600 प्रेस कॉन्फ्रेंस और 15,000 सभाएं। हमारी उम्र भी तो हर साल बढ़ेगी। सोचिए हम पर क्या बीतेगी। हम कहां भाग कर जाएंगे।

मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों, एक ही बात को बार-बार सुनकर, अलग-अलग श्रीमुख से एक ही बात सुनकर मेरे दिमाग के हार्ड-डिस्क की कैपेसिटी कम हो गई है। ऐसा लगता है कि भारत में सालगिरह सेना तैयार हो गई है। एक सेना पक्ष में लिखती है और दूसरी विपक्ष में। कुछ संतुलन के लिए भी लिखते हैं। अच्छा है कि सरकार का सख्त इम्तहान हो रहा है, लेकिन उस इम्तहान का बोझ हम जैसे ग़रीब पाठकों और दर्शकों पर क्यों डाला जा रहा है।

अगर आपको भी ऐसा लगता है तो प्रधानमंत्री जी से गुज़ारिश कीजिए, लेकिन बधाई ज़रूर दीजिएगा। हमारी सरकार है ख़ूब काम करे। ख़ूब हिसाब हो लेकिन इतना भी बेहिसाब न हो कि हमारा ही हिसाब हो जाए। सोचा अपनी इस व्यथा को आपसे बांटू। भूल-चूक लेनी-देनी माफ़।

आपका
रवीश कुमार

Monday, April 27, 2015

मेरे साथ आठ माह तक रोज़ हुआ गैंग रेप


गुजरात के बोटाड ज़िला के देवालिया गांव में कांसे और स्टील के बर्तनों से सजे कमरे में एक चारपाई पर वह चुपचाप लेटी हुई हैं और उसके बच्चे उसके पास बैठे हैं.

गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह उन्हें खेलते हुए देखती रहती हैं और सिर्फ़ रोज़मर्रा के कामकाज निपटाने या अपनी आठ महीने की दर्दनाक कहानी पुलिस या मीडिया वालों को सुनाने के लिए ही उठती हैं.
सामूहिक बलात्कार की शिकार 23 साल की यह युवती बताती हैं, "उन्होंने करीब आठ महीने तक रोज़ मेरा बलात्कार किया. चार लोग तो नियमित थे, बाकी आते-जाते रहते थे. अगर मैं कुछ ऐसा करती जो उन्हें पसंद न आता तो वह मुझे पीटते. मुझे रोने में भी डर लगता था."
कभी एक ख़ुश बेटी, बीवी और मां रही इस युवती के सात माह के गर्भ को गिराने की याचिका को पिछले हफ़्ते गुजरात उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया.

अब वह अपने मायके में ही रह रही है. उसके मां-पिता की नज़रें भी उसी पर टिकी रहती हैं.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह कहती हैं, "यह मेरे बलात्कारियों का बच्चा है. मैं इसकी मां हूं लेकिन अगर यह बच्चा मेरे साथ रहेगा तो कोई भी मुझे और मेरे परिवार को स्वीकार नहीं करेगा. अदालत ने गर्भपात की इजाज़त नहीं दी. मैं सरकार से प्रार्थना करती हूं कि वह इस बच्चे को अपने सरंक्षण में ले ले और किसी अनाथालय में दे दे."
परिवार के अंदर बेचैनी साफ़ नज़र आती है. पीड़िता अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को त्यागने के विचार से शायद पूरी तरह सहमत नहीं है.
बच्चे को अपने पास रखने के सवाल पर वह चुप हो जाती हैं और धीरे से अपनी मां की ओर देखती हैं. उनकी मां जवाब देती हैं, "यह बच्चे को कैसे रख सकती है? अगर यह ऐसा करेगी तो समाज और गांव हमें बहिष्कृत कर देगा. मेरे दो और बच्चे हैं. मेरा 14 साल का लड़का कुंवारा रह जाएगा. कोई भी हमारी इज़्ज़त नहीं करेगा."
वो कहती हैं, "यह मां है लेकिन बच्चा बलात्कारियों का है, हम उसे नहीं रख सकते."

जब मां यह कह रही थी तो पीड़िता एक कुर्सी पर सिर झुकाए और पल्ला ओढ़े बैठी हुई थीं.
वह उस दहशत और सदमे के बारे में बात भी मुश्किल से ही कर पाती हैं. उन दिनों का ज़िक्र उसकी आँखों में आँसू ले आता है.
अपने 18 महीने के बेटे को खेलता देखते हुए वह कहती हैं, "रात को वह जंगल में ख़रगोश और काले हिरने का शिकार करने जाते. दो लोग मेरे साथ रुक जाते और गलत काम (बलात्कार) करते. फिर उन दो की जगह दूसरे दो आ जाते. महीनों तक हर रात यही होता रहा."
पीड़िता के ससुरालवालों ने उसे घर में घुसने से रोका तो उसके पति भी घर छोड़कर साथ ही आ गए.
वह कहती हैं, "एक रात जब मेरे अपहरणकर्ताओं ने एक खरगोश को काटा तो उसके पेट में से दो नन्हें ख़रगोश निकले. मैं खुद को रोक नहीं पाई और तुरंत उनमें से एक को उठा लिया जिसने मेरी उंगलियां कुतरनी शुरू कर दीं. इससे मुझे अपने बच्चों की याद आ गई और मैंने रोना शुरू कर दिया."

गुजरात, बलात्कार पीड़ितपुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने सात लोगों को नामजद किया है और बताया है कि वह उसे लगातार पीटते थे.
बात करते हुए उसके हाथ और ज़बान कांपते हैं.
वो कहती है, "मुझे रोता देखकर एक को ग़ुस्सा आ गया और वो अपनी बंदूक से मुझे पीटने लगा जिसमें बाकी भी शामिल हो गए. उस घटना के बाद उन्होंने कुछ दिन तक मुझे भूखा रखा. मैंने खाना मांगा तो उन्होंने मुझे ख़रगोश का गोश्त दिया, जो मैं खा नहीं पाई."

पीड़िता के पति ने पिछले साल जुलाई में सूरत में अपनी पत्नी के लापता होने की पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. पीड़िता के अपहरण से पहले शहर में उनकी ज़िंदगी आराम से गुज़र रही थी.
पीड़िता के परिवार को उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस और नेताओं के चक्कर काटने पड़े लेकिन कोई मदद नहीं मिली.
अभियुक्त दाफ़र समुदाय से हैं जो गुजरात की ख़ानाबदोश जाति है. पीड़िता गुजरात के देवी पूजक समुदाय की हैं.
पीड़िता की मांसात नामजद अभियुक्तों में से पांच को गिरफ़्तार कर लिया गया है. इस मामले में गुजरात पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे.
पीड़िता की मां कहती हैं, "उसके ग़ायब होने के कुछ दिन बाद मुझे उसके अपहरणकर्ताओं के बारे में पता चला. मैंने पुलिस को बताया तो उन्होंने कहा कि वह अपनी मर्ज़ी से उनके साथ रह रही है और उसने यह लिखकर दिया है कि उसके लिव-इन संबंध हैं. लेकिन कौन क़ैद रहने और बलात्कार किए जाने के लिए अपनी मर्ज़ी से काग़ज़ पर दस्तखत करता है. पुलिस ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया."
लेकिन इस मामले के जांच अधिकारी पुलिस उपाध्यक्ष तेजस पटेल इससे अनभिज्ञता जताते हैं, "पीड़िता या उसके परिवार के साथ इस तरह के व्यवहार के बारे में मुझे नहीं पता. हमने पांच अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है. एक अभियुक्त, गांव के सरपंच ने अपनी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ अदालत से स्टे ऑर्डर ले लिया है और एक फ़रार है."

लेकिन पीड़िता और उनके परिजन पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हैं. पीड़िता के पारिवारिक दोस्त सरदारसिंह मोरी कहते हैं, "अपहर्ताओं के कब्ज़े से बच निकलने में कामयाब होने पर पीड़िता और उनकी मां घंटों तक जंगल में छुपे रहे, उसके बाद हिम्मत जुटाकर वह पुलिस के पास गए. लेकिन जैसी आशंका थी स्थानीय पुलिसकर्मियों ने शिकायत लिखने से इनकार कर दिया और फिर हमने महिला पुलिस हेल्पलाइन को फ़ोन किया जिसके बाद न चाहते हुए भी हमारी शिकायत लिखी गई."
पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए एफ़आईआर के 48 घंटे बाद ले जाया गया. हालांकि मामले के कोर्ट में जाने और राष्ट्रीय अख़बारों की सुर्खियां बनने के बाद गुजरात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले का निरीक्षण शुरू किया.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
इस मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर रोष का सामना कर रही गुजरात सरकार ने गुरुवार को पीड़िता को 20,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी.
उसके लिए अब बलात्कार और गर्भ में पल रहे बच्चे को पैदा करने की मुश्किल से ज्यादा बड़ी चुनौती है 'पवित्र' होने की कवायद को पार करना.
क्या होता है पवित्र करने का ये तरीका….??
बीबीसी हिंदी

Thursday, March 05, 2015

मयंक गांधी की ये चिट्ठी


आम आदमी पार्टी की पीएसी से दो वरिष्ठ सदस्यों योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर करने के बाद भी पार्टी का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। पीएसी के सदस्य और पार्टी के बड़े चेहरे मयंक गांधी ने अब यादव और भूषण को हटाने के तरीके पर ऐतराज जताते हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग में हुई बातें सार्वजनिक कर दी हैं। मयंक ने पार्टी के निर्देशों को धता बताते हुए कार्यकर्ताओं के नाम लिखे खुले पत्र में ये बातें कही हैं।

मयंक के मुताबिक योगेंद्र और भूषण खुद ही पीएसी से किनारे होने को राजी थे लेकिन केजरीवाल इन्हें बाहर करने पर अड़े हुए थे और इसी के चलते इनकी पीएसी का पुनर्गठन करने या पीएसी से गैरहाजिर रहने की मांग नहीं मानी गई और सीधे-सीधे बर्खास्तगी का प्रस्ताव पेश कर दिया गया। मयंक की लिखी चिट्ठी का मजमून नीचे दिया जा रहा है।
प्रिय कार्यकर्ताओ,
मैं माफी चाहता हूं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कल जो कुछ हुआ उसे बाहर किसी को न बताने के निर्देशों को तोड़ रहा हूं। वैसे मैं पार्टी का एक अनुशासित सिपाही हूं।
2011 में जब अरविंद केजरीवाल लोकपाल के लिए बनी ज्वाइंट ड्राफ्ट कमेटी की बैठक से बाहर आते थे तो कहते थे कि कपिल सिब्बल ने उनसे कहा है कि बैठक में जो कुछ हुआ उसे वो बाहर न बताएं। लेकिन अरविंद कहते थे कि ये उनका कर्तव्य है कि वे देश को बैठक की कार्यवाही के बारे में बताएं क्योंकि वो कोई नेता नहीं थे बल्कि लोगों के प्रतिनिधि थे। अरविंद ने जो कुछ किया वो वास्तव में सत्य और पारदर्शिता थी।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेरी मौजूदगी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधि के तौर पर ही है और मैं ईमानदार नहीं होऊंगा अगर मैं ये निर्देश मानता हूं। कार्यकर्ताओं को किसी समीकरण से नहीं हटाया जा सकता। वे पार्टी के स्रोत हैं। उन्हें सेलेक्टिव लीक और छिटपुट बयानों से जानकारी मिले, इसकी बजाय मैंने फैसला किया है कि मैं मीटिंग का तथ्यात्मक ब्योरा सार्वजनिक करूंगा।
पिछली रात मुझसे कहा गया कि अगर मैंने कुछ भी खुलासा किया तो मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। अब जो हो, मेरी पहली निष्ठा सत्य के प्रति है। यहां योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बर्खास्तगी के संबंध में मीटिंग के तथ्य दिए जा रहे हैं। मैं राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निवेदन करूंगा कि मीटिंग के मिनिट्स रिलीज किए जाएं।
संक्षिप्त पृष्ठभूमिः दिल्ली के चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत भूषण ने कई बार धमकी दी कि वे पार्टी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे क्योंकि उन्हें उम्मीदवारों के चयन पर कुछ आपत्ति थी। हममें से कुछ किसी तरह इस मुद्दे को चुनाव तक शांत रखने में सफल रहे। आरोप था कि योगेंद्र यादव अरविंद केजरीवाल के खिलाफ साजिश कर रहे हैं और इसके कुछ सबूत भी रखे गए। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के बीच मतभेद सुलझने की हद से बाहर चले गए और उनके बीच विश्वास का संकट था। 26 फरवरी की रात जब राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य उनसे मिलना चाहते थे, अरविंद ने ये संदेश दिया कि अगर ये दो सदस्य पीएसी में रहेंगे तो वो संयोजक के तौर पर कार्य नहीं कर पाएंगे। 4 मार्च को हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की यही पृष्ठभूमि थी।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकः योगेंद्र यादव ने कहा कि वो समझ सकते हैं कि अरविंद उन्हें पीएसी में नहीं देखना चाहते, चूंकि अरविंद के लिए उनके साथ काम करना मुश्किल है इसलिए वो और प्रशांत पीएसी से बाहर रहेंगे लेकिन उन्हें बाहर नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में दो फॉर्मूले उनके द्वारा पेश किए गए।
-पीएसी का पुनर्गठन हो और नए सदस्य चुने जाएं। इसके लिए होने वाले चुनाव में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव अपनी उम्मीदवारी पेश नहीं करेंगे।
-पीएसी अपने वर्तमान रूप में ही काम करती रहे और योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण मीटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे।
मीटिंग कुछ समय के लिए रुक गई और मनीष व अन्य सदस्यों ने दिल्ली टीम के आशीष खेतान, आशुतोष, दिलीप पांडेय और अन्य से मशविरा किया। इसके बाद मनीष ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बर्खास्तगी का प्रस्ताव रखा। संजय सिंह ने इसका समर्थन किया। मैं इन दो कारणों की वजह से वोटिंग से बाहर रहा।
-अरविंद पीएसी में अच्छे से काम कर सकें इसके लिए मैं इस बात से सहमत हूं कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पीएसी से बाहर रह सकते हैं और कुछ दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका ले सकते हैं।
-मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से बाहर रखने के प्रस्ताव के विरोध में था खासकर तब जब कि वे खुद अलग होना चाहते थे। इसके अलावा उन्हें हटाने का ये फैसला दुनिया भर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ है।
यानी, मैं उनके पीएसी से बाहर जाने से सहमत था लेकिन जिस तरह से और जिस भावना से ये प्रस्ताव लाया गया वो अस्वीकार्य था। इसलिए मैंने गैरहाजिर रहने का निर्णय लिया। दूसरी जानकारियां मीटिंग के मिनट्स जारी होने पर बाहर आ सकती हैं।
ये कोई विद्रोह नहीं है और न ही पब्लिसिटी का कदम है। मैं प्रेस में नहीं जाऊंगा। मेरे इस कदम के चलते मेरे खिलाफ प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई हो सकती है, तो ऐसा हो जाए।
जय हिंद
मयंक गांधी

Sunday, February 22, 2015

शपथ ग्रहण के दिन नीतीश कुमार का एक्सक्लूसिव लेख : 'बिहार के लिए पीएम के साथ मिलकर काम करूंगा'


बिहार के लोगों की सेवा करने का जो अवसर मिला है, उसके लिए मैं आभारी हूं। इतिहासकार भरोसे के साथ कहते हैं कि प्राचीन भारत का गौरवशाली इतिहास प्राचीन बिहार का इतिहास है। वैसे आज ये आम जानकारी है कि बिहार भारत का सबसे ग़रीब राज्य है और अगर इसके आकार के दुनिया भर के राज्यों से इसकी अलग से तुलना की जाए तो ये दुनिया का सबसे गरीब राज्य है।
Nitish Kumar's exclusive op-ed on the day that he takes oath as CM
क्या यही सब कुछ है? मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं मानता हूं कि बिहार देश में बहुत बड़ी संभावनाओं वाला राज्य है और विकसित भारत की कहानी विकसित बिहार की कहानी के बिना संभव नहीं है। मैं इसे यथार्थ में बदलने के लिए काम करता रहा हूं, करता रहूंगा।

बिहार की मज़बूती, कमज़ोरी, इसके अवसर और इसकी प्रगति की चुनौतियों के बहुत सरल विश्लेषण से भी बिहार की संभावना को रेखांकित किया जा सकता है। बिहार की ताकत इसके लोगों में- ख़ासकर यहां की महिलाओं, यहां के नौजवानों, इसकी उपजाऊ ज़मीन, इसके प्रचुर जल स्रोतों, हज़ारों वर्षों की इसकी समृद्ध विरासत और बड़ी तेज़ी से फैल रहे बहु कुशल अनिवासी बिहारियों में है।

साथ ही साथ, बिहार के बहुत सारे कमज़ोर मोर्चे भी हैं। बिहार बुनियादी ढांचे और संस्थानों के विकास में बाकी देश से पीछे छूट गया, जो भारत के दूसरे समृद्ध और बेहतर विकसित राज्यों का मामला नहीं है। बुनियादी ढांचे और संस्थानों की कमी ने ज्ञान सृजन में एक बड़ी कमी को जन्म दिया है। इसके अलावा, बिहार चारों तरफ़ से ज़मीन से घिरा है। झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद, बिहार के पास प्राकृतिक संसाधन भी नहीं रह गए। तो कुछ अंतर्निहित कमज़ोरियां हैं जिनसे राज्य को जूझना है।

बहरहाल, भविष्य उज्ज्वल है। बिहार की मज़बूती कोई उससे छीन नहीं सकता, जबकि उसकी कमज़ोरियां दूर करने के लिए व्यवस्थागत ढंग से काम किया जा सकता है। इसी बिंदु पर सबसे ज़्यादा अवसर बने हुए हैं। किसी भी दूसरे राज्य को सुशासन और नीति निर्माण से उतना फ़ायदा नहीं हो सकता, जितना बिहार को। यह केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह देश के भीतर बढ़ती विकराल गैरबराबरी को सहायक नीति निर्माण के ज़रिए दूर करे। विशेष राज्य का दर्जा ऐसा ही नीतिगत कदम है।

बिहार में बुनियादी ढांचे की बराबरी हासिल करने के लिए सड़क, रेल, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करने भर से राज्य की अर्थव्यवस्था रफ़्तार पकड़ लेगी। नेतृत्व और शासन यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि बिहार को उसका प्राप्य मिले और ज़रूरी आधारभूत और संस्थागत विकास हासिल करने के लिए परियोजनाओं को वक़्त पर पूरा किया जाए।

आज बिहार तकनीक की मदद से विकास के कई डग एक साथ भर सकता है। डिजिटल क्षमता से लैस बिहार किफायती तरीक़े से बेहतर स्तर की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक कल्याण मुहैया करा सकता है। राज्य के मूल बुनियादी ढांचे की बेहतरी, बेहतर शिक्षा और युवाओं के प्रशिक्षण, दुरुस्त कानून-व्यवस्था और बिजली की उपलब्धता निवेश और उद्यमिता की बेहद ज़रूरी बुनियाद रख देगी। यहां से बैंकों से मिलने वाला कर्ज़ निजी क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने में काफी अहम भूमिका निभाएगा। इस फ्रेम में, आप जहां भी देखें, निवेश की एक भूमिका है- चाहे वह बुनियादी सुविधा के विकास में हो, नौजवानों के कौशल और ज्ञान को बढ़ावा देने में हो या निवेश और उद्यमिता को सक्षम बनाने में हो। बिहार में निवेश का मामला सरल है और यह निवेशकों, राज्य और समाज को बिल्कुल समयबद्ध फायदा देगा।

इसके अलावा खेती के खाके पर भी काम चलता रहना चहिए, जो भारत को दूसरी हरित क्रांति की तरफ ले जाने के लिए राज्य द्वारा खींचा गया है, जिसकी मैं अक्सर एक रेनबो रिवॉल्यूशन (सतरंगी क्रांति) की तरह कल्पना करता हूं। बिहार छोटे किसानों का राज्य है जिनके पास देश की सबसे उपजाऊ भूमि है। खेती का खाका साफ़ तौर पर ऐसा नीतिगत दृष्टिकोण बनाता है जिससे खेती महत्वपूर्ण ढंग से और उत्पादक हो सके।

शहरीकरण वह एक और अहम क्षेत्र है जहां बिहार में अवसर ही अवसर हैं। आज बिहार के नौ में से एक ही आदमी शहरी इलाक़े में रहता है। इसे स्वाभाविक ढंग से बढ़ना है और अगले दस साल में कम से कम दुगुना हो जाना है। राज्य इस सूरत का फायदा उठा सकता है, बस यह सुनिश्चित करके कि बिहार के शहरी केंद्र बेहतर ढंग से नियोजित हों, वहां बिजली हो और वे रोज़गार सृजन के लंगर बन सकें। आधुनिक तकनीक के साथ, इसे कहीं बेहतर रफ़्तार और सुनिश्चित परिणामों के साथ हासिल किया जा सकता है।

बिहार के लिए एक अहम मौक़ा राज्य के अनिवासी लोगों का का बहुत बड़़ा आधार है जिनके पास तरह-तरह के कौशल हैं और ढेर सारे संसाधन हैं। राज्य से उनका ज़ुड़ाव सिर्फ़ संपत्ति और उनके विस्तृत परिवार तक ही सीमित नहीं है जो राज्य में रह रहा है, बल्कि यह एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव है और उनको बिहार के विकास के लिए काम करने को प्रेरित करता है। मैं इसे बहुत बड़ी संभावना के तौर पर देखता हूं कि अनिवासी बिहारियों के ज्ञान, साधनों और उनकी आकांक्षाओं को राज्य के विकास के मुद्दे की तरफ मोड़ा जा सकता है।

मुझे उन ख़तरों का भी पूरा-पूरा एहसास है जो बिहार लगातार झेल रहा है। एक तो, राज्य प्राकृतिक आपदाओं- ख़ासकर बाढ़ और अकाल का मारा है। पहले से ही बढ़ा हुआ ये खतरा जलवायु परिवर्तन को देखते हुए और बड़ा हो सकता है। दूसरे, हमारे बेहद घनी आबादी वाले और गरीब राज्य में जाति और धर्म अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए बिहार अन्याय, निष्क्रियता और विभाजक ताकतों का भी आसान शिकार है। जहां सक्रिय शासन से प्राकृतिक आपदा के ख़तरों को कम किया जा सकता है, वहीं सामाजिक मोर्चे पर राज्य को सहनशील बनाने का इकलौता उपाय न्याय के साथ विकास का नज़रिया है।

बिहार की सरकार ऐसी होनी चाहिए जो विकास कर सके, उसके फायदों को सबसे कमज़ोर तबकों तक पहुंचा सके, और सामाजिक समरसता को लगातार मज़बूत कर सके। दुनिया में कहीं भी किसी गरीब राज्य को बांटने वाली नीति और राजनीति से नहीं बदला गया है। तो बिहार के आगे बढ़ने का इकलौता रास्ता मज़बूत नेतृत्व, सुशासन और न्याय के साथ विकास है।

राज्य की मज़बूती, कमज़ोरी, उसके अवसरों और ख़तरों का यह सरल विश्लेषण भी राज्य की बेतहाशा संभावनाओं को सामने रख देता है। मेऱी कल्पना इस संभावना को मूर्त रूप देने की है। मज़बूतियों का पूरा-पूरा इस्तेमाल करना होगा- नौजवानों में आगे बढ़ने और योगदान करने का हुनर हासिल करना होगा, महिलाओं को समाज में अपनी समुचित भूमिका निभानी होगी. हमारी ज़मीन की उत्पादकता बढ़ानी होगी, जल संसाधनों के इस्तेमाल को उत्पादक बनाना होगा और दुनिया भर के लोगों को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अऩुभव कराना होगा। कमज़ोरियों को कम करना होगा। इसके लिए चाहे जो भी करना पड़े। बिहार को आधारभूत ढांचे, संस्थाओं और ज्ञान के मामले में बराबरी हासिल करनी है। यह राज्य और केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है।

अक्सर लोग बिहार के चूके हुए मौकों की बात करते हैं। अब और नहीं। मेरी कल्पना ऐसा दृष्टिकोण विकसित करने की है जिससे बिहार अपने अवसरों का पूरा इस्तेमाल करेगा। हमारे नौजवान लड़के-लड़कियां- और वे करोड़ों में हैं- बेहतर प्रशिक्षित होंगे और किसी भी दूसरे राज्य के लोगों से सक्षम होंगे। हमारे नगर और शहर बेहतर जीवन स्तर और रोज़गार के अवसर मुहैया कराएंगे। और राज्य उद्यमियों और निवेशकों के हब के रूप में विकसित होगा। साथ ही, हमारे गांव आत्मनिर्भर और जीवंत होंगे। इस बार बिहार दूसरी हरित क्रांति में सिर्फ शामिल नहीं होगा, बल्कि उसका नेतृत्व करेगा।

जहां मैं इन लक्ष्यों की ओर काम कर रहा हूं, मैं लोगों के लिए सबसे अहम संदेश भी साफ़ कर दूं। मैं एक ऐसा राज्य बनाने में लगूंगा जो हमेशा-हमेशा के लिए कुशासन की कहानी की छाया से मुक्त हो जाए। यह खयाल और डर कि बिहार कभी भी गैरज़िम्मेदार हुकूमत और कानून-व्यवस्था की ओर लौट सकता है, लोगों के दिलो-दिमाग से दूर होना चाहिए।

मेरी मूल ताकत सुशासन, समग्र विकास और सामाजिक समरसता देने की क्षमता है। जैसा कि मैंने बीते नौ सालों में कोशिश की है, मेरी हसरत एक ऐसा राज्य बनाने की है जहां मज़बूती संस्थागत हो जाए। और मैं ये कोशिश हमेशा हमेशा जारी रखते हुए, ऐसा राज्य बनाना चाहता हूं जो सकारात्मक भविष्य, जीवंत संस्कृति और टिकाऊ समरसता की दास्तान को भरोसे के साथ आगे ले जा सके। और ये हासिल करने में, मैं बिहार के हक़ में भारत सरकार और माननीय प्रधानमंत्री के साथ तत्परता के साथ काम करूंगा।

Saturday, February 07, 2015

धार्मिक असहिष्णुता पर पीएम मोदी को अपनी ‘गहरी चुप्पी’ तोड़ने की जरूरत : NEW-YORK-TIMES


अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने आज अपने संपादकीय में कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धार्मिक असहिष्णुता के मुद्दे पर अपनी ‘गहरी चुप्पी’ तोड़ने की जरूरत है। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कल कहा था कि भारत में धार्मिक ‘असहिष्णुता’ से महात्मा गांधी स्तब्ध हो गए होते।

इस टिप्पणी के बाद अखबार के संपादकीय बोर्ड ने ‘मोदी की खतरनाक चुप्पी’ शीषर्क से लिखे गए संपादकीय में कहा है, भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा के बारे में बोलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्या चाहिए?उसके अनुसार, ‘श्रीमान मोदी को धार्मिक असहिष्णुता के मुद्दे पर अपनी गहरी चुप्पी तोड़ने की जरूरत है।’
संपादकीय में लिखा है, ईसाइयों के प्रार्थना स्थलों पर हो रहे हमलों पर, भारत के सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व और उनकी सुरक्षा करने के लिए चुने गए व्यक्ति की ओर से कोई ‘प्रतिक्रिया नहीं’ आई और ना ही प्रधानमंत्री ने ईसाइयों और मुसलमानों के हिन्दुत्व में ‘धर्मांतरण’ पर कुछ कहा।
इस संपादकीय के अनुसार, ‘इस तरह बढ़ रही धार्मिक असहिष्णुता पर श्रीमान मोदी की लगातार चुप्पी यह प्रभाव छोड़ती है कि वह हिन्दू राष्ट्रवाद के इन तत्वों को या तो नियंत्रित नहीं कर सकते या फिर करना नहीं चाहते।’
न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकीय में कहा गया है, ‘मोदी ने भारत के विकास के लिए महत्वाकांक्षी एजेंडे का वादा किया है, लेकिन जैसा कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले माह नई दिल्ली में दिए गए अपने भाषण में कहा ‘भारत उस वक्त तक सफल रहेगा, जब तक वह धार्मिक आस्था के आधार पर बंट नहीं जाता।’ ओबामा ने कल कहा था कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में सभी धर्मों के लोगों को जिस प्रकार के असहिष्णु कृत्यों का सामना करना पड़ रहा है, उससे महात्मा गांधी स्तब्ध रह गए होते।
ओबामा की यह टिप्पणी आने से एक दिन पहले ही व्हाइट हाउस ने इस बात को खारिज कर दिया था कि नई दिल्ली में 27 जनवरी को ओबामा के भाषण में आया धार्मिक सहिष्णुता का मुद्दा भाजपा पर अप्रत्यक्ष निशाना था।
वाशिंगटन में हाई-प्रोफाइल ‘नेशनल प्रेयर ब्रेकफास्ट’ के दौरान अपनी टिप्पणी में ओबामा ने कहा, ‘मिशेल और मैं भारत से वापस लौटे हैं..अतुलनीय, सुंदर देश, भव्य विविधताओं से भरा हुआ, लेकिन वहां पिछले कुछ वर्षों में कई मौकों पर दूसरे धर्म के अन्य लोगों ने सिर्फ अपनी विरासत और आस्था के कारण सभी धर्मों के लोगों को निशाना बनाया है। इस असहिष्णु व्यवहार से महात्मा गांधी स्तब्ध रह गए होते।’
हाल ही में भारत से लौटे अमेरिकी राष्ट्रपति पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न धर्मों के खिलाफ हुई हिंसा का संदर्भ दे रहे थे। बराक ओबामा ने हालांकि किसी धर्म विशेष का नाम नहीं लिया और कहा कि हिंसा किसी एक समूह या धर्म से नहीं जुड़ी है।