Wednesday, December 17, 2014

मोदी की ख़ामोशी और हाथ पर हाथ धरे बैठने की क्या वजह है..??


ऐसे शख्स के लिए जो टीवी पर दर्जनों बार भाषण देता हो, महीने में एक बार रेडियो पर बोलता हो और जब मर्जी हो ट्वीट करता हो, उसे अपनी बात रखने के लिए शब्दों की कमी नहीं होती.

भारतीय जनता पार्टी का झंडा, सैनिक
लेकिन हाल ही में पार्टी सहयोगियों की ओर से दिए जाने वाले 'सांप्रदायिक' बयानों के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी बड़ी ही रहस्यमयी लगती है.
भाजपा के प्रवक्ता बताते हैं कि मोदी ने जब कड़ी बात करनी हो तो, बंद दरवाजों के पीछे मुद्दे पर बात करते हैं और मुझे बताया गया कि वो दो बार ऐसा कर चुके हैं,

'हिंदू राष्ट्र':
आम लोगों के पास यह जानने का कोई रास्ता नहीं है कि 'लव जिहाद', धर्मांतरण, बाबरी मस्जिद विध्वंस और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में मोदी क्या सोचते हैं.
उस भारत के बारे में जिसे उनके परिवार के लोग 'हिंदू राष्ट्र' कहते हैं.
उन ताजा रिपोर्टों को ही लें जिनमें मोदी को पार्टी सासंदों को शराफत की 'लक्ष्मण रेखा' न लांघने की सलाह देते हुए बताया गया है.
यह सलाह भी उन्होंने यह कहते हुए दी कि इससे विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिलता है.

विवादित बयान:
भाजपा नेताओं के अनुसार मंगलवार को संसद भवन में हुई पार्टी सासंदों की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने ये बात कही.
माना गया कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथुराम गोडसे को देशभक्त बताने वाले साक्षी महाराज के बयान से उपजे विवाद पर यह बात कही गई.
योगी आदित्यनाथ ने भी गोडसे को 'हिंदुओं का गर्व' कहा पर साक्षी महाराज बाद में इस बयान से मुकर गए.
पिछले हफ़्ते मोदी ने साध्वी निरंजन ज्योति को भी निशाने पर लिया था.

मुखर मोदी:
साध्वी पर राम को न मानने वाले भारतीयों के प्रति अपशब्द के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया था.
अमूमन मुखर रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी का कथित तौर पर पार्टी सांसदों को कूट संदेश था, "ऐसे मत बोले जैसे कि आप पूरे देश को संबोधित कर रहे हैं."
निश्चित रूप से ख़राब बात कहने वाले किसी व्यक्ति को झिड़कने का यह निराला तरीका था.
संयोग से मोदी ने ख़तरनाक और विभाजनकारी बयान देने वाले सांसदों की आलोचना नहीं की.
और जैसा हमें बताया गया, दिक्कत इस बात को लेकर थी कि विपक्ष इन मुद्दों के सहारे सरकार को विवाद में घसीटने की कोशिश कर रहा है.

'लव जिहाद':
15 अगस्त को मोदी ने कहा था कि सांप्रदायिकता की राजनीति पर 'दस सालों तक के लिए रोक' लगा दी जानी चाहिए.
इसके ठीक बाद संघ परिवार ने मुस्लिम विरोधी भावनाओं को हवा देनी शुरू कर दी, खासकर उन निर्वाचन क्षेत्रों में, जहां उपचुनाव होने थे.
मोदी के सहयोगी अमित शाह ने भाजपा के 'सांप्रदायिक अभियान' के नेतृत्व के लिए योगी आदित्यनाथ को चुना.
संघ ने संगठन के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' का एक पूरा अंक कथित 'लव जिहाद' को समझाने के लिए समर्पित कर दिया.

समर्पित सिपाही:
यह वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है जिसकी वफादारी की कसमें मोदी से लेकर भाजपा के छोटे से छोटे नेता तक खाते रहते हैं.
इनमें से किसी को प्रधानमंत्री ने एक बार भी फटकार नहीं लगाई, एक शब्द तक नहीं कहा.
इन सब बातों से अब तक ये साफ हो जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री के बयानों की अस्पष्टता एक सोची समझी बात है.
मोदी संघ परिवार के बोलबाज़ मोहरों की सार्वजनिक तौर पर आलोचना नहीं करेंगे क्योंकि ये सभी वही समर्पित सिपाही हैं जिन्होंने मिशन 272 का वादा पूरा करने में अपनी भूमिका निभाई है.

तरक्की और समृद्धि:
आज उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में पार्टी को सत्ता तक पहुँचाने और भाजपा की स्थिति मज़बूत करने के लिए इनकी जरूरत है.
लेकिन इसके साथ ही मोदी को यह भी पता है कि ख़ामोश रहना कोई बहुत अच्छा विकल्प नहीं है.
उनके 'विकास' के नारे ने क़रीब 12 फ़ीसदी मतों को पार्टी के पक्ष में किया था और अगर मतदाताओं को ये अहसास हुआ कि उन्हें ठगा गया है तो फिर चुनावी तस्वीर बदल सकती है.
देश के लाखों लोगों ने मोदी पर भरोसा जताया है क्योंकि वे नौकरी, तरक्की और समृद्धि लाने के उनके वादे पर यकीन करते हैं.
यही कारण है कि भाजपा वक़्त-वक़्त पर यह जताती रहती है कि पार्टी नेता जो कुछ भी कह रहे हैं, मोदी उससे नाखुश हैं.

एक कारगर औजार:
सच तो यह है कि ज़मीन पर ज्यादा कुछ नहीं बदला है. सत्ता में बैठे नेताओं के लिए सांप्रदायिकता एक कारगर औजार रही है.
सत्ता में बैठे लोगों को जिस मक़सद के लिए चुना जाता है, उसे पूरा न कर पाने की सूरत में मिली नाकामी से लोगों का ध्यान हटाने में सांप्रदायिकता से मदद मिलती है.
जैसा कि मोदी ने वादा किया था और अगर 2018 तक अच्छे दिन नहीं आ पाए तो वे आदित्यनाथ की मेहनत के शुक्रगुजार होंगे.
लेकिन फिलहाल सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाले लोगों की बयानबाज़ी से प्रधानमंत्री के हित इतनी जल्दी नहीं सधने वाले हैं.

'सांस्कृतिक' एजेंडा:
अगर नौकरी और तरक्की चाहने वाले वोटर आखिरकार राजनीतिक हिंदुओं में बदल जाएं तो आदित्यनाथ की पीठ ठोंकने और शिक्षा समेत अन्य क्षेत्रों में संघ के 'सांस्कृतिक' एजेंडे को जगह देने की रणनीति लंबे समय में कारगर हो सकती है.
लेकिन मौजूदा हालात के मद्देनज़र देखें तो इस उबाल के हमेशा ही ख़तरे रहेंगे.
इसलिए सवाल उठता है कि मोदी सामाजिक समरसता के ताने-बाने में छेड़छाड़ के लिए क्यों ख़तरा उठाने को तैयार हैं.
ख़ासकर तब जब कि अर्थव्यवस्था के सुधार की दिशा में उनका काम बमुश्किल शुरू ही हुआ है.

संघ परिवार:
कहीं नरेंद्र मोदी को यह अहसास तो नहीं हो गया कि जो जिम्मेदारी उन्होंने ले ली है, उसे पूरा करना आसाना काम नहीं है.
सवाल यह भी है कि क्या वे अपने चुनावी वायदों को पूरा कर पाने की अपनी काबिलियत पर भरोसा खोने लगे हैं?
या, संघ परिवार को अनुशासित करने के लिए जिस तरह के प्रभाव की जरूरत है, वो उनके पास नहीं है?
शायद मोदी उतने अच्छे 'प्रशासक' नहीं है जितना उनके समर्थकों ने उन्हें मान लिया था. या शायद वे उत्तर प्रदेश या फिर किसी और जगह उभर रहे ख़तरे के संकेतों को पहचान नहीं पा रहे हैं.
साफ लफ़्ज़ों में कहूं तो मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि उनकी ख़ामोशी और हाथ पर हाथ धरे बैठने की क्या वजह है.
लेकिन अगर वो अपनी चुप्पी नहीं तोड़ते हैं और नफ़रत की ज़बान बोलने वालों की सार्वजनिक आलोचना नहीं करते तो भारत के लिए आने वाले दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं.


-सिद्धार्थ वरदराजन वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

Tuesday, December 09, 2014

कर्नाटक के राजस्व मंत्री सतीश जर्कीहोली ने अंधविश्वास के विरुद्ध साथियों सहित श्मशान में गुजारी एक रात


आजादी के 67 वर्ष बाद आज भी देश में बड़ी संख्या में लोग अंधविश्वासों के शिकार होकर भूत-प्रेत तथा जादू-टोने के चक्कर में उलझे हुए हैं। इसी कारण बहुत से लोग रात को कब्रिस्तानों अथवा श्मशानघाट में जाना या उनके निकट से गुजरना अच्छा नहीं समझते।

एक अंधविश्वास यह भी है कि नदियों में बहाए जाने वाले दीपक आत्माओं को श्मशान तक आने का रास्ता दिखाते हैं। जादू-टोना करने वाले वहां तरह-तरह के अनुष्ठान करते रहते हैं। अंधविश्वासी लोग बुरी शक्तियों से बचाव के नाम पर या गड़ा धन आदि प्राप्त करने के लिए भी तरह-तरह के अनुष्ठान ऐसे लोगों से श्मशानघाटों आदि में करवाते रहते हैं।

आम लोग तो अंधविश्वासों के कारण दिन के समय भी श्मशानघाट पर जाने से संकोच करते हैं लेकिन ये लोग रात के समय भी वहां चैन की बांसुरी बजाते हैं। इन तथाकथित जादू-टोना करने वालों की ‘साधनाओं’ में काले मुर्गे की बलि चढ़ाकर मांस-मदिरा का प्रसाद चढ़ाना और निर्वस्त्र होकर ‘शव साधना’ करना आदि शामिल होता है।

लोगों के मन से इसी अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने के लिए कर्नाटक के राजस्व मंत्री सतीश जर्कीहोली ने 6 दिसम्बर की रात अपने सैंकड़ों साथियों के साथ बेलगावी के श्मशान ‘वैकुंठ धाम’ में बिताई। यहां 24 शवदाह स्थल हैं। यहां उन सब लोगों ने रात का खाना भी खाया।

कर्नाटक विधानसभा में अंधविश्वास निरोधक विधेयक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सतीश जर्कीहोली ने कहा ‘‘यहां रात बिता कर पहले तो मैं इस गलतफहमी को तोडऩा चाहता था कि श्मशान जैसी जगहों पर भूत रहते हैं और दूसरी बात यह कि मैं इससे जुड़ा भय समाप्त करना चाहता हूं क्योंकि वास्तव में श्मशानघाट पवित्र स्थान होता है। सत्ता में न रहने के बाद भी मैं अंधविश्वासों के विरुद्ध अपना मिशन जारी रखूंगा।’’

सतीश जर्कीहोली ने यह भी कहा ‘‘यदि लोग अंधविश्वासों का मुकाबला नहीं करेंगे तो तथाकथित पिछड़े वर्गों तथा अनपढ़ लोगों को कभी भी न्याय नहीं मिल पाएगा। बिल गेट्स विश्व के सर्वाधिक  अमीर व्यक्तियों में से एक हैं परंतु वह पूजा नहीं करते और मैं भी नहीं करता, हालांकि मेरा 600 करोड़ रुपए वार्षिक का व्यवसाय है।’’

जादू-टोने के संबंध में विडम्बना यह है कि सिर्फ अनपढ़ और आम लोग ही नहीं बल्कि स्वयं को पढ़े-लिखे और बुुद्धिजीवी कहने वाले तथा राजनीतिज्ञ और फिल्म जगत से जुड़े लोग भी अंधविश्वासों को मानने वालों में शामिल हैं।

अंधविश्वासी राजनीतिज्ञों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दियुरप्पा का नाम उल्लेखनीय है जो अपनी ‘शत्रु दुष्टआत्माओं के नाश’ के लिए फर्श पर कई-कई रात निर्वस्त्र सोने के अलावा गधे आदि की बलि भी देते रहे हैं।

बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएं इतनी मजबूत है कि अंधविश्वासों के विरुद्ध अभियान चलाने वाले महाराष्ट्र के समाजसेवी नरेंद्र दाभोलकर की अगस्त 2013 में उनके विरोधियों ने पुणे में गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली परम्पराओं पर रोक लगाने संबंधी विधेयक पारित करने के लिए मजबूर हुई है जो नरेंद्र दाभोलकर के 25 वर्षों के अनथक प्रयासों का ही परिणाम है।

सतीश जर्कीहोली का यह प्रयास भूत-प्रेतों के अस्तित्व के संबंध में व्याप्त जनभ्रांतियां दूर करने की दिशा में एक अच्छा पग है। जिस तरह महाराष्ट्र सरकार ने ‘अंधविश्वास निरोधक विधेयक’ पारित किया है उसी प्रकार कर्नाटक व अन्य राज्यों की सरकारों को भी ऐसे विधेयक पारित करने चाहिएं ताकि भोले-भाले लोगों को ऐसे ढोंगी लोगों के छल-प्रपंच में फंसने और अपना शोषण कराने से बचाया जा सके।

Monday, December 08, 2014

लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने


जब अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट से पूछा गया कि वो निकारागुआ के तानाशाह अनास्तासियो समोज़ा की इतनी खुलकर हिमायत क्यों करते हैं तो उन्होंने कहा, "हाँ, वे हरामज़ादे हैं पर वो हमारे हरामज़ादे हैं."
साध्वी निरंजन ज्योति, भारत, केंद्रीय राज्य मंत्री

अब अगर साध्वी निरंजन ज्योति रूज़वेल्ट नहीं हैं तो इसमें उनका क्या कसूर. रूज़वेल्ट ने तो माफ़ी भी नहीं माँगी थी.
साध्वी जी ने तो यह कहने पर माफ़ी भी माँग ली कि "अब आपको यह तय करना है कि रामज़ादों को चुनेंगे कि......को."
मगर क्षमा चाहने के बाद भी पढ़े-लिखे लोग बेचारी साध्वी के पीछे लठ लिए घूम रहे हैं, ये कैसा अन्याय है?
अगर फूड प्रोसेसिंग का मंत्री भी फूड फॉर थॉट नहीं उगल सकता तो फिर कद्दू का मंत्री.
बयान का इनाम:

वैसे सलाम है आप सबकी बुद्धि को. अगर गुजरात का कोई शहरवासी 2002 के दंगों पर अफ़सोस करते हुए ये कहे कि अगर कार के पहिए के नीचे कोई पिल्ला भी आ जाए तो दुख तो होता है तो आप उसे प्रधानमंत्री चुन लेते हो.
अगर मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के संदर्भ में अमित शाह जैसा पढ़ा-लिखा शहरी बाबू ये कहे कि ये सम्मान और बदले की भावना का मामला है तो नफ़रत फैलाने के जुर्म में चुनाव आयोग की तरफ़ से चुनावी भाषणों पर पाबंदी के बाद भी सत्ता चलाने वाली पार्टी अमित जी को अपना प्रधान बना लेती है.
अगर कोई आदरणीय गिरिराज सिंह ये कहे कि जो मोदी का विरोधी है वो गद्दार है उसे भारत छोड़ के पाकिस्तान में बस जाना चाहिए तो इनाम में उसे कोई केंद्रीय मंत्रालय थमा दिया जाता है.
साध्वी पर ग़ुस्सा:
आप शहरवासियों का ग़ुस्सा बस गाँव की एक बेचारी साध्वी निरंजन ज्योति पर ही क्यों निकलता है?
जिन लोगों में वो दिन-रात उठती-बैठती हैं, उन्हें जो कुछ जितना भी सिखाया-पढ़ाया गया है और जो नज़रिया बताया गया है उसी का तो वो पालन कर रही हैं.
अगर आप लोगों का कुम्हार पर वश नहीं चल रहा है तो गदहे के कान क्यों मरोड़ते हैं?
पाकिस्तानियों का दिल

आपसे ज़्यादा खुले दिल के लोग तो पाकिस्तान में हैं.
इमरान ख़ान भरे जलसे में नवाज़ शरीफ़ को चोर और जरदारी को लुटेरा कहते हैं. मौलाना फ़जलुर्रहमान इमरान ख़ान को यहूदी एजेंट और जरदारी इमरान ख़ान को एजेंसियों का आदमी कहते हैं.
यहाँ कोई भी खुलकर किसी को गद्दार और देशद्रोही कह सकता है, उसे मुसलमान मानने से इनकार कर सकता है. पर मजाल है किसी के माथे पर शिकन आ जाए.
और आप हैं कि ख़ुद को विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी कहते हैं लेकिन लोकतंत्र के इस बुनियादी नियम को भी नहीं समझते कि जो आदमी के मन में है वही ज़बान पर भी होना चाहिए. अगर इतनी भी आज़ादी न हो तो कैसा लोकतंत्र.
प्रार्थना:
भाइयों मेरी इतनी सी प्रार्थना है कि निरंजन ज्योति के मामले में ऐसे उतावले न बनिए.
अगले चुनाव तक वो भी शहरी नियमों से परिचित हो जाएंगी और जब वो ये कहेंगी कि आपको बिना ह के रामज़ादों और ह वाले रामज़ादों में से किसी एक का चुनाव करना है तो फिर आप समेत हर कोई ताली बजाकर कहेगा कि वाह! क्या लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने...
-वुसतुल्लाह ख़ान

Friday, August 15, 2014

सांप्रदायिक दंगे और अखबारों की भूमिका: एक पड़ताल


सांप्रदायिकता का खबर बन जाना खरनाक नहीं है, खतरनाक है खबरों का सांप्रदायिक बन जाना। यह रिपोर्ट दंगों के दौरान अखबारों की सांप्रदायिक मन-मिजाज की पोल खोलती है।  

कांग्रेस
और दूसरी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियां हिंदुत्व की डगर पर बढ़ रही हैं तो भी उनमें एक हल्की शर्म या झिझक अक्सर दिखाई दे जाती है। लेकिन, लगता है कि हमारे 'निष्पक्ष’ मीडिया में अब ऐसी कोई शर्म या झिझक बाकी नहीं है। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा की जमीन तैयार करने, फिर अल्पसंख्यकों के सुनियोजित संहार और बलात्कार की घटनाओं पर पर्दापोशी करने, भगवा ब्रिगेड की हर कारगुजारी को जेनुइन ठहराने, सांप्रदायिक नेताओं को हीरो बनाने, उत्पीडि़तों को अपराधी ठहराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांगों को उत्पीडऩ साबित करने में मीडिया ने कोई कसर नहीं उठा रखी है। हिंदी के प्रमुख अखबारों के मुजफ्फरनगर-शामली संस्करण देखकर लगता है कि कॉरपोरेट के हाथों संचालित और निष्पक्ष व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले ये अखबार अगर ऐसी भूमिका अदा कर रहे हैं तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अब ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य की जरूरत ही क्या है? 

दैनिक जागरण इस इलाके का सबसे ज्यादा प्रसारसंख्या वाला अखबार है और इसका आरएसएस/भाजपा संबंध जगजाहिर है। संघ के दफ्तरों में इस अखबार के बाकायदा पारायण की परंपरा रही है। 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के कवाल गांव में हुई तीन युवकों की हत्या की खबर लिखने में इस अखबार ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। गौरतलब है कि पास ही के गांव मलिकपुर माजरा निवासी सचिन और उसके फुफेरे भाई गौरव ने कवाल में शाहनवाज की हत्या कर दी थी और फिर भीड़ ने इन दोनों जाट युवकों की भी मौके पर ही हत्या कर दी थी। पिछले कई महीनों से मुजफ्फरनगर व शामली जिलों में मुसलमानों पर एक के बाद एक हमलों के जरिये बड़े दंगे की कोशिशों में जुटी आरएसएस-बीजेपी की टीम ने इस दुर्भाग्यपूर्ण वारदात को तपाक से लपक लिया था और इसे छेडख़ानी की वारदात से जोड़कर जाटों के स्वाभिमान का सवाल बना दिया था। दैनिक जागरण के 28 अगस्त के अंक में इस बारे में छापी गई एक खबर का भड़काऊ शीर्षक था- 'सीने पर चढ़कर काटी थी सांसों की डोर’। इस बेहद आपत्तिजनक भाषा में लिखी गई खबर के बीच में बाकायदा 'लाइव’ लिखी डिब्बी भी लगाई गई थी, मानो संवाददाता मौके पर बैठकर घटनाक्रम का आखोंदेखा वर्णन कर रहा हो। 

जाटों और बाकी हिंदू जातियों के गुस्से को भड़काने में इस खबर और दोनों जाट युवकों की हत्या के नाम पर फैलाई गई एक फर्जी वीडियो क्लिप की बड़ी भूमिका रही। जाट बहुल गांवों में योजनाबद्ध ढंग से अल्पसंख्यकों को घेरकर उनकी हत्याओं, महिलाओं के साथ बलात्कार, घरों में आगजनी की वारदातों और इन गांवों से करीब एक लाख मुसलमानों के भागकर कैंपों व सुरक्षित रिश्तेदारियों में पहुंचने के बाद भी अखबार का रवैया उत्पीडि़तों को ही प्रताडि़त करने और इस भयानक हिंसा को वाजिब ठहराने का रहा। कैंपों में पड़े लुटे-पिटे मुसलमानों का मजाक बनाने और उन्हें मुआवजे के लालच में वहां पड़े होने की बातें कमोबेश सभी अखबार छाप रहे हैं लेकिन दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को एक खबर के शीर्षक में सारी सीमाएं पार कर दीं। शीर्षक था- 'शरणार्थी शिविर में मौज मना रहे हैं दो हजार मुफ्तखोर’। 

अखबारों का यह रवैया आकस्मिक नहीं था। लगता था कि आरएसएस ने गांवों में लंबी तैयारियों के साथ ही अखबारों को भी पहले ही पूरी तरह पटा लिया था। अव्वल तो रामजन्मभूमि के नाम पर चले आंदोलन में ही संघ मीडिया को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में कामयाब रहा था। तब हिंदी पट्टी के शहरों-कस्बों के बहुत सारे पत्रकार बाकायदा रामजन्मभूमि आंदोलन समिति का हिस्सा थे और खबरों में ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों व राज्य की खुफिया एजेंसियों से संघ की योजनाओं को मदद दिलाने में भी भूमिका निभा रहे थे। बाद में, संघ शावकों के लिए सरकारी दफ्तरों की तरह ही अखबारी दफ्तरों में भी लुकाछिपी के बजाय खुलकर खेलने का दौर आया और वे मीडिया हाउसों के संपादक व महाप्रबंधक जैसे पदों पर छा गए। और अंतत: रिपोर्टिंग का रुख ऐसा बदला कि संघ और भाजपा नेताओं की हिंसक व राष्ट्रविरोधी कारगुजारियां लोगों और संघ से ताल्लुक न रखने वाले नए पत्रकारों को भी राष्ट्रवादी व सहज लगने लगीं। मुजफ्फरनगर-शामली की सांप्रदायिक हिंसा में यही हुआ। मोदी की गुजरात सरकार के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को जेल से जमानत दिलाकर मिशन यूपी पर भेजा गया तो पूरे प्रदेश में सांप्रदायिक वारदातों की बाढ़-सी आ गई। मुजफ्फरनगर-शामली जिलों में पिछले कई महीनों से जगह-जगह मुसलमान युवकों की पिटाई, रेलों व बसों में उन पर हमलों, मस्जिदों, मदरसों में तोडफ़ोड़, जमातियों व देवबंद मदरसे के छात्रों के साथ दुव्र्यवहार की वारदातें लगातार अंजाम दी जा रही थीं और संघ व भाजपा के नेता-कार्यकर्ता ऐसी किसी भी घटना को दंगे में तब्दील करने के लिए खुलेआम कोशिश करते दिखाई दे रहे थे तो भी मीडिया ने कभी उनकी भूमिका को प्रश्नांकित करने की कोशिश नहीं की। उलटे जब भी हमलावरों पर कार्रवाई की नौबत आई तो अखबार भगवा ब्रिगेड की 'एकतरफा कार्रवाई’ के सुर में सुर मिलाते नजर आए। 

शामली के एसपी (अब पूर्व) अब्दुल हमीद के मुसलमान होने को निशाना बनाकर माहौल गरमाए रखने और मामूली बातों को लेकर शामली को दो बार आग में झोंक दिए जाने की भाजपा विधायकों हुकुम सिंह और सुरेश राणा की ओछी हरकतों को अखबारों ने पूरा-पूरा सहयोग दिया। ऐसे अखबारों से यह उम्मीद की ही नहीं जा सकती थी कि वे गांवों में त्रिशूल-तलवारें बांटे जाने और एक बड़ी हिंसा की पटकथा तैयार कर लिए जाने की पोल खोलते। 

आखिर, सभी अखबारों ने आंखें मूंदकर संघ के पहले से तैयार इस सिद्धांत पर मुहर लगाई कि दंगे की वजह कवाल कांड को लेकर एकतरफा कार्रवाई के विरोध में उपजा गुस्सा था। प्रदेश सरकार और उसके मंत्री खासकर आजम खां और पूर्व मंत्री अमीर आलम खान पर सरकारी मशीनरी के हाथ-पांव बांध देने और सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाने को दंगों का कारण बताया गया। बेशक, सपा सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में होनी ही चाहिए लेकिन अखबारों ने यह जानना-बताना जरूरी नहीं समझा कि कवाल कांड से पहले की तमाम वारदातें और कवाल कांड से लेकर सात सितंबर की महापंचायत के बाद व्यापक पैमाने पर शुरू हुई हिंसा के बीच संघ व भाजपा के नेता क्या कर रहे थे। क्या पंचायतों-महापंचायतों के मंच उनके हाथों में नहीं आ गए थे? क्या शांति की बात भी करने वाले किसी भी नेता को वे सरेआम बेइज्जत नहीं करा रहे थे? क्या जगह-जगह मुसलमानों पर हुए हमलों में उनके नेटवर्क की कोई भूमिका नहीं थी? क्या महापंचायत में पहुंच रहे युवक खुलेआम हथियार लहराते हुए और मुसलमानों के खिलाफ अश्लील-आक्रामक नारेबाजी नहीं कर रहे थे? क्या बीजेपी और संघ परिवार के नेताओं के संचालन में हुई इन पंचायतों में मुसलमानों को सबक सिखाने के आह्वान नहीं किए गए? अखबारों ने बीजेपी नेताओं या खापों-पंचायतों के मुखियाओं से नहीं पूछा कि जाटों के गांवों की गरीब आबादियों जो हर हाल में उनकी जी-हुजूरी में थे, के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर सामूहिक हिंसा, बलात्कार और आगजनी के लिए आजम खां कैसे जिम्मेदार हो गए। अगर उस चैनल के प्रायोजित और हास्यास्पद स्टिंग को सच मान लें कि पुलिस को कार्रवाई न करने के लिए कहा गया था तो गांवों के इतने 'इंसाफपसंद’ चौधरी क्या कर रहे थे? लेकिन अखबारों ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी हिंसा की आड़ के तौर पर एकतरफा कार्रवाई के जुमले को रट लिया था।

धुर उत्तराखंड तक पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसी जमाने में एकतरफा धाक रखने वाले अमर उजाला को मेरठ-मुजफ्फरनगर के खेतों की डोल तक पर बैठकर पढ़े जाने का घमंड था। अमर उजाला की मेरठ यूनिट और भारतीय किसान यूनियन के मरहूम नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के सितारे एक साथ और एक-दूसरे के सहारे बुलंदी की तरफ बढ़े थे। इस सांप्रदायिक हिंसा को अमर उजाला ने शायद इन गांवों में अपना खोया रुतबा दोबारा हासिल करने का मौका समझा हो या फिर यह संघ की नेटवर्किंग और इस इलाके में ताकतवर जाटों के दबाव का नतीजा हो कि उसने भी गांवों में हुई भयानक हिंसा की तथ्यपरक रिपोर्टिंग करने के बजाय इसे जेनुइन और स्वाभाविक प्रतिक्रिया साबित करने की कोशिशों को ही प्रमुखता दी। सात सितंबर को महापंचायत से लौटते लोगों के साथ जौली नहर के पास मुसलमानों से टकराव को किसी जमाने में सरयू नदी का पानी कारसेवकों के खून से लाल हो जाने जैसे मिथ की तरह पेश किया जा रहा था। अफवाहें फैला दी गईं कि कई सौ जाटों को मारकर नहर में फेंक दिया गया है। ऐसे में इस अखबार ने पहले पेज पर एक समाचार प्रमुखता के साथ छापा कि जौली नहर पर पंचायत से लौटते लोगों पर हमला नक्सली हमले जैसा था। लेकिन, यह नहीं बताया कि आखिर कुल कितने लोगों की मौत हुई और कितने लोग लापता हैं। किसी भी अखबार ने इस तथ्य पर प्रकाश डालने की जरूरत नहीं समझी कि इस इलाके में भी जो लोग मारे गए, उनमें दोनों ही संप्रदायों के लोग थे। लांक गांव की भयंकर हिंसा से किसी तरह जान बचाकर आए अल्पसंख्यक जिस प्रधान सुधीर कुमार उर्फ बिल्लू पर दंगाइयों के नेतृत्व करने का आरोप लगा रहे थे, अमर उजाला 12 सितंबर के अंक में उसे राहत कार्य तेज कर देने वाले मसीहा की तरह पेश कर रहा था। दंगों के शिकार गरीब अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनहीनता का आलम यह था कि 15 सितंबर को एक खबर का शीर्षक था- 'अस्पतालों में तीमारदारों ने हंगामा काटा’। इसी अखबार ने 19 सितंबर को पहले पेज पर 'पुलिस पर हमलों तक के मुकदमे नहीं’ शीर्षक से स्टोरी प्रकाशित की जिसका लब्बोलुआब यह था कि आजम खां के दबाव में पुलिस इतनी बेबस थी कि सिपाही को गोली लगने और हिंसक भीड़ से घिरे अफसरों के मुकदमे भी दर्ज नहीं हो सके। मतलब, मुसलमानों को कुछ नहीं कहा जा रहा है लेकिन, ऐसी किसी खबर के लिए कोई जगह नहीं थी कि कई गांवों में आगजनी, हत्याओं और बलात्कार के समय पुलिस चौधरियों के घर पर चाय पीती रही थी, उत्पीडि़तों के मुकदमे दर्ज करने के बजाय पुलिस उन्हें धमकाकर एफिडेविट ले रही थी और पुलिस के आला अफसरों के बयान और गतिविधियां इतनी संदेहास्पद थीं कि जांच की मांग करती थीं।

एक मुस्लिम बहुल गांव से पलायन कर कमालपुर गांव में शरण लेने वाले दलितों को बीजेपी ने लगातार कवच की तरह इस्तेमाल किया। मानो, सांप्रदायिक दंगों में हिंदुओं के शिकार होने के लिए संघ-बीजेपी के सांप्रदायिक अभियान जिम्मेदार न हों। सच्चाई तो यह है कि संघ-भाजपा को अपने हिमायती के तौर पर देख रहे जाटों को हिंसा के लिए उकसाने, उनके गांवों का तानाबाना झुलसा देने, उन्हें मुकदमों में फंसा देने और उन्हें आसान मोहरा बना लेने के लिए इन्हीं ताकतों की साजिशें जिम्मेदार थीं। कमालपुर में शरणार्थी दलितों को ईख के खेत में झुकाकर दौड़ाते हुए एक फोटो खींचा गया जिसका अमर उजाला में कैप्शन लगाया गया कि जंगलों में मारे-मारे घूमते दलित। थोड़ा-सा भी विवेक रखने वाला आदमी ऐसे फोटो की असलियत समझ सकता है। बाद में 19 सितंबर को ऐसा ही एक फोटो खेतों की तरफ भागते लोगों का छापा गया कि किस तरह जाटों के गांवों के लोग पुलिस के डर से खेतों में भागे फिर रहे हैं। सवाल उठता है जो पत्रकार किसी तरह जंगलों में जाकर ऐसी कवरेज कर रहे थे, वे कस्बों में शिविरों में पड़े लोगों का दर्द क्यों नहीं सुन पा रहे थे। सामूहिक बलात्कार की खबरों को क्यों दबाया जा रहा था जबकि सोशल साइट्स और फैक्ट फाइंडिंग कमेटियों के दस्तावेजों में पीडि़त युवतियों की दास्तान दर्ज हो रही थी? काफी दिनों बाद किसी तरह पुलिस ने बलात्कार के छह मुकदमे दर्ज किए तो इन शिकायतों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने वाली खबरें छापी गईं।

अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान आदि सभी अखबार एक ही लाइन पर चलते रहे। हिंदुस्तान के मेरठ इकाई के संपादक ने 15 सितंबर को इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के बहाने से मुख्य खबर का शीर्षक लगाया, 'पुलिस की एकतरफा कार्रवाई से हुई हिंसा’। 18 सितंबर को इसी अखबार ने मुखपृष्ठ की बॉटम स्टोरी छापी- 'हिंदुस्तान ने किया था खुलासा, क्यों भड़का दंगा’। इस खुलासे में वही रटे-रटाए जुमले 'एकतरफा कार्रवाई’ और 'नेताओं की सियासत’ उठाए गए थे। एकतरफा कार्रवाई मतलब मुसलमानों की तरफदारी और नेताओं की सियासत मतलब आजम खां? बीजेपी-संघ की भी कोई सियासत रही होगी या ये संगठन भजन-कीर्तन में जुटे थे? बाद में बीजेपी के दो विधायक सुरेश राणा और संगीत सोम गिरफ्तार हुए तो ये अखबार इन विधायकों के पम्फलेट में बदल गए। प्रदेश सरकार ने इन दोनों को हीरो बनने का पूरा मौका दिया। 20 सितंबर को सुरेश राणा ने गिरफ्तारी दी तो अमर उजाला ने किसी नेता के मंत्री, राज्यपाल आदि बनने पर छापे जाने वाले विस्तृत जीवनचरित के अंदाज में खबर छापी- 'आंदोलन से सुर्खियों में आए थे राणा’। इसमें बताया गया कि 1997-98 में जलालाबाद (शामली जिले का एक कस्बा) में प्रतिमा क्षतिग्रस्त करने के मामले से राणा सुर्खियों में आए थे। कायदे से खबर का शीर्षक होना चाहिए था- 'धार्मिक मुद्दों पर सांप्रदायिक खेल की उपज हैं राणा’। इसी अखबार ने उनकी पत्नी नीता सिंह का बयान छापा - 'मुझे गिरफ्तारी पर गर्व है’। सांप्रदायिक दंगों के आरोपी विधायक के समर्थन में पत्नी के फोटो और बयानों के बहाने भावुक माहौल बनाने का अखबारों का अभियान लगातार जारी है। करवा चौथ पर हिंदुस्तान ने राणा की पत्नी नीता सिंह का पीले बाने में फोटो छापा और किसी राजपूतानी वीरांगना के अंदाज वाला उनका बयान छापा कि उन्हें देश की सुरक्षा की सरहद पर जाने वाले सैनिक की पत्नी जैसा महसूस हो रहा है। इन दोनों में से एक विधायक को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया तो एक अखबार ने उसकी पत्नी का बयान छापा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भी 14 साल के लिए वनवास पर गए थे। संगीत सोम ने 21 सितंबर को गिरफ्तारी से पहले सभा की जिसकी खबरें और तस्वीरें अखबारों ने किसी महान रणबांकुरे की गाथा की तरह पेश की। इस बारे में 22 सितंबर के दैनिक जागरण के कुछ शीर्षक देखिए- 'जनसैलाब के बीच सोम गिरफ्तार’, 'खून की नदी पर नाव चलाना चाहती है सरकार’’, 'कोई जेल ज्यादा दिन नहीं रोक सकती मुझे’। आलम यह है कि दोनों विधायकों की हीरो छवि बनाने के लिए इन बड़े अखबारों में प्रतिद्वंद्विता चल रही है। उनकी हर तारीख, हर पेशी अखबारों में उनकी वंदना में तब्दील हो जाती है। इन दोनों के आजम खां पर हमले और अपनी कारगुजारियों पर गर्व भरे वही बयान पांच-पांच, सात-सात कॉलम में दोहराने की रस्म इन अखबारों ने तय कर ली है। साथ में समर्थकों के बहाने भी कई-कई फोटो छापे जाते हैं। उनसे पूछे जाने वाले सवाल भी किसी पत्रकार के बजाय किसी संघ कार्यकर्ता के प्रायोजित सवालों जैसे होते हैं।

मुजफ्फरनगर-शामली पहुंच रहे इन अखबारों की इन दिनों की दैनिक सुर्खियों में हिंसा के आरोपियों को बचाने के लिए जाटों की लामबंदी भी जोरशोर से शामिल है। इतने बड़े पैमाने पर हिंसा, बलात्कार और अल्पसंख्यकों के पलायन का कोई दोषी है या बस यही सच्चाई है कि निर्दोषों को फंसाकर जाटों का उत्पीडऩ किया जा रहा है? अखबार इन चौधरियों और आंदोलकारी जाट महिलाओं से नहीं पूछते कि चलिए निर्दोषों को फंसा दिया गया है तो असली हत्यारे, बलात्कारी कौन हैं, आप बताइए? उलटे आलम यह है कि आंदोलन जाटों से ज्यादा इन अखबारों के कंधों पर है। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को पूरे पेज पर फैलाकर शीर्षक लगाया- 'दो-दो सरकारें आईं पर जाटों का दर्द किसी ने न जाना’। इस शीर्षक के नीचे खरड़, लिसाढ़, सिसौली, फुगाना, मुंडभर, लांक, डुंगर, बहावडी, काकडा, कुटबा, भाज्जु आदि जाट बहुल गांवों के चौधरियों के फोटो व बयान सजाए गए कि जाटों के साथ एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। संघ-बीजेपी को अपनी इस हिंसक इंजीनियरिंग में गठवाला खाप के मुखिया हरकिशन की खुली मदद मिली है। लिसाढ़ गांव में बलात्कार की शिकार हुई युवतियां इस मुखिया के बेटे का नाम भी ले रही हैं। हरिकिशन पर मुकदमे कायम किए गए हैं तो अखबार उसकी उम्र और सामाजिक हैसियत का गुणगान कर रहे हैं। हिंदुस्तान ने 18 सितंबर को ही गब्बरनुमा शीर्षक दिया- 'सो जा...नहीं तो पुलिस आ जाएगी’। गांव-गांव की महिलाओं के 'आंदोलन’ की खबरें एकत्रित करने के बजाय अलग-अलग पन्नों पर फैलाई जा रही हैं। कई-कई फोटो छापे जा रहे हैं जिनमें महिलाओं के हाथों में तमंचे, लाठी, डंडे लहरा रहे होते हैं। तीन अक्टूबर के दैनिक जागरण में एक ऐसे ही फोटो के साथ शीर्षक छापा गया- 'महिलाओं व बच्चों ने थामे लाठी और तमंचे’। साथ में मोटे-मोटे अक्षरों में पूरा हुनर उडेल दिया गया- 'अपने सुहाग और बेटों की फर्जी नामजदगी को लेकर मुजफ्फरनगर और मेरठ की महिलाएं देहरी लांघ सड़कों पर उतर आई हैं। उनका आक्रोश चंडी का रूप धारण करता जा रहा है। मीठे बोल झरने वाली जुबान मुर्दाबाद रूपी आग उगल रही है। चुनरी के बोझ से झुक जाने वाले कंधे सरकार के नुमाइंदों के पुतले ढो रहे हैं। चूडिय़ों की खनखनाहट नारेबाजी के शोरोगुल में खो गई है। मेहंदी रचे हाथों में लाठी, डंडे और तमंचे तक लहरा रहे हैं।’ 

राहत शिविरों के 15-17 युवाओं के आइएसआइ के संपर्क में होने के राहुल गांधी के बयान पर नरेंद्र मोदी सवाल खड़ा कर रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी के नेता तो आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं। काली वर्दी के कमांडो जैसे लोगों के बार-बार गांवों में दिखाई देने के प्रचार को जिस तरह मीडिया की मदद से खड़ा किया गया है, उसके पीछे संघ का दिमाग ही लगता है। हिंदुस्तान ने राहुल का बयान आते ही सीना ठोकने में देरी नहीं लगाई कि वह तो पहले ही ऐसा कह रहा था। दैनिक जागरण ने 23 सितंबर को 'जाटलैंड पर जमी नागपुर की नजर’ शीर्षक से लिखा कि संघ ने पूरे रिसर्च के साथ गांव-गांव में सामाजिक व जाति संगठनों की मदद से अपने कार्यकर्ता उतार रखे हैं। उधर, बीजेपी नेताओं को आक्रामक बने रहने के लिए कहा गया है। बीजेपी के सतपाल मलिक जैसे नेता धमकी के अंदाज में बोल रहे हैं कि सुरक्षा सेना नहीं पड़ोसी दे सकते हैं। राह चलते लोगों की हत्याओं का सिलसिला जारी है जिसे अखबार 'साइलेंट वार’ करार दे रहा है। खौफ का आलम तारी है लेकिन मुख्यमंत्री के मंत्री चाचा शिवपाल सिंह यादव उत्पीडि़तों के शिविरों में बने रहने पर सवाल खड़े कर रहे हैं और मीडिया तो लगातार ही इन राहत शिविरों को लेकर आक्रामक है ही। 

सवाल यह उठता है कि दंगों की रिपोर्टिंग करने के लिए जरूरी मानकों तक का पालन नहीं कर पाए अखबारों का यही रवैया चलता रहा तो शांति और इंसाफ की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? तथ्यों की तलाश में यहां पहुंची कई टीमों ने अखबारों के इस रवैये पर चिंता भी जाहिर की है। सवाल है प्रेस परिषद शायद इस ओर कब ध्यान देगी और कोई ठोस कदम उठाएगी? अधिकांश मामलों में प्रेस परिषद के निर्देशों को ठेंगा दिखाने के आदी मीडिया घरानों को इस मामले में अदालत तक ले जाया जाए तो शायद ज्यादा बेहतर हो।

और तहलका ... 

हथियारों की खरीद में दलाली को लेकर किए गए स्टिंग के जरिए एनडीए सरकार को हिलाकर रख देने वाले तरुण तेजपाल का तहलका भी मोदी युग तक आते-आते फुस्स हो चला लगता है? इस समूह की हिंदी पत्रिका पाक्षिक तहलका ने 30 सितंबर 2013 को निकाले अपने अंक में मुजफ्फरनगर-शामली दंगों को लेकर जो रिपोर्टिंग की, वह तथ्यों के अन्वेषण के बजाय संघ-बीजेपी द्वारा पहले ही फैला दिए गए फॉर्मूले को पुख्ता करने की हास्यास्पद कोशिश ही साबित हुई। 'फूट डालो राज करो’ शीर्षक से प्रकाशित आवरण कथा के दूसरे पैरे में कवाल में 27 अगस्त को तीन युवकों शाहनवाज, सचिन और गौरव की हत्या का उल्लेख करते हुए लिखा गया, 'इससे पैदा हुई चिंगारी ने हफ्ता बीतते-बीतते प्रचंड सांप्रदायिक ज्वाला का रूप ले लिया।’ यहां हम उम्मीद करते हैं कि शायद आगे जाकर यह साफ होगा कि इतनी बड़ी हिंसा कवाल से उठी चिंगारी के देखते-देखते ज्वाला में बदल जाना नहीं था बल्कि पिछले कई महीनों से संघ-बीजेपी और उनके दूसरे संगठन अमित शाह के नेतृत्व में इसकी तैयारी में जुटे थे। लेकिन कुछ नेताओं और अफसरों के बयानों के जरिये यह तो समझाने की कोशिश की गई कि सूबे की सरकार और उसका मुख्यमंत्री निकम्मे हो गए थे लेकिन संघ-बीजेपी के लिए छठे पैरे में मासूमियत से दो दिलचस्प प्रश्नवाचक वाक्य लिखे गए- 'क्या लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने राजनीतिक रूप से सबसे अहम सूबे में हिंसा भड़काने की साजिश रची? या फिर उसने केवल मौके का फायदा उठाया?’ इस आवरण कथा के लिए जुटे तहलका के तीन-तीन रिपोर्टर (दिवाकर आनंद, वीरेन्द्र नाथ भट्ट और साथ में अशहर खान) इसका जवाब नहीं देते। काश कि वे पिछले कुछ महीनों के अखबारों के स्थानीय पन्ने ही पढ़ डालते जो जगह-जगह मुसलमानों पर हमलों, धर्मस्थलों में तोडफ़ोड़ और भाजपा नेताओं की मुहिमों से रंगे पड़े थे। लेकिन, उन्होंने इसके बजाय जाटों की भावना पर जोर देते हुए लिखा- 'बातें दोनों ही तरह की हो रही हैं, लेकिन कई लोग इस बात से हैरान हैं कि राज्य सरकार जाट समुदाय की भावनाएं समझने में नाकाम रही, वह भी तब जब भाजपा पांच सितंबर को ही जाटों की हत्याओं के विरोध में मुजफ्फरनगर बंद का सफल आयोजन करा चुकी थी।’

बहरहाल, तहलका की पूरी कथा जरूर इस भावना पर केंद्रित रही। यह जिक्र देखिए- 'शाहनवाज वही युवक है जिस पर लड़की का पीछा करने का आरोप था और जिसकी हत्या लड़की के भाइयों ने की थी। इसके बाद लड़की के भाइयों की भी हत्या हो गई थी।’ कवाल कांड में छेडख़ानी के सिद्धांत को लेकर सवाल उठते रहे हैं। शुरू में इसे साइकिल की टक्कर से उपजा विवाद बताया गया था, जैसी बातों पर गौर फरमाना या इसका जिक्र करना तहलका टीम जरूरी नहीं समझती। क्या इसलिए कि इससे 'बहु-बेटी बचाओ’ जिसमें संघ के कारकुनों ने हिंदू शब्द भी जोड़ दिया था, नारा सवालों में आ जाता और सांप्रदायिक हिंसा के स्वत:स्फूर्त और स्वाभिवक गुस्सा होने के फॉर्मुले को खतरा होता? पूरी कथा को चतुराई से उसी तरह लिखा गया है, जिस तरह की मुजफ्फरनगर-शामली के संघ कार्यकर्ता और स्थानीय अखबार बोलते रहे कि पहले मुसलमान ने ये किया, फिर सरकार ने तरफदारी की और फिर ये सब हो गया। 'राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा के मुजफ्फरनगर से मुस्लिम सांसद कादिर राणा ने 30 अगस्त को कथित रूप से एक भड़काऊ भाषण दिया और उसके बाद जिले के उच्च अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। बाद में पुलिस ने उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया।’ वैसे तो यह एक साधारण तथ्य का उल्लेख लगता है लेकिन तथ्य की ही बात करें तो उस दिन मुजफ्फरनगर के खालापार में जुमे की नमाज के बाद हजारों की भीड़ जमा थी। जगह-जगह हमलों, जाटों की 31 अगस्त की पंचायत के ऐलान और बीजेपी नेताओं के तेवरों से पैदा अराजकता के माहौल में बुरी तरह डरे मुसलमानों को कादिर समेत कई मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया था। इसे बीजेपी और उसके इशारों पर नाच रहे जाट नेताओं ने यह कहकर मुद्दा बनाया कि प्रशासन ने धारा 144 का उल्लंघन व भड़काऊ भाषण होने दिए और खुद अफसरों ने वहां पहुंचकर ज्ञापन लिए तो 31 अगस्त की पंचायत को कैसे रोका जा सकता था। लेकिन, इससे पहले ही प्रशासन के साथ भाकियू नेता राकेश टिकैत व कई बीजेपी नेताओं ने वार्ता के बाद पंचायत को स्थगित करने का ऐलान किया था और फिर बीजेपी और उसके जाट नेता इससे मुकर चुके थे। इस सबका जिक्र करने के बजाय तहलका टीम मासूमियत से लिखती है- ''1 अगस्त को क्षेत्र के जाटों ने मिलकर उन मुस्लिम लड़कों के खिलाफ तुरंत पुलिस कार्रवाई करने की मांग की थी जो दो जाट युवकों की हत्या के दोषी थे। जब कुछ नहीं हुआ तो उन्होंने सात सितंबर को एक विशाल बहु-बेटी बचाओ जाट महासभा का आयोजन किया।’’ बेचारे तहलका को पता ही नहीं चला कि 31 अगस्त को नगंला मंदौड में बड़ी पंचायत हुई थी जिसमें जगह-जगह से हथियार लहराते युवकों के जत्थे नारेबाजी करते पहुंचे थे और बीजेपी व संघ नेताओं ने मंच पर कब्जा कर रखा था जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे? उसे यह भी पता नहीं चला कि शांति की बात कर सकने वाले गैर भाजपाई जाट नेताओं को मंच से बोलने ही नहीं दिया गया था और यह भी कि पुलिस की उपस्थिति में ही पंचायत में शामिल युवकों ने एक कार सवार दंपति की हत्या की कोशिश की थी और कार को फूंक दिया था? सात सितंबर की महापंचायत तक क्या-क्या हो चुका था, पांच सितंबर को बीजेपी के बंद के अलावा लिसाढ़ में गठवाला खाप के मुखिया हरिकिशन जो संघ के हाथों की कठपुतली बन चुके थे, भी पंचायत कर अगले घटनाक्रम पर मुहर लगा चुके थे, तहलका को पता नहीं चल सका? 

सात सितंबर की महापंचायत का जिक्र करते हुए तहलका ने फिर से शाहनवाज के 'लड़की छेडऩे’ की बात को दोहराया- ''उस दिन कवाल के पास इंटरमीडिएट कॉलेज के मैदान पर एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठाहुई। इसी स्कूल में मृतक गौरव की बहन पढ़ती है जिसे कथित तौर पर शाहनवाज छेड़ता था।’’ आगे देखिए, ''बताया जाता है कि शाम पांच बजे के करीब इस महापंचायत से लौट रहे लोगों की ट्रैक्टर-ट्रोलियों पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। इस घटना के चश्मदीदों के मुताबिक हमलावरों ने गंग नहर के पास उन पर देसी तमंचे और धारदार हथियारों से हमला किया था।’’ यह नहीं बताया गया कि हथियारबंद युवकों के जत्थे रास्ते भर मुसलमानों को ललकारते-पीटते महापंचायत में पहुंच रहे थे। कई गांवों में टकराव हो चुका था और एक मुसलमान युवक को अगवा कर पंचायतस्थल पर ही उसकी हत्या कर दी गई थी।

लेकिन तहलका की कल्पनाशक्ति और 'गॉशिप जर्नलिज़्म’ के नमूने अभी बाकी हैं। गांवों में हुए कत्लेआम के बारे में यह पत्रिका लिखती है- ''हालात ऐसे हो गए कि हजारों की संख्या में मुसलमानों और जाटों को अपना घर छोड़कर पलायन करना पड़ा।’’ हजारों जाटों ने किन-किन गांवों से पलायन किया, उनके राहत शिविर कहां हैं, यह या तो खुदा जाने या यह पत्रिका। 

इस कथा के अलावा एक स्टोरी 'आपराधिक गड़बड़ी के बारह दिन!’ भी कम दिलचस्प नहीं है। इसमें भी दंगों की जो वजहें गिनाई गईं, उनमें संघ-बीजेपी बरी ही रहे और महीनों से मुसलमानों के खिलाफ चल रही सिलसिलेवार वारदातों का जिक्र तक नहीं आया। महापंचायत से लौट रहे जाटों पर हमलों का जिक्र करते हुए जो लिखा गया, गौरतलब है- ''अगले दिन डेढ़-दो लाख लोगों का जत्था हमले से बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचा तो हालात काबू में रहने की हर संभावना खत्म हो गई।’’ पहली स्टोरी में पत्रिका ने लिखा है कि महापंचायत में ''एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई।’’ लेकिन अगली ही स्टोरी में मुसलमानों के हमले से किसी तरह बच-बचाकर अपने गांवों में पहुंचने वाला जत्था ही डेढ़-दो लाख लोगों का हो गया। तो क्या महापंचायत में पांच-दस लाख लोग थे या सारे के सारे लोग ही जत्था बनाकर जंगलों में मारे-मारे फिरे थे और सात सितंबर को अपने घर नहीं पहुंच पाए थे? फेसबुक पर अफवाहें फैला रहे संघी भी पांच-छह सौ जाटों के गायब हो जाने की बात कर रहे थे। डेढ़-दो लाख जाटों का जत्था एक रात इधर-उधर मारे फिरकर अगले दिन गांवों में पहुंच पाने की अफवाह तो संघी भी जानते हैं, किसी के गले नहीं उतरेगी पर तहलका के अतुल चौरसिया को यह लिखने में कोई कठिनाई नहीं हुई।