Friday, March 30, 2012

मुसलमान टुकड़ों में क्यों बंटे हैं?


‘‘जिन लोगों ने अपने दीन को टुकड़े-टुकड़े कर दिया और गिरोह-गिरोह बन गए, निश्चय ही तुम्हारा उनसे कोई वास्ता नहीं, उनका मामला तो अल्लाह के सुपुर्द है और वही उनको बताएगा कि उन्होंने क्या कुछ किया है।’’ (क़ुरआन--पाक, 6:159) 

इस पवित्र आयत से यह स्पष्ट होता है कि अल्लाह तआला ने हमें उन लोगों से अलग रहने का आदेश दिया है जो दीन में विभाजन करते हों और समुदायों में बाँटते हों। किन्तु आज जब किसी मुसलमान से पूछा जाए कि ‘‘तुम कौन हो?’’ तो सामान्य रूप से कुछ ऐसे उत्तर मिलते हैं, ‘‘मैं सुन्नी हूँ, मैं शिया हूँ, ’’इत्यादि। कुछ लोग स्वयं को हनफ़ी, शाफ़ई, मालिकी और हम्बली भी कहते हैं, कुछ लोग कहते हैं ‘‘मैं देवबन्दी, या बरेलवी हूँ।’’ 

हमारे निकट पैग़म्बर हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मुस्लिम थे। 

ऐसे मुसलमान से कोई पूछे कि हमारे प्यारे पैग़म्बर (सल्लॉ) कौन थे? क्या वह हन्फ़ी या शाफ़ई थे। क्या मालिकी या हम्बली थे

नहीं, वह मुसलमान थे। दूसरे सभी पैग़म्बरों की तरह जिन्हें अल्लाह तआला ने उनसे पहले मार्गदर्शन हेतु भेजा था। 

क़ुरआन--पाक की सूरह 3, आयत 25 में स्पष्ट किया गया है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी मुसलमान ही थे। इसी पाक सूरह की 67 वीं आयत में क़ुरआन--पाक में बताता है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम कोई यहूदी या ईसाई नहीं थे बल्कि वह ‘‘मुस्लिम’’ थे। 

क़ुरआन--पाक हमे स्वयं को ‘‘मुस्लिम’’ कहने का आदेश देता है ।

यदि कोई व्यक्ति एक मुसलमान से प्रश्न करे कि वह कौन है। तो उत्तर में उसे कहना चाहिए कि वह मुसलमान है, हनफ़ी अथवा शाफ़ई नहीं। क़ुरआन--पाक में अल्लाह तआला का फ़रमान हैः 

‘‘और उस व्यक्ति से अच्छी बात और किसकी होगी, जिसने अल्लाह की तरफ़ बुलाया और नेक अमल (सद्कर्म) किया और कहा कि मैं मुसलमान हूँ।’’ (क़ुरआन--पाक, 41:33) 

याद रहे कि यहाँ क़ुरआन--पाक कह रहा है कि 

‘‘कहो, मैं उनमें से हूँ जो इस्लाम में झुकते हैं,’’ दूसरे शब्दों में ‘‘कहो, मैं एक मुसलमान हूँ।’’ 

हजरत मोहम्मद ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब ग़ैर मुस्लिम बादशाहों को इस्लाम का निमंत्रण देने के लिए पत्र लिखवाते थे तो उन पत्रों में सूरह आल इमरान की 64वीं आयत भी लिखवाते थेः 

‘‘हे नबी! कहो, हे किताब वालो, आओ एक ऐसी बात की ओर, जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है। यह कि हम अल्लाह के सिवाए किसी की बन्दगी न करें, उसके साथ किसी को शरीक न ठहराएं, और हममें से कोई अल्लाह के सिवाए किसी को अपना रब (उपास्य) न बना ले। इस दावत को स्वीकार करने से यदि वे मुँह मोड़ें तो साफ़ कह दो, कि गवाह रहो, हम तो मुस्लिम (केवल अल्लाह की बन्दगी करने वाले) हैं।’’ 

इस्लाम के सभी महान उलेमा का सम्मान कीजिए । 

हमें इस्लाम के समस्त उलेमा का, चारों इमामों सहित अनिवार्य रूप से सम्मान करना चाहिए। इमाम अबू हनीफ़ा (रहमतुल्लाहि अलैहि), इमाम शफ़ई (रहॉ), इमाम हम्बल (रहॉ) और ईमाम मालिक (रहॉ), ये सभी हमारे लिए समान रूप से आदर के पात्र हैं और रहेंगे। ये सभी महान उलेमा और विद्वान थे और अल्लाह तआला उन्हें उनकी दीनी सेवाओं का महान प्रतिफल प्रदान करे (आमीन) इस बात पर कोई आपत्ति नहीं कि अगर कोई व्यक्ति इन इमामों में से किसी एक की विचारधारा से सहमत हो। किन्तु जब पूछा जाए कि तुम कौन हो? तो जवाब केवल ‘‘मैं मुसलमान हूँ’’ ही होना चाहिए।


शादी से पहले और शादी के बाद..


अभी शादी का पहला ही साल था,
खुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,
खुशियाँ कुच्छ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभाल रही थी ..
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शरमाते हुए हमें नींद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हमारे बालों में फिराना,
मुस्कुराते हुए कहना की..
डार्लिंग चाय तो पी लो, जल्दी से रेडी हो जाओ, 
आप को ऑफीस भी है जाना.
घरवाली भगवान का रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पर पूरी तरह छायी थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
एक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था..
5 साल बाद........
सुबह सुबह मेडम का चाय ले कर आना,
टेबल पर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,
आज ऑफीस जाओ तो मुन्ना को
स्कूल छोड़ते हुए जाना...
सुनो एक बार फिर वही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोडी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर खुद ही संभाल लेना....
ना जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग़ पर काली घटा छायी थी,
साँस भी लेते हैं तो उन्ही का ख़याल होता है,
अब हर समय जहाँ में एक ही सवाल होता है..
क्या कभी वो दिन लौट के आएँगे,
हम एक बार फिर कुंवारे हो जाएँगे.... ...!

Wednesday, March 28, 2012

ये शरीर मुझे अपना नहीं लगता, घृणा होती है!


सोनी सोरी का पत्र हिमांशु कुमार के नाम

sonisori
आप लोग कैसे हैं. गुरूजी मैं भी एक इंसान हूँ. इस शरीर को दर्द होता है. कबतक ऐसे अन्यायों को सहूँ, सहने की भी सीमा होती है. मुझे पेशी में पेश नहीं किया जा रहा है. ना ही कोई मिलने आ रहे हैं. ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ.
हमें तो ऐसा लगने लगा यदि मुझे कुछ हो भी जाये तो आपको मेरे पक्ष की खबर नहीं मिलेगी बल्कि विपक्ष की खबर मिलेगी. दिनांक १२.३.२०१२ को मेरी हालत गंम्भीर हो चुकी थी जिससे मुझे अस्पताल में भरती किया गया. भर्ती करने के बाद हमपर अनेक तरह का आरोप लगाया गया, ये महिला झूठ बोलती है, जानबूझकर नाटक करती है. इसलिये मैंने कहा था कि इलाज मैं यहाँ नहीं कराउंगी.
अगर मैं नाटक करती हूँ तो मुझे अंदरूनी में दर्द क्यों होता है? मैं तो छत्तीसगढ़ सरकार के लिये एक मजाक बनकर रह गई हूँ. जब मेरा सोनोग्राफी कराया गया, उससे पहले मुझे रोटी सब्जी खिलायी गयी और फिर सोनोग्राफी करायी गयी.सब तो कागजों पर लीपापोती करना था दूसरी बात न्यायालय का भी आदेश पालन नहीं किया गया. 
यदि मेरा चेकअप दिनांक 12 मार्च  से पहले होता तो शायद जो स्थिति पैदा हुई वो नहीं होती . गुरूजी आपके द्वारा दी गई शिक्षा की ताकत से बहुत सा मानसिक शारीरिक प्रताड़ना को सह रही हूँ. अब आपके शिष्य और नहीं सह सकती. दिनांक 6 मार्च  को मेरी पेशी थी.

जेलर मैडम जेलर अधीक्षक  से मेरी बहस हुई है. मैंने कहा कि इन सलाखों के अंदर रहकर हर नियमों का पालन कर रही हूँ. अबतक ऐसा कोई भी नियम का उल्लंघन नहीं किया जिससे आप कह सकें कि तुम गलती कर रही हो. मैं भी एक शासकीय कर्मचारी रही हूँ, इसलिए इतना तो समझती हूँ कि जो अनुशासन बना है उसे पालन करना हमारा अनिवार्य कर्तव्य है. फिर आप लोग मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो. पेशी ना ले जाना, स्वास्थ्य पर ध्यान ना देना, तब कहने लगा जेलर अधीक्षक कि ये सब मेरी जिम्मेदारी नहीं है.
तब मैंने कहा आप मुझे बंदी आवेदन दो ताकि सरकार को लेटर भेजकर पूछना चाहूंगी कि ये सब किसके जिम्मेदारी है. गैर जिम्मेदार व्यक्तियों और प्रशासन की देखरेख में हमें क्यों रखा गया. यदि आगामी दिनों में मुझे कुछ हो जाता है इसके जिम्मेदार कौन है. तब कहने लगा बिल्कुल लिखो जो करना है करो.
लेकिन बंदी आवेदन मांगती हूँ तो दे नहीं रहे हैं. कहते हैं ऐसी कोरा कागज पर लिखो.गुरूजी मैं क्या करूँ छत्तीसगढ़ में तो कानून व्यवस्था बनाये रखने वाले राहुल शर्मा जैसे ऑफिसर  अपमान, प्रताड़ना को सह नहीं पा रहे हैं और वे आत्महत्या कर ले रहे हैं.

आप सोचियेगा, इस वक्त मैं किन-किन हालातों से जूझ रही हूँ. ये शरीर मुझे अपना नहीं लगता, घृणा होती है. गुरूजी आपने हमें छोटे से बड़े होते देखा है. हम क्या थे और क्या हो गए.मिलने के लिये किसी को भेजियेगा, गलती पर क्षमा. छत्तीसगढ़ सरकार की अन्यायों से जूझती आपकी शिष्या की ओर से सभी को चरण स्पर्श, नमस्ते.

आपकी शिष्या

बाजार की गिरफ़्त में मीडिया



आज पूरी दुनियाँ पर बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाजार बहुत ही तेजी के साथ समस्त संसाधनों पर अपना कब्जा जमाता जा रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो या गैर प्राकृतिक हो। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाजार की गिरफ़्त में आ गए हैं यहाँ तक की इंसान भी बाजार की एक वस्तु मात्र बनकर रह गया है।

पूँजीवादी सभ्यता ने साहित्य, कला, संस्कृति यहाँ तक की ज्ञान को भी बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया है। दुनिया के सामने सच की तस्वीर रखने का दावा करने वाली हमारी मीडिया, समाचार पत्र भी आज बाजार की गिरफ्त में आ गए हैं। कभी-2 तो ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता पत्रकारिता न होकर पूँजीपतियों और सरकारों की चाटुकारिता करती नजर आती है। खास तौर से भारत की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोषकों और साम्राज्यवादी ताकतों की ही वकालत करता दिखाई देता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि आज की पत्रकारिता इन्हीं पूँजीपतियों, भ्रष्टाचारियों और जमाखोरों के विज्ञापन के बलबूते जीवित है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आज का प्रकाशक, सम्पादक और पत्रकार जनसेवक नहीं अपितु वह देश के बड़े अमीरों की कतार में खड़ा होना चाहता है। आज का प्रकाशक, सम्पादक व मीडिया कर्मी यह पूरी तरह से भूल गया है कि पत्रकारिता के मायने क्या होते हैं और पत्रकारिता किसे कहते हैं।

भूमण्डलीकरण के इस वर्तमान दौर में भारतीय पत्रकारिता ने बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक दिए हैं वैसे तो भारतीय पत्रकारिता का दायरा बहुत बड़ा है। यही नहीं भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ भी कहा जाता है। इसके बावजूद भी भारतीय पत्रकारिता पूरी ईमानदारी के साथ जनहित में खड़ी होती नजर नहीं आती। पूरा मीडिया जगत जनसरोकारों की जगह बाजार से सरोकार रखने लगा है। अंग्रेजी पत्रकारिता तो तमाम सामाजिक सरोकारांे और नैतिक मूल्यों से पल्ला झाड़कर सीधे-2 बाजार से जुड़ गई है। लेकिन वर्तमान समय में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार भी अंग्रेजी पत्रकारिता के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और इसके चलते उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गई है। भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत के आम आदमी का जीवन कष्टों का पर्याय बन गया है। इससे इनका कोई नाता नहीं है। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्षरत श्रमिकों, किसानों व जन सामान्य के कष्टों से उदासीन हमारे भारतीय भाषाओं के बड़े कहे जाने वाले अखबार आम जनता के संघर्ष से कहीं भी जुड़े हुए दिखाई नहीं देते। सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के जोड़-तोड़ की राजनीति में ही मशगूल हैं। जनता के दर्द से इनका कोई भी लेना देना नहीं रह गया है।

जहाँ तक क्षेत्रीय अखबारों का प्रश्न है वे अपनी साधन हीनता के चलते अपने अस्तित्व को ही बचाने में लगे रहते हैं लेकिन अब इन अखबारों के प्रकाशकों के अंदर भी बाजारवादी मानसिकता घर करने लगी है जो कभी परिवर्तन कामी आन्दोलनकारी भूमिका निभाने की इच्छा रखते थे। अब यह भी बाजार के रंग में रंगने लगे हैं। वर्तमान समय में इन अखबारों के प्रकाशक और पत्रकार स्थानीय व्यापारियों, माफियाओं, सांसदों, मंत्रियों, और छुट-भइये नेताओं के विज्ञापन के नाम पर मोटी रकम काटने के चक्कर में इनकी दलाली व चापलूसी करते फिरते हैं। स्थानीय स्तर पर फूट रहे जन-आन्दोलनों और संघर्षों की रिर्पोटिंग न के बराबर ही करते हैं। यदि करते भी हैं तो आलोचनात्मक रिर्पोटिंग करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यह जन आन्दोलनों को उत्साहित करने की जगह हतोत्साहित करते नजर आते हैं। भारत जैसे देश में, जिसे कृषि प्रधान देश कहा जाता है, जिस देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है उस देश में लगभग 40 हजार किसानों ने पिछले एक दशक के अंदर आत्महत्याएँ कर लीं। बेरोजगारी की मार से आज का शिक्षित युवा वर्ग आत्महत्या करने को विवश है, आई।टी. जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज देश में शिक्षा का निजीकरण दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का व्यक्तिगत क्षेत्र में विलय होता जा रहा है लेकिन वर्तमान समय में पूरे देश की मीडिया मौन खड़ी है। आज जनता शासक वर्ग के खिलाफ दिनों दिन हथियार उठाती जा रही है। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें अपने दमनात्मक अभियानों से उन जन आन्दोलनों को कुचलने का असफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी ये जन आन्दोलन दिनो दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह बात जुदा है कि आज का जन आंदोलन संगठित न होकर अनेक धाराओं में बँटा हुआ है और जनता का भारी समर्थन जुटाने में असफल है। इसके पीछे शासक वर्ग द्वारा मीडिया के माध्यम से किया जा रहा दुष्प्रचार, ज्यादा कारगर साबित हुआ, क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, पूँजीपतियों व साम्राज्यवादी ताकतों से संचालित होता है और शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ खड़ा हो रहा कोई भी जन आन्दोलन मजबूत हो और उनकी शोषण परक व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर जनता के लिए एक शोषण विहीन शासन व्यवस्था का निर्माण करे इसके लिए देश में जन सरोकारी मीडिया की अत्यन्त आवश्यकता है जो बाजार के चंगुल से मुक्त हो, जो जनता के अधिकारों के लिए काम करे, जो मानवीय संस्कृति, साहित्य, कला और शिक्षा का निर्माण करे और व्यापक जनता के पक्ष में खड़ी होकर जनपक्षधरता की बात करे, एक जनसंस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। सही मायने में वही पत्रकारिता एक श्रेष्ठ पत्रकारिता होगी जो वास्तव में मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त कर एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगी।

Tuesday, March 27, 2012

तकदीर लिखिए, तदबीर नहीं


कभी समुद्र में गहरे उतरे हैं आप? मौका मिले तो ऐसा जरूर कर देखिएगा। अथाह लगने वाली गहराई में आप ज्यों-ज्यों धंसते जाते हैं, हर पल एक नई दुनिया सामने आती जाती है। जहां सूरज की किरणें तक नहीं पहुंचतीं, वहां एक समूची दुनिया सांस ले रही होती है। जल का अपना जीवन होता है। इतिहास का भी। जाने बूझे सत्य, तथ्य और कथ्य को जितना हिलाइए-डुलाइए उतने अर्थ नजर आते हैं। क्यों न हम भी ऐसा कुछ करें? आजादी की वर्षगांठ के इस महीने के पहले हफ्ते देश की मौजूदा चुनौतियों को गुजरे जमाने की घटनाओं से जोड़कर देखेंगे। आखिर हमारा आज गुजरे कल पर टिका है, जैसे आने वाला कल वर्तमान पर।
क्या हो रहा था अगस्त 1947 के पहले हफ्ते में। साफ हो चुका था, हजारों साल से चला आ रहा यह राष्ट्र अब दो मुल्कों में बंटने जा रहा है। बंटवारा मजहब के नाम पर हुआ था, लिहाजा सदियों से साथ रहते आए लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। हर ओर लहूलुहान आशंकाएं बिखरी पड़ी थीं। क्या विडंबना थी! पीढ़ियों से संग जिंदगी गुजार रहे लोग अपनी ही जमीन से धकिया दिए गए थे। उनका खून-पसीना पोंछने के लिए जो हाथ उठ रहे थे, वे अपरिचित थे। पंजाब, सिंध और बंगाल का हाल सबसे बुरा था। इसके लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना इसी हफ्ते के अंतिम दिन अपने सपनों के पाकिस्तान के लिए रवाना होने वाले थे, हालांकि जो सरजमीं उनका खैरमकदम करने वाली थी, वह तब तक हिन्दुस्तान का ही हिस्सा थी।
देश को दो हिस्सों में बांटने का संकल्प लेकर आए लॉर्ड माउंटबेटन के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी। वह कानून और व्यवस्था का पालन करवाने में नाकाम साबित हो रहे थे। उधर जिन्ना की गरदन के बल कायम थे। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी एक बार फिर हिम्मत संजो रहे थे, पर सवाल उभर रहा था कि क्या वह भारतीय समाज और राजनीति के लिए कुछ नया कर सकेंगे?
जवाहरलाल नेहरू के स्वप्नजीवी भाषण लोगों के दिल-दिमाग पर छाए हुए थे। नेहरू आम आदमी में उम्मीद का संचार करने में भले ही कामयाब लग रहे थे, पर भारत नाम का यह देश कैसा होगा, इस पर कई सवालिया निशान थे। हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर के शासकों ने अभी तक विलय प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं किए थे। इनके बिना भारतीय गणराज्य की कल्पना अधूरी थी।
उधर उत्तर-पूर्व में कुछ लोग अलगाव की दुकान चला रहे थे। मसलन, मणिपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री इरबोट सिंह खुद को संप्रभु राष्ट्र का सर्वेसर्वा साबित करने पर आमादा थे। वहां के राजा की हालत पतली थी। किसी को यकीन नहीं था कि घने जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम घाटियों से बने ‘सतबहनी’ के राज्य कभी लोकतंत्र की किलकारियों से खुद को आनंदित महसूस करेंगे। हमारी धरती पर उभर रही चारदीवारियों के दोनों तरफ कुछ ऐसे लोग थे, जो हिंदू और मुस्लिम राष्ट्र के सपने बुन रहे थे। अगस्त के उस पहले हफ्ते तक लाखों लोग यह जान चुके थे कि सिर्फ एक हफ्ते बाद उनमें से कुछ की पहचान बदल जाएगी। वे हिन्दुस्तानी से पाकिस्तानी बन जाएंगे।
पर बहुत कुछ अनजाना और अनकहा था। मसलन, सिर्फ छह महीने बाद अनहोनी घटने जा रही थी। एक ऐसे आदमी की हत्या, जो यकीनन उस समय दुनिया का सबसे लोकप्रिय शख्स था। जी हां, किसी ने सोचा भी न था कि खुद को हिंदुओं का प्रतिनिधि बताने वाला कोई युवक गांधी जी की हत्या कर देगा। खुद गांधी आश्वस्त थे कि ऐसा नहीं होगा। सिर्फ दस दिन पहले 20 जनवरी, 1948 को भी उन पर हत्यारों की इसी टोली ने हमला बोला था, पर वह सुरक्षा बढ़ाने पर राजी नहीं हुए। नेहरू के शब्दों में अपनी नियति खुद लिखने वाले राष्ट्र में एक प्रवृत्ति उभर रही थी, वक्ती लोकप्रियता अजिर्त करने की। अर्धसत्य को संपूर्ण सच साबित करने की। आने वाले वक्त में यह पुख्ता होती गई।
तीन उदाहरण देना चाहूंगा। अगस्त 1977 में हम अति आशावाद के शिकार थे। मार्च में जनता पार्टी शासन में आ चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि हिन्दुस्तानी जम्हूरियत जवान हो गई है। वंशवाद का नामोनिशान मिट गया है। कुछ ही सालों में हम सबसे बड़े ही नहीं, बल्कि आदर्शतम लोकतंत्र के तौर पर जाने और माने जानेवाले हैं। यह सपना दो साल भी नहीं चला। ठीक इसी तरह स्वघोषित ‘सत्य’ और ‘ईमानदारी’ की राह पर चलते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके अलंबरदार अगस्त के पहले हफ्ते में दहाड़ रहे थे। परिणाम? ढाक के तीन पात।  1992 के अगस्त का पहला हफ्ता। पूरा देश हिंदू लहर में डूब-उतरा रहा था। और तो और नाथूराम गोड्से के भाई गोपाल गोड्से शहर-दर-शहर घूमकर प्रचार कर रहे थे कि उन्होंने अपने भाई के साथ गांधी जी पर गोली क्यों चलाई? वह इसे ‘हत्या’ नहीं, ‘वध’ मानते थे। उनकी पुस्तक ‘गांधी वध और मैं’ की बिक्री जोरों पर थी। नतीजतन, अयोध्या का राम मंदिर उन लोगों की महत्वाकांक्षा का हिस्सा बन गया था, जिनके पुरखों ने भी कभी अयोध्या में कदम नहीं रखे थे। सब जानते हैं। न मंदिर बना, न हिंदू राष्ट्र अलबत्ता सदा सर्वदा के लिए भारतीय राजनयिकों से सफाई मांगने का बहाना हमसे द्वेष रखने वाले देशों को मिल गया।
इसीलिए आज जब कुछ लोग खुद को 121 करोड़ की आबादी वाले महान देश की ‘सिविल सोसाइटी का नुमाइंदा’ बताकर बयानबाजी करते हैं, तो डर लगता है। लोगों को पहले भी शब्दों की आडंबरी आंधियों में उड़ाने का काम किया गया है। तनी हुई पतंग की तरह हवा में ऊपर जाना तो अच्छा लगता है, पर जब कटी पतंग की तरह अरमान धूल चाटते हैं, तो कुंठाएं पैदा होती हैं। ये तीन उदाहरण इस सच को बताने और जताने के लिए काफी हैं। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि यकीनन इस समय देश के सामने महंगाई और भ्रष्टाचार सबसे बड़े मुद्दे हैं, पर इनसे जूझने के लिए एक सामूहिक रणनीति की जरूरत है। लोकप्रिय बयानबाजी की नहीं। पहले भी इसको देश भोग चुका है।
अगस्त 1947 के पहले हफ्ते से मौजूदा हालात की तुलना करें, तो आपका सिर यकीनन गर्व से ऊंचा हो उठेगा। अब हम एक लहूलुहान देश नहीं हैं। हमारी ताकत का लोहा दुनिया मानती है। यह बात अलग है कि कुछ मूलभूत समस्याएं आज भी कायम हैं। पर ऐसा संसार के किस देश में नहीं है? क्या सबसे ताकतवर देश अमेरिका में, जिसने अभी आजादी की 234वीं वर्षगांठ मनाई है, गरीबी नहीं है? क्या वहां बेरोजगारी के आंकड़े नहीं बढ़ रहे? क्या ओबामा पहले अश्वेत राष्ट्रपति नहीं हैं? क्या अभी तक वहां किसी भी महिला को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला है? क्या धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह देश अंदरूनी तौर पर कंपकंपी का शिकार नहीं है? अगर यह सच है, तो शर्म के बजाय गर्व कीजिए। हमने गए 64 सालों में बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं।
भूलिए मत। सफलताएं तभी बरकरार रहती हैं, जब नई चुनौतियां पैदा होती हैं। सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में यह जबरदस्त परिवर्तन का दौर है। बदलाव अंधी गुफाओं में भटकने का अभ्यस्त होता है। उसके साथ चलते-दौड़ते अक्सर लगता है कि हम भटक गए हैं। पर हर अंधेरी रात के आगे उजला सवेरा होता है।